हरिहर झा

मार्च 22, 2017

रूह में लपेट कर

Filed under: अतुकांत,अनहद-कृति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:19 पूर्वाह्न
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धुंआ-धुआं हो रहा श्मशान की ओर
पर पालकी में बैठी दुल्हन
अपने आंचल में सपने संजोये
मृगनयनों से अपने पुरूष को निहारती
एक बर्फ़ीली आँधी से अनजान
रसवन्ती उमंगों से भरी
पपीहे की ओर इशारा करती
खो गई घुमड़ती घटाओं में।

जब कि मलमल के रेशों के भीतर छुपी
जर्जर खटिया में फँसती कोमल त्वचा
अभ्यस्त हो गई पीड़ा के लिये
पर यह छलावा…
आस्था को हिलाती
प्यार में बनावटी आतुरता
और इसके
रेशमी स्वप्नों से निकलते काँटे
हो गये असहनीय!
हृदय की व्यथा
और तन्हाई को डूबोती रही
आँसुओं में
इधर वेदना बहा ले गई
दिल की हसरतें।

फिर युग की आँधी में
उड़ती कलम ने
श्मशान की आग को
केवल स्थानान्तरित किया
बुझाया नहीं…।
ताप अपनी रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह
ग़ज़ब की हिम्मत!
चुकाई भारी कीमत
श्मशान की आग को
रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह!

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-KUU1415-rooh-mein-lapet-kar

जनवरी 10, 2017

बरगद के तले

Filed under: अतुकांत,अनहद-कृति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:40 पूर्वाह्न

बरगद के तले
महकते फूलों की खुशबू
आती हुई पदचाप,
कोमल डालियाँ
मुलायम फूलों का स्पर्श
लटों की उलझन में फँसता
मैं गिरफ़्तार।

हरी-हरी घास का रेशमी बिछोना
ओंस की बूंदो का कोमल स्पर्श
पोर-पोर में समाती
झरते पानी की सुरीली आवाज़।

खिलखिलाते फूल
यह दिवास्वप्न या
रिसते घावों का करुण उपकथन…
एक गहरी प्यास की भूमिका।

हवा सुरसुराई कानों में
एक गुरूमंत्र –
पहाड़ी की घाटियों से गूँजता शंखनाद,
मंदिर के गुंबद से निकलता घंटनाद
भीतर मौन निःशब्द
लो शुरु हुआ अनहद नाद।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-KUU1415-poem-bargad-ke-taley

 

 

नवम्बर 12, 2016

कौन जाने शाप किसका?

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:17 अपराह्न
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क्या पता था
वृक्ष विषधर बन
कलि को काट लेगा।

फफक कर रोते रहे
श्रमिक भूखे खेत में,
क्यों शिशु हो दूर घर से,
सो रहे हैं रेत में
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
छाएगी दुर्देव की माया
अन्न दाता छाछ देकर
ख़ुद मलाई चाट लेगा।

स्वतन्त्र है यह देश
इसकी आस में स्वतंत्रता,
चंद सिक्कों के लिए
क्यों सोच में परतंत्रता
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
घिर चुकी जब लोभ की छाया
वृक्ष देकर ज़हर ख़ुद
अमृत फलों को छाँट लेगा।

उजड़ती है कोख, कन्या
रोकर सिसकियाँ भर रही,
देह अपनी बेच कर
जीने को है विवश वही,
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
लुभाया जो न्याय का चेहरा
आँख मूंदे ले तराजू
स्वयं बन्दर बाँट लेगा।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-kaun-jaane-shaap-kiska

सितम्बर 19, 2016

वायदों का पतंग

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:16 पूर्वाह्न

उड़नतश्तरी में
तारों का गुच्छा लगता है
वायदों का पतंग तुम्हारा अच्छा लगता है

रंभा की क्रीड़ा दिखला दी
बॉलीवुड से लाकर
रक्तबीज को भभकी दी
नाटक में गाल फुला कर
फिल्मी सम्मोहन ने
लाक्षागृह में यों भरमाया
शकुनी मामा का पासा अब कच्चा लगता है।

’बिजली’ देखी चन्द्रकला सी
जगी भाग्य की रेखा
खूब उड़े नभ में
पतंग के नीचे हमने देखा
डोर नहीं थी
सर्प नचाते बाजीगर की माया
काले दानव का जादू अब बच्चा लगता है।

कन्नी कटने वाली
चरखी नेताजी का पेट
मांजा बिल्कुल तेज लगा है
पतंग बना राकेट
चिंगारी भस्मासुर की
तो दहकी पूरी काया
स्वांग मोहिनी रूप में भी तो सच्चा लगता है।

 

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-vaaydOn-kaa-patang

 

अगस्त 8, 2016

पगलाई आँखें ढूंढती

Filed under: अनहद-कृति,गीत,विरहिणी,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:54 पूर्वाह्न

 

पगडंडी के पदचिन्ह से भी
क्षितिज देखा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह

फूल सूंघे, छुअन भोगी
सपन का वह घर
कचनार की हर डाल लिपटी राह में दर दर
मधुरस पिया जम कर वहीं
छाया चितेरा जिस जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
डोर पर चलती
ठहरने के नहीं लायक
नट नटी का खेल
कैसा कर रहा नायक
साँस में हर, बीन सुनती
वह सँपेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
चीथड़ों के इस कफन में
चाँद चकनाचूर
सूरज धधकता
राख की आँधी उड़ी भरपूर
गहरी गुफा से याद का
मलबा उखेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-paglaayi-aankhein-dhoondhtee1

My Mistress:

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=18812

 

 

 

जून 14, 2016

दुल्हन का सपना

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:07 पूर्वाह्न
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तासे, ढोल बजे,
शहनाई में  दिल की बजी घंटियाँ।

धड़कन से दिल के तारों को
कँपना है
गीत राग  में
रंग भरा इक  सपना है

निखर मेहँदी
और महावर में कैसी  सजती दुनियाँ।

ठाटबाट हैं ,
गम दहेज सा अनचाहा
पौरुष का वरदान
उसे है मनचाहा

दिल  सम्राट सा
और  बड़ा ’समारट’ है  मेरा सैंयाँ।

भाव बने
रंगीन बादल आप स्वयं
मन  में चली हिलोरें
बनी भरतनाट्यं

शुरू नाच  हुआ
अप्सरा के पैरों में हैं  पैंजनियाँ।

कोई बचाये
जुदाई के चंगुल से
जोबन बैरी
तार खींचता बाबुल से

आंसू टपटप बहें
बखत बिदाई मिलें गलबहियाँ।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-dulhan-kaa-sapna

 

जनवरी 7, 2016

भूखी

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:52 पूर्वाह्न
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प्याज के टुकड़े को चीर कर
टपकता रस बह रहा
अधबने चावल पर गिर कर
फिसलता
जाने क्या कह रहा
जिसमें डूबने लगी
राहत पाती
एक भूखी की कराह;
एक सपना पल रहा कोख में
नींबू-सा निचोड़ रहा माँ का गर्भ
चिपचिपाते कीड़े की तरह
जो ज़हरीला तो न था
पर वह अपना बदन जला गई;
सड़े अनाज की रोटी से कैसे बन पाती
हड्डियां, मांस पेशियां?
परेशान तेवर
और दर्द – बन्द मुठ्ठी में
मां का लड़खड़ाता वात्सल्य!
भड़भड़ा कर उठी समेटने स्वयं को
डरती हुई होनी की परछाई से भी
निवाला ठूंसा मुँह मे;
“रोटी समझ में आवे
पिरोटिन विटेमिन
वो छोकरा जाने क्या क्या बकता है
होता होगा किसी सरग में
मरे बिना वह नसीब नहीं”

दबीदबी और मौन
आशायें और उन्माद
समय की लहरें बहा ले गई
बची तो बस खिल्ली उड़ाती मौत।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-bhookhi

नवम्बर 1, 2015

शहर में दिवाली

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:07 पूर्वाह्न
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लिये मुस्कान
’रोबो’ की
दिवाली खूब लहराई
हँसी लेकर मुखौटो पर
शहर की शान इतराई

रण में
दुंदुभी बज गई
बजे ’डीजे’ नगारों से
हुई मुठभेड़
कि अब कौन ,
पदक छीने हजारों से

कटारे बन गई
चितवन
उफन तलवार बौराई

पड़ा परशाद,
थाली पर
पकौड़े चाट की छाया
धुँआ सा छा गया पल में
कहीं बारूद फैलाया

बुझे दीपक,
रुदन करती
हुई ’शृंखला’ मँडराई

घिसे बर्तन सभी जग के,
चली लछमी धुँधलके में
दरस के नैन प्यासे थे
खुला उपहार बदले में

दिखी जर्जर हुई चूनर
सुबकती झील गहराई

पहन कर स्वर्ण,
खुशियों का
नया आयाम हाँसिल हो
धरम का स्वाँग
रच डाला
भले ही नजर कातिल हो

अकड़ से
दान देते ही
लटकती जीभ ललचाई

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-shehar-mein-diwali1

जुलाई 31, 2015

चुड़ैल

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:05 पूर्वाह्न
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नहीं बनाना मुझे सहेली-वहेली

खुश हूँ अपने आप में

अपने काम से काम

मेरा अंतर्मुखी स्वभाव इजाजत नहीं देता

यह क्या हो गया है मुझे पता नहीं

क्यों मैं अपने आप में सिमटती जा रही हूँ?

 

हार गई वह बेचारी

मेरा दुखी मन सहला-सहला कर

कितना मुश्किल है यह सब !

पर न उठी मेरे मन के गलियारे में

खुशियां और किलकारियां

तो सुना डाली उसने मुझे वह

टिमटिमाते तारों में छिपी कहानी

खोल दी अपनी अंतरंग दास्तान

चाहती तो बचा कर रख सकती थी

अपने पति को

जिसके पैरों की आहट थी

सौगात मेरे लिये

पर सहेलीनुमा विश्वास जीतने के लिये

भेजे ई-मेल

दिखा डाले उसने

अपने हनिमून पर लिये फोटो

कुछ विडम्बना ही हुई थी ऐसी

वह भी जानती है

उन फोटो में उसकी जगह पर

मैं हो सकती थी

 पर अंगड़ाई ली समय ने

 मैं पत्थर-दिल

सह गई सब कुछ

कब उठे और

कब अर्पित हुये भाग्य को

मेरे विद्रोह

एहसास भी न हुआ किसी छोर पर

पर अब मैं अनाप-शनाप

कुछ भी सोंचती हूँ

कि चुड़ैल है वह  !

पगला गई हूँ 

नहीं जान पाती

 कि क्यों चिड़ायेगी वह बच्चों की तरह

या जलायेगी मुझे

कि मेरा प्रेमी है उसके कब्जे में

भला क्यों छिड़केगी

जले पर नमक  ?

पर मैं हूँ कि कतराती हूँ

आँख चुराती हूँ उससे

अशिष्ट होती जा रही हूँ उसके साथ ।

अप्रैल 2, 2015

नाच हुआ पिपासा का

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:10 पूर्वाह्न
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प्रसव हुआ, भविष्य लिये
आई रंभाती रात
शिशु ने जग में पैर पसारे
मन का दर्पण लिये देह पर
कोई ज़िन्दगी निकल पड़ी।

वर्तन सीखे, भाषा सीखी
सच और झूठ का भान हुआ
बुरी नज़र पर आँख पड़ी तो
लिंग-भेद का ज्ञान हुआ।
खेल गये बचपन के, ख़ुद से
खिलौने-सा व्यवहार हुआ
विकृत हुई समझ, जो देखा
अपराधों का मान हुआ।

फैला जमघट कुकर्मों का
विभत्स हुयीं गलियाँ नुक्कड़
खुला आवरण नाक सिकोड़े
बही गन्दगी निकल पड़ी।

झूठे नापदंड बदन के
हावी हो गये बालिका पर
नग्न देह ललचाती नज़रें
दिल पर कितना आघात हुआ।
आई याद दादी की सीख
अपराध-बोध में लुढ़क पड़ी
माया नगरी, उलझ-उलझ मन
चकाचौंध से मात हुआ।

पत्थर-तोड़ बजी धुन ऐसी
नाच हुआ काम-पिपासा का
निर्वस्त्र देह से लाज लुटी
शातिर हुड़दंगी निकल पड़ी।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-naach-hua-pipaasa-kaa

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=152

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