हरिहर झा

मई 9, 2019

आईना दिखाती

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:13 पूर्वाह्न
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तूफान, दे थपकी सुलाये,  
डर लगे तो क्या करें? 
विष  में बुझे सब तीर  उर को  
भेद दें तो क्या करें?
 
बर्तन भरा 
मन का लबालब,
ऊपर चढ़ते सुख  की छलकन 
सह ना पाई 
उठती धारा   
रुक न पाई ह्रदय की  धड़कन 
पोछना चाहें तो, चेहरा, 
कीचड़ निकलता हाथ अपने  
भयग्रस्त बैठे कांपते थे  
हा देव! या कुछ और  जपने
दुर्देव  मोटे  गाल  अपने   
फुलाये तो क्या करें।
  
ज्वालामुखी दिखता न, 
सुख की  
लॉटरी मुस्काती सामने  
उल्लास था 
आनन्द इतना  
लो चेतना लगी ऊँघने
जाम ले कर नाचती साकी    
हर्षित हुई थी लालिमा में 
फिर क्यों ढहे सपने 
सभी बस छूमन्तर  हुये कालिमा में  
अब  मौत का आगोश झूला     
झुलाये तो क्या करें?
 
कुण्डली 
जनम की क्या बोले  
थे मौन,  
खोटे सभी सिक्के
डायन डराती 
काल बन कर  
विकृत थे,  अंगोपांग उसके 
सामने आईना दिखाती,  
लिपटी कुकर्मों में जो  वृत्ति  
पापिन बनी इतिहास खोदे  
शव नोचने की दुष्प्रवृत्ति  
बेहोंश करता, बोझ गिर कर   
सुलाये तो क्या करें? 
 
http://www.sahityasudha.com/articles_Nov_2nd_2017/kavita/harihar_jha/aaina.html 

Also: Gloom and Hunger 
 
https://hariharjha.wordpress.com/2008/08/01/hunger-and-gloom/ 

मार्च 18, 2019

फुसफुसाते वृक्ष कान में

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:12 अपराह्न

फुसफुसाते वृक्ष कान में
सुन नहीं पाता
स्वयं में डूबा, मुझमें चढ़ रहा उन्माद।

मेरी अधूरी कामना,
अतृप्त इच्छायें
बीच कीचड़, नाद अनहद,
सुनू कहाँ इन्हें
परपीड़क सुख हँसे, रंगरेलियों के बीच
कलियों! डरो मुझसे, देता हूँ चुभन तुम्हे
सूक्ष्म ध्वनिया श्रवण
करना बड़ा मुश्किल
मन में कितना शोर, क्यों घिर आया प्रमाद।

मौन इस संवाद को समझूँ,
नहीं कुछ आस
कोई कंप्यूटर?
विश्लेषण करे कुछ खास
दिमाग की नस नस बना ली भले विश्वकोष
मूढ़ता में ना दिखे प्रकृति का भव्य रास
संगीत से घृणा,
कोलाहल भरा है प्यार
मौसम गज़ल गा रही, मैं दे न पाता दाद।

http://www.sahityasudha.com/articles_Nov_2nd_2017/kavita/harihar_jha/fusfusate.html

जनवरी 24, 2019

गगरिया पनघट पे फूटी

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:57 पूर्वाह्न
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फिसलती जाती उंगली टहनियों से
लटका दिये हैं पाँव लबड़-धोंधों से।

कंस के भांजे बने लूटत रहे हैं सैकडों को
कान्ह को बस छोड़, ग्वाले छेड़ते है गोपियों को
गगरिया पनघट पे फूटी बरसों से।

पराई, नार पर राम-रहिम, स्वाँगमय नज़र तिरछी
आश्रम बनाया छिपाते , गन कही चाकू-बरछी
पीता रहा खून , दीमक हजारों से।

बेटी न हो, जुगाड़ करके बेटा अरे! बना दिया
थी रात काली भयानक , करतब ने मुँह बन्द किया
शव सच का क्यों, उठवा दिया झूठों से।

http://www.sahityasudha.com/articles_Oct_2nd_2017/kavita/harihar_jha/gagaria.html

दिसम्बर 20, 2018

मनमानी राह ले बैठा

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:03 पूर्वाह्न
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किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।

गलत सलत परिधान ले लिये,
पहन लिये विदूषक जैसे
काऊबॉय सा कभी लगे तो,
कभी कोई फटीचर जैसे
दाग लग गये सब वस्त्रों में,
कम ना थे अपने भी लफड़े
धोबन उजले धोती थी पर
फाड़ गई कुचेले कपड़े

जगह जगह पैबन्द लगे हैं,
खोल रहे है कच्चा चिट्ठा
किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।

छलक रही थी उर्जा भीतर
खुशियों से भरपूर खजाना
गरूर मन का उबल पड़ा तो
अपनो को ही किया बेगाना

सोंचा था दिल की धड़कन पर
अपना ही राग सुनायेगे
जाम भरेगी साकी हम तो
चियर्स कहते बतियायेगें

नैनो में मधुशाला थी पर
चिढ़ कर दिखा गई अंगूठा
किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।
http://www.sahityasudha.com/articles_Oct_2nd_2017/kavita/harihar_jha/manmani.html

अक्टूबर 30, 2018

उलझा दिये हैं किस तरह

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:14 पूर्वाह्न

जिन्दगी ने
मायने उलझा दिये हैं किस तरह
तिमिर ने
किरणों के पग उलझा दिये हैं किस तरह

मंथन हुआ, क्षीर सागर,
हिलोरें ले कह रहा
विष पयोधर साथ मिल कर,
क्यों दिलों में बह रहा
नेवला तो बिना देखे
फुदकता इतरा रहा
फँस गया
मुँह में छुछुन्दर,
सांप सब कुछ सह रहा
न्याय ने कानून सब
उलझा दिये हैं किस तरह

कामना चलती
ठुमक कर
स्तब्ध जीवन मौन है
भेष बदले कुटिलता अब
कौन जाने, कौन है
स्वार्थ जो हावी हुआ
विकलांग रिश्ते हो रहे
प्रेम चिड़िया कौन सी
सब कुछ जगत में यौन है
वासना ने दो कदम
उलझा दिये हैं किस तरह

गट्ठरों पर
लाश की,
क्या खूब सौदा चल रहा
गिरगिट बदलता रंग
अवसरवाद में पल रहा
दहकते हैं प्राण ,
दैहिक व्यवस्था बदल रही
जाल का हर चक्र अपने
यन्त्र को ही छल रहा
पखेरु ने
पंख खुद
उलझा दिये हैं किस तरह

https://sahityasudha.com/articles_oct_2016/kavita/harihar_jha/kavita_uljha_diye_hain.html

 

सितम्बर 10, 2018

मन स्वयं बारात हुआ

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,विरहिणी,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:54 अपराह्न

गहरी नींद लगी
सोया तो
मैं स्वयं ही रात हुआ
प्यास पी गया बादल बन कर
मैं स्वयं बरसात हुआ

बंसी की
धुन सुन अंतस में
कितना आनंद समाया
खिलते स्वर की हुई बिछावट
स्थल नभ सब ने गाया
शांति अमन
जो दुल्हन थी तो
दिल का देव बना राजा
झंकृत होती तंत्री
ढोल की थपकी पर बजा बाजा

नाच नाच खुशियों से मेरा
मन स्वयं बारात हुआ

दर्द सहा
जब दुखियों का
तो पीड़ा नस नस में छाई
प्यार हुआ सुलझन से इतना
उलझन ने उलझन पाई
मधुर मधुर गाती लहरें जब
मेरे मन की मीत हुई
स्पंदन बनी वेदना फिर तो
पीड़ा खुद संगीत हुई
बिजली कौंधी
विलिन हुई,
खुद घावों को आघात हुआ

तरस गया
मुस्कान न आई,
मजा लिया बस रोने में
आँसू में बहता,
बचने को
ठाँव मिला ना कोने में
लगा पंख उड़ना चाहा तब,
फैला मैं आकाश हुआ
छुप न सका तो तन कर देखा
शत्रु का पल में नाश हुआ

जीतता हार हार कर यों
खेल स्वयं ही मात हुआ

http://sahityasudha.com/articles_nov_2016/geet/harihar_jha/man_svayam.html

 

अगस्त 16, 2018

इन्द्रधनुषी रंग मचलते

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:23 पूर्वाह्न
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स्पर्श,
नयन का पा लेने को
इन्द्रधनुषी रंग मचलते।

स्वर लहरी
मचलती काहे
साँसो की सरगम क्या जाने
खूब मचलती जाती राहें
पैरों की रुनझुन को सुनने

मधुर नृत्य की ताल पकड़ने
मृदंग के धिग थाप मचलते।
कंगना थामे
पकड़ कलाई
ज्वार नशे का
पा जाये वो
प्यास नहीं
फिर भी मिट पाई
फूल बरसते छू ओठों को

अलकावली चूम लेने को
पंखुरियों के हार मचलते।

http://www.sahityasudha.com/articles_may_1st_2017/kavita/harihar_jha/indhradhanushi.html

 

 

जुलाई 11, 2018

कोपल की लाचारी

Filed under: गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:25 पूर्वाह्न

जंगल में मंगल है,
कच्ची कोपल की लाचारी
बन्दर की चौपाल जमा
पपिहा गाये दरबारी।

रामराज्य की
टांग खींच कर
कुत्ते मांगे वोट;
गिद्ध नोचते, करते
जिन्दा लाशों से विस्फोट;
बालक रोता रहे
ना मिल पाये जीवन की भीख;
कोई मरे या कोई जीवे ,
सुने ना कोई चीख;

चलदी कोई मासूम
झपटे लंपट व्यभिचारी।

चुगने की आशा में
रामू मन ही मन हरषाये;
भई निराशा, मनवा रोवे
फूल क्यों कुम्हलाये;
फुलवारी में
बगैर लछ्मी के
बीज मिले न खाद;
चप्पल घिसे रोज रोज की
पहुँचा ले कर फरियाद;
किसकी कुंडी खड़काये
द्वार न खोले दरबारी।

 

तिनका लिये
आया पंछी
सिर पर गीर गई गाज़;
रिक्त घोसला बिखरे दाने,
माली है नाराज;
छिपाये मुँह,
किराया बाकी,
पूछे आती लाज;
गिड़गिड़ाये,माफी मांगे पर,
घेर रहे हैं बाज;

माथा नीचा, दुष्टों का
माने खुद को आभारी।

http://www.sahityasudha.com/articles_may_1st_2017/kavita/harihar_jha/kopal_ki.html

जून 5, 2018

कविराज बनते फिरते हो

Filed under: गीत,मंच,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:55 पूर्वाह्न

लाटसाहब की तरह रोज
कविराज बनते फिरते हो
हवा निकल जायेगी
भंडाफोड़ करूंगी याद रहे।
माथापच्ची कौन करे,
तुम बहस किसे जिताते हो
कवि-सम्मेलन में जाते
या कहाँ समय बिताते हो
जासूसी से मिले कार में
सोनपरी के पीले गजरे
ढोंगी हो! लिखते प्रवचन
और छप्पन छुरियों पर नजरे

फिलोसफी की आड़,
पड़ोसन पर कवितायें लिखते हो
बेईमानी का चिठ्ठा,
बन्द पड़ा खोलूंगी याद रहे।

मोबाइल में कोड-वर्ड में
किससे बातें करते हो?
प्रेम-पत्र मिल जाये तो तुम,
अपनी कविता कहते हो
फ़ेसबुक की फ्रैंड से मिल कर
जाने क्या व्यापार किया
भूले मेरा जनम-दिन क्यों,
कभी ना मुझको हार दिया

मुझ पर कंजूसी, औरों के
होटल का बिल भरते हो
मिनिट मिनिट और पाई पाई,
हिसाब करूंगी याद रहे।

घर में भूख नहीं होती,
किस किस के संग खाते हो?
चादर अपनी मैली करके
नाम कबीरा लेते हो?
नकली चेहरे लगा लगा
भोलापन केश करते हो
ड्राइव मुझसे करवा कर
तुम पब में ऐश करते हो

झाड़ू-पोछों में क्यों उलझूं
तुम्हे प्रिय जब मधुशाला
तुम घर में, मैं कैसिनो में
घूमुंगी यह याद रहे।

मैं झाँसी की रानी बन कर
तुम्हे मजा चखाऊंगी
दुखती रग पर हाथ रखूँ
हँस कर के तुम्हे रुलाऊंगी
पति-परमेश्वर समझ लिया,
पुरूष-प्रभुता के रोगी!
सारी अकड़ एक मिनिट में
टाँय टाँय यह फिस होगी

तो सुनो किट्टी-पार्टी है कल
तुम बच्चों को नहलाना
वर्ना पूरी महफिल में
एक्सपोस करूंगी याद रहे।

http://sahityasudha.com/articles_july_2nd_2017/kavita/harihar_jha/kaviraj.html

मई 8, 2018

मैली हो गई बहुत चदरिया

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:43 अपराह्न
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मैली हो गई बहुत चदरिया।
मृगजल पीया, संजोया मन में
प्यास कहाँ बुझ पाये
भर भर पानी खींचा फिर भी
जाने क्यों तृषा जलाये

मुरली की धुन कौन सुनाये
अंगारों से भरी गगरिया।

रावन बैठा है दिल में
छल चला परायों अपनों में
बम-गोले ले निकला
उससे जूझ रहा हूँ सपनों में

बूझा ना शत्रु , लड़ने निकल पड़ा
शस्त्रों की बाँध गठरिया ।

जाऊँ कहाँ घना अंधेरा
उड़ती मिट्टी पथरीली
काजल भरा लबालब मन में
राहें भी होती गीली

ढूँढू कहाँ कहाँ, पीड़ा को
दूर भगा देने का जरिया

तनातनी , भीतर कोई थपकी
दे कहता ताली दो
कण्ठ लबालब भरे बिफरते
जी भरकर गाली दो

नाटक किया ज्ञान पाने का
पहन खड़ाऊँ, उठी लकुटिया।

http://sahityasudha.com/articles_july_2nd_2017/kavita/harihar_jha/maili_ho.html

 

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