हरिहर झा

मई 2, 2021

वो बहेलिया

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:58 पूर्वाह्न
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पंछी फाँसा और चल दिया वो बहेलिया।

पाँव जिधर था वहीं गंदगी
धतिंग से भरी थी बंदगी
खून से अपने हाथ धोये
बीज घृणा के फिर फिर बोये
भारत माँ का सौदा करता यह बिचौलिया।

गाता रहता ख़ुद की महिमा
झुलसाता औरों की गरिमा
भरा तेरे पाप का सागर
करतूतों को करे उजागर
लिपटा देह से काहे खींच रहा तौलिया।

घाव दिये तूने जो गहरे
घड़ियाली फिर आँसू तेरे
हीन भावना का शिकार तू
दुर्योधन का अहंकार तू
डींग मारता ऊँची ऊँची, है मखौलिया।

मानवता क्या? तू क्या जाने
माँग फिरोती बन्दूक ताने
बारूद फ़सल नहीं उगाता
इतना भी तू समझ न पाता
कुण्ठित मन, भेजे से पूरा, तू दिवालिया।

तुझे छीलता तेरा छल है
सोच, मूढ़ता में मृगजल है
बलि चढ़ेगा बन कर बकरा
जग-व्यवस्था से ना टकरा
दाल गले ना तेरी, कर ले कुछ भी छलिया।

वो बहेलिया – हरिहर झा | साहित्य कुंज (sahityakunj.net)

मार्च 23, 2021

मौन मुखर!

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:51 पूर्वाह्न
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कैसे मन की अगन बुझे
राख में शोले, जलन तुझे
झुलसी लपटें क्यों सह कर
                   मौन मुखर!
दिल बोले हर अंग जले
वाणी सरगम की निकले
साँसे चुप-चुप क्यों डर कर
                   मौन मुखर!
नभ-मण्डल के तारे मौन
जग की वाचा सुनता कौन
मानव आहें भर-भर कर
                   मौन मुखर!
भाव भरी कविता गढ़ कर
सुर-लय की सीढ़ी चढ़ कर
दिव्य साधना में गल कर
                   मौन मुखर!
मौन शून्य से निकली सृष्टि
ब्रह्म-ज्ञान की अनुपम दृष्टि
मोक्ष-द्वार पर पहुँचेगा नर
                  मौन मुखर!
जीवन से कुछ राहें निकली
पर जिस दिन अर्थी निकली
प्राणो के स्वर हुये मुखर
                   मौन मुखर!

मौन मुखर! – हरिहर झा | साहित्य कुंज (sahityakunj.net)

फ़रवरी 22, 2021

परदुख कातर

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:00 पूर्वाह्न

भूख लगी,
मिले न रोटी
घास हरी चरते हैं
झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।

मिली बिछावट काँटों की
लगी चुभन कुछ ऐसे
फूल बिछाते रहे, दर्द
छूमंतर सब कैसे
भूले पीड़ा, औरों का संकट हर लेते हैं
झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।

खटिया खड़ी हमारी की
समझ लिया क्यों दुश्मन
पकड़े गला नासमझी में
छोड़ सका ना दामन
परदुखकातर, औरों की, खुशियों पर मरते हैं
झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।

गिद्ध घूमते,
भले गिरा
कतरा कहीं खून का
हम तो सोये अभी मान
लिपस्टिक नाखून का

नरक मिले पर स्वर्गलोक में कहीं विचरते हैं
झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।

परदुख कातर – हरिहर झा | साहित्य कुंज (sahityakunj.net)

जनवरी 22, 2021

दिल का दर्द

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:26 अपराह्न

खोई-खोई उलझनों का कुछ तो राज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

झांझर* झमझम बजी सृष्टि का मूल
तारे ग्रह नक्षत्र चितवन की धूल
मेघ काले-छिद्र* से नैन के काजल
युग-युगान्तर निकल गये कि जैसे पल

कल से बहते आँसुओं का समन्दर आज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

राजकुल की मर्यादा सबको भाई
भोली सी प्रेम-लहर जा टकराई
क्या बला है! प्राण किसलिये अटक गये
प्रमुख जिन्हें राज-धर्म क्यों भटक गये

छोड़ दिया तख्त छोड़ दिया ताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

शरमा कर झुकी हुई नजर की हाला
चिन्गारी प्रेम की वियोग की ज्वाला
धधकते अंगार सा खून जब बहा
तड़पता सिसकता दिल मौन ही रहा

खुल कर रोने के लिये मोहताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

*झांझर = बिग बैंग; काले छिद्र = ब्लैक होल

दिल का दर्द – हरिहर झा | साहित्य कुंज (sahityakunj.net)

दिसम्बर 1, 2020

चोरनी पक्की

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:29 पूर्वाह्न
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चुराली,
चन्द्रमा से कला सोलहों
चोरनी पक्की, ठुमक कर मुस्कुराई।

मली बदन पर,
चाकी की धूल केसर
अंग चंदन की सुगंध से महक रहा
अणु भट्टी जले
ताप का ओज छीना
लिजलिजी देह से लावण्य दहक रहा

नखशिख चुरा लिये
मेघदूत-ग्रन्थ से
सोलह शृंगार में कितनी चतुराई।

तस्करी नैनों की
दुबकती कब कहाँ
अंग-प्रत्यंग से सौम्यता टपकती
ठगा सा हर कोई देखता रह जाय
आँखे धवल चंदा की तुझ पर तकती

कमी अगर कुछ भी
सब औरों का माल
दूजा है बुरा, तुझमें नहीं बुराई।

क्या हुआ ग़ज़ब,
मौलिकता नहीं तो भी
उर्वशी रंभा के,
नक़्शे-क़दम नृत्य
रंग रूप उधार,
जेवर भले नक़ली
प्रतिस्पर्धा टक्कर की, क्षम्य सब कृत्य

व्यर्थ है रूप अगर,
नज़र भी न खींचे
सुन्दर सी तूने सुन्दरता चुराई।

चोरनी पक्की – हरिहर झा | साहित्य कुंज (sahityakunj.net)

अक्टूबर 6, 2020

वो बहेलिया!

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:13 पूर्वाह्न
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पंछी फाँसा और चल दिया वो बहेलिया।

पाँव जिधर था वहीं गंदगी
धतिंग से भरी थी बंदगी
खून से अपने हाथ धोये
बीज घृणा के फिर फिर बोये
भारत माँ का सौदा करता यह बिचौलिया।

गाता रहता ख़ुद की महिमा
झुलसाता औरों की गरिमा
भरा तेरे पाप का सागर
करतूतों को करे उजागर
लिपटा देह से काहे खींच रहा तौलिया।

घाव दिये तूने जो गहरे
घड़ियाली फिर आँसू तेरे
हीन भावना का शिकार तू
दुर्योधन का अहंकार तू
डींग मारता ऊँची ऊँची, है मखौलिया।

मानवता क्या? तू क्या जाने
माँग फिरोती बन्दूक ताने
बारूद फ़सल नहीं उगाता
इतना भी तू समझ न पाता
कुण्ठित मन, भेजे से पूरा, तू दिवालिया।

तुझे छीलता तेरा छल है
सोच, मूढ़ता में मृगजल है
बलि चढ़ेगा बन कर बकरा
जग-व्यवस्था से ना टकरा
दाल गले ना तेरी, कर ले कुछ भी छलिया।

https://sahityakunj.net/entries/view/vo-baheliya

अगस्त 30, 2020

सम दुखियारे

Filed under: अनुभूति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:46 पूर्वाह्न

काका मैं, शीशम दो समदुखियारे

जीवन महुआ जैसा
थू थू कड़वा
चिलचिलाती धूप
छोड़ गया भडुवा
छैयाँ दी वे, दुर्जन निकले सारे

नीलकण्ठ हैं हम
खींच जहर लेने
दर्द पी गये
औषध बन सुख देने
पाकर चैन वे डाल गये किनारे

अकड़न गई फिसल
शरीर में वैसे
टहनी काटी,
कटी धमनियाँ जैसे
फैंका ज्यों कबाड़, घाव दिये गहरे

चले गये
वही हमारी हत्या कर
दी जिनको
सारी उर्जा जीवन भर
भुला न पाये, हम, वे दिल से प्यारे

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/1vriksh/shisham/geet/hariharjha.htm

जुलाई 16, 2020

पत्थरों को क्या कहें

Filed under: साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:18 पूर्वाह्न
Tags: , , , ,
शर्म से गर्दन झुकी, 
पत्थरों को क्या कहें।

बौछार फैंकी 
छेड़ कर, मुस्का रहा छलिया,
कीचड़ उछाला, ताव से  
चटखा रहा  कलियाँ;
पाषाण दिल चुपचाप 
काटे, चिकोटी लोफर, 
स्थिर व्योम ताके है, 
घुमन्तू बादल का डर
  
तारे लो बुझ गये 
क्रंदन स्वर गूंज रहे। 

तमस की घुसपैठ 
आतंकी लगाये घात, 
रौंद फूलों  को 
निकाली गंध की बारात;
पिशाच की वृत्ति जो उभरी  
हाय! गँदलापन,
संघर्ष, सिसकी में 
घायल हो गया तन मन;
 
भय लगे हैवान से 
हाथ फिर किसका गहे? 

टूट  गई हड्डियाँ  
चटख  जाती पसली, 
चीख गूँजी गगन में  
तूफान था असली; 
कोतवाली झूमती 
सरक जाते नोट, 
तराजू में जंग 
कुछ थी वज़न की खोट;        

पतवार कश्ती को डुबा, 
जलधार में  बहे। 
https://www.sahityasudha.com/articles_oct_1st_2018/kavita/harihar_jha/pathar.html
 

जून 15, 2020

Filed under: साहित्य सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:59 पूर्वाह्न
Tags: , , , ,
सुर्ख़ियों में कहाँ दिखती
सुर्ख़ियों में कहाँ दिखती,  
खग मृग की  तान   

खबर है पत्ती खिला कर, 
नोट बस खुद ही चबाये
लात मारी, सीढ़ी चढ़े जब,  
विरोधी न चढ़ पाये

देख लो, मन्त्री पद की  
कुर्सियों की शान

अगली खबर  है  नग्न लेखन, 
चित्र अश्लिल लगा लिये 
साहित्य कह कर चैक ले 
सरस्वती का संग किये  

कुण्ठा से ग्रसित लेखन  
लिखता शैतान  

फोटू छपा है हाथ में  
सत्य का दीपक जलाते  
पोत रहे,  काजल मुख पर,  
अशर्फियाँ बहुत कमाते

मैला दिमाग में ढो कर, 
कर रहे अहसान 

उलट गीता कैसे  हुई, 
अर्जुन उधर  सठिया रहे   
भ्रमित है धृतराष्ट्र क्यों?  
संजय इधर बतिया रहे
   
दौड़ते टीआरपी  को 
बेचे ईमान

http://www.sahityasudha.com/articles_oct_1st_2018/kavita/harihar_jha/surkhiyan.html

मई 10, 2020

राधा खड़ी सदी से

Filed under: गीत,विरहिणी,साहित्य सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:47 पूर्वाह्न
Tags: , , ,
श्याम सलोने
पलक बिछाऊँ, बसी मूरत न हटती।

राधा खड़ी सदी से
जाने पनघट पर, जल भरने
जेल जनम कब लोगे मोहन,
जग का संकट हरने
भोली बहना कैद,
निर्दयी कंस की नहीं पटती।

राधे मोहन
एक रूप हैं, कवि-वचनामृत तिरछे
राधा-वेश में कृष्न आये,
कृष्न किधर हैं पूछे
कान्हा बन कर
राधा आई, ’राधे! राधे!’ रटती।

छाछ के लिये नाचे कान्हा,
भगत रसखान बोले
रहीमदास
गूढ़ रहस्य को, दो शब्दों में खोले

गिरधर को
कह दो मुरलीधर, तो ना महिमा घटती।

http://www.sahityasudha.com/articles_aug_1st_2018/kavita/harihar_jha/radha.html
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