हरिहर झा

जून 17, 2008

उजाले तक

Filed under: हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:46 पूर्वाह्न
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सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक
दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक

लेपटोप पंहुच गये गांव में बस्ती में
मोबाइल हथेली में सब्जी दूध वाले तक

हेरी पोटर देख-देख सर्पीली तेज हवा चली
फैल गया दंश लहू में गोरे तक, काले तक

झेलते रहे भिड़न्त इस दुनियां के खेल में
तो गेंद देखो आ पहुंची दुश्मन के पाले तक

खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक

फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक

दरवाजे पे गमगीन हुये गोता हमने यूं खाया
कि चाबी पंहुच ही गई लटकते ताले तक

-हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/blog-post_02.html

For “The weather” :

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जून 1, 2008

आश्वासन

मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे
( नरक के बदले )
शायद चित्रगुप्त की भूल
या खिलाया
कम्प्यूटर ने गुल

नकली दया दिखाई थी
वो गई असल के खाते में
रिश्वत खाई वो पैसा गया
दान के एकाउन्ट में

हाय ! कर्मों का लेखा आया
कुछ ऐसे स्वरुप में
घपला ये हुआ कि
मन्त्री की छवि उभरी
सन्त के रूप में

अंधे के हाथ बटेर !
देखा, स्वर्ग में खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का नर्तन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का वर्तन

गंधर्व, किन्नर सब आये और गये
नहीं लगे अपने से
साकी और जाम
सब लगे सपने से

इच्छा हुई अपना झन्डा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की
अमीर ! गरीब !
पर शब्द हुये विलिन
न कोई अमीर था न कोई गरीब
हिम्मत कर बोले मन्दिर… मस्जिद…
पर सब अर्थहीन

जिबान बन्द रही
बैठे रहे मन मार
मानो काया पर हो रहा
छुरे भालों का प्रहार

अब लाइसेन्स, रिश्वत, घोटाला
सब गया
मानो गरम गरम तेल की
कड़ाही में शरीर झुलस गया

दो यमदूत और चित्रगुप्त अचानक दिखे
मन्त्रीजी उन पर ही बरस पड़े
“ऐसा होता है क्या स्वर्ग ?
नरक से भी बदतर !”

( क्रमश: )

आश्वासन 2

( पिछ्ली कविता का शेष )

चित्रगुप्त ने जवाब दिया
हँसते हुये –
“कैसा स्वर्ग मत्रींजी ! याद कीजिये आपने
देश के गद्दारो के साथ
पकाई खिचड़ी
आपको तो कुम्भीपाक में पकाया जायगा
आपने जनता से किये थे झूठे वादे
दिये थे आश्वासन
बदले मे यह नरक – स्वर्ग से उल्टा
स्वर्ग का शिर्षासन है
और ये मेनका-उर्वशी की छवियां
स्वर्ग का आश्वासन है ।

– हरिहर झा

– हरिहर झा
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“Who is wrong” and other 50 poems by further click:

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=56

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