हरिहर झा

जुलाई 29, 2013

श्रृंगार करे उत्सव की रानी

Filed under: गीत,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:54 पूर्वाह्न

रिमझिम तरंग  की चलती टोली
इधर  हवा  में  बिखरी  रंगोली

लहरें हृदय की  उतर ना पायें
यह धरती और आकाश कम है
उछली जाती कहाँ मस्त मौजों !
दिल की खुशियाँ तो स्वयं हम हैं !

मन के कोने से  निकली परियां
कैसी  झूमें नाचें  हमजोली

गाये बजाये  सावन सुहाना
बाग में नशा  छाया है ऐसे
कलियाँ डोलती और बतियाती
घोलती शहद कानों  में जैसे

खड़ी है  मुखर  चाँद के  सामने
लजाते सुर में  चांदनी  भोली

श्रृंगार  करे उत्सव की रानी
सजाये काफिला  हँसते हँसते
मनचले  आशिक सा  पल्लू गिरे
बचता कईं बार  फँसते फँसते

घटा सुनहरी  पहनाये उड़ उड़
धरती को सुन्दर  घाघर-चोली