हरिहर झा

सितम्बर 10, 2018

मन स्वयं बारात हुआ

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,विरहिणी,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:54 अपराह्न

गहरी नींद लगी
सोया तो
मैं स्वयं ही रात हुआ
प्यास पी गया बादल बन कर
मैं स्वयं बरसात हुआ

बंसी की
धुन सुन अंतस में
कितना आनंद समाया
खिलते स्वर की हुई बिछावट
स्थल नभ सब ने गाया
शांति अमन
जो दुल्हन थी तो
दिल का देव बना राजा
झंकृत होती तंत्री
ढोल की थपकी पर बजा बाजा

नाच नाच खुशियों से मेरा
मन स्वयं बारात हुआ

दर्द सहा
जब दुखियों का
तो पीड़ा नस नस में छाई
प्यार हुआ सुलझन से इतना
उलझन ने उलझन पाई
मधुर मधुर गाती लहरें जब
मेरे मन की मीत हुई
स्पंदन बनी वेदना फिर तो
पीड़ा खुद संगीत हुई
बिजली कौंधी
विलिन हुई,
खुद घावों को आघात हुआ

तरस गया
मुस्कान न आई,
मजा लिया बस रोने में
आँसू में बहता,
बचने को
ठाँव मिला ना कोने में
लगा पंख उड़ना चाहा तब,
फैला मैं आकाश हुआ
छुप न सका तो तन कर देखा
शत्रु का पल में नाश हुआ

जीतता हार हार कर यों
खेल स्वयं ही मात हुआ

http://sahityasudha.com/articles_nov_2016/geet/harihar_jha/man_svayam.html