हरिहर झा

सितम्बर 29, 2017

click2

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:27 पूर्वाह्न

Kritya-2    |  अनहदकृति     |   साहित्य-कुंज । boloji । अनुभूति । कृत्या। kritya |PoemHunter

हिन्द-युग्म | सृजनगाथा   । आखर कलश । काव्यालय । नवगीत  | साहित्य-सुधा

जुलाई 1, 2014

आधुनिक माँ: चन्द हायकू

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:46 पूर्वाह्न

किराये पर
माँ की कोख मिलती
भाड़ा कितना?

आया की सेवा
डाक्टर का इलाज
“माँ” एक पेशा?

नीति हैरान
कानून परेशान
गर्भ या फैक्ट्री

जड़ को खोजा
विश्व को जड़ पाया
चेतन शून्य

गीता में आत्मा
स्त्री या पुरूष नहीं
चाहो जो बनो

-हरिहर झा
http://www.lekhni.net/3407587.html

Towards the Sky

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=14303

अप्रैल 18, 2013

परदेस में होली

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:53 पूर्वाह्न

उदास मन के
साये में
होली खेली डरते डरते

“चैन न बिगड़े सोफे से”
रंगो का थैला बाँट दिया
बच्चों ने कुछ बात न मानी
गुस्से में आकर डाँट दिया

बिना मार ही
रोई मुन्नी
नीर नयन से झरते झरते

अवकाश नहीं, भागे ऑफिस
देर रात को थके थकाये
लेपटॉप में बोझिल ’खिड़की’
घर में खाना कौन पकाये

भूले हलवा
तंग आगये
बरगर पीज़ा चरते चरते

संडे को होली में, कह कर
हुल्लड़बाज विदेशी हमको
चुपड़े थे हम लाल गुलाबी
क्लिक किया अफसर ने हमको

पुलिस न पहचानी
हुलिये में
बचे इस तरह मरते मरते

-हरिहर झा

http://hariharjha.com/

जनवरी 4, 2012

त्योहार

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:50 पूर्वाह्न
Tags:

सद्भावना का इत्र सुगंधित इस फूल के हार में
रिमझिम बरस रही फुहार का , आनन्द त्योहार में

हार गई है रुदन-रागिनी मुस्काने झेल रही
सब के चेहरों पर हँसी की , फुलझड़ियां खेल रही

किरण निकली इन्द्रधनुष सी बादल से छन छन के
उजियारा लो फैल गया है गलियारे में मन के

चांदनी धरती पर दूध के सागर में नहा गई
साकीबाला छाई सजधज मधुशाला बहा गई

-हरिहर झा

जनवरी 1, 2008

विक्षिप्त

न मिली थी माँ की थपकियां
और अब खो दी
प्रेमिका की स्मित मुस्कान
तो चल पड़ा वह
आकांक्षा लिये विश्वविजय की
पत्थर सी जड़ आंखों में
एक  सपना दबाये
जिसमें मंद झकोंरों  से गुजरी किरण किरण
चंचल नयनो में  प्रतिबिम्बित  होती
उस मतवाली का
चेहरा उठाये
अधरों की ओंट से अधर जोड़ने की प्यास
चुहुल करते ली थी उसने अंगड़ाई
रंगीन छेड़छाड़ और बिखरते मोती
प्रेम का स्पन्दन

पर ह्दय को मसोस कर
दबा गया कोमल भाव
अकेलेपन का सताया
जब रिश्तों ने
झूठा नाटक रचाया
तो अलग थलग होकर
बिछाये थे जो अरमान
कुचल डाले उसने
अब तो चमक रही  युगल मीनारें गगनचुंबी
जो फैला रही खून से सनी हुई बाहें
डूबा वह शतरंज की क्रीड़ा में
मोहरा बना
जुनून से भरा उसका माथा पकड़ा उंगलियों ने
फूट पड़ा एक  दर्दनाक प्रतिशोध

जब बारूद बनी दमित कुंठा
विषमय बनी यौन पिपासा
ज्वाला चिंघाड़ी अन्तर्मन की गहराइयों से
अमंगल ही तो हुआ
पर हुआ जो धमाका
गाज गिरी जो मिट्टी को मथकर
राक्षस का उद्गम
जो सोंचता –
यह आतंकवादी दुनियां
क्यों मुझे ही कहती
आतंकवादी
मैं इसकी
सजा दूंगा
धमाकों से बरबाद होंगे
वे घरबार
सब के सब
दीवार बन कर
खड़े हैं  मेरे और उसके बीच
ये सड़क और गलियां
जो उसके पास
नहीं ले जाती
कर दूंगा इन्हे तबाह
और जो मरेगें
उसके स्वजन
उसके चाचा, मामा, ताउ
मामुली किसान और मजदूर का भेष धरे
मैं खत्म कर दूंगा यह धोखा
बन्दूक और बम गोले हैं
मेरा पुरूषत्व
अहा ! मुझे मिलेगी मेरी मंजील
कैसा विपल्व ? कैसी  विनाशलीला?
सब कुछ होगा कितना रोमान्टिक !
यह विस्फोट या संभोग?
मैं कोई विक्षिप्त नहीं ….

         -हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2007/12/blog-post_16.html

For A half poet

http://hariharjha.wordpress.com/2007/10/19/a-half-poet/

OR
http://hariharjha.wordpress.com

अक्टूबर 31, 2007

प्रिये तुम्हारी याद

Filed under: अनुभूति,गीत,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:15 अपराह्न
Tags: , ,

प्रेम पाशमय जीवन सुना कर जाने के बाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
झिलमिल स्मृति चित्र उभरते और सताते मुझको
अकुलाए से पंथ प्यार की राह जताते मुझको
झूम रहे वे नयन चकोरे मुस्काते फूलों में
झुला रहे मदभरे प्यार से हिलमिल के झूलों में

  
स्वर मधुर सब तेरे लगते सुन विहंग के नाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
व्यथित नयन बस जगे जगे से एक झलक की आस
रूप गंध कुछ स्पर्श  नहीं इस तनहाई के पास
स्वप्नों में जी भर देखा पर बुझी न उर की प्यास
दिवास्वप्न बुन बुन  कर मेरी पीड़ा बनी उदास

  
सहा न जाता एकाकी पल घिर आया अवसाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

       -हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/priye.htm

For  The terrible hurricane  click on:

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-terrible-hurricane/

OR

http://hariharjha.wordpress.com

सितम्बर 29, 2007

हरिहर झा › Create New Post — WordPress

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:36 पूर्वाह्न

सिडनी हिन्दी समाजहरिहर झा › सिडनी हिन्दी समाज द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन क्रूज़ में

जून 14, 2007

हम बहुत ही बोर हुये

Filed under: मंच,व्यंग्य,हास्य,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:45 पूर्वाह्न

बचपन की सहपाठिन मिल गई शुरू हुये ईमेल
बीवी ने जब बांच लिये तो खतम हो गया खेल

पूछपरछ मे धमधम गीरते बर्तन के खूब शोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

आफिसगर्ल  से पटते पटते जगी हमें कुछ आस
गड़प कर गया बॉस उसे तो हमे न डाली घास

कभी न दोनो मिल पाये फिर नदियों के दो छोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

सेलगर्ल ने बक्सा  खोला दिखलाये सब अंग 
अर्धागिंनी ने आधे में ही किया रंग मे भंग

तांक-झांक सब ऐसी पकड़ी नजरों के हम चोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

साकी बाला मुफ्त पिला कर कर गई मटियामेट
घर बिज़नेस न छोड़ा हमने उगल दिये सिकरेट

बुद्धि नशे मे भ्रष्ट हो गई मूर्खो के सिरमौर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

– हरिहर झा

Love is an illusion :

hariharjha.wordpress.com

or

http://hariharjha.wordpress.com/2007/06/20/love-is-an-illusion/

मार्च 29, 2007

भाग्य नहीं बदलता

Filed under: अतुकांत,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:04 पूर्वाह्न

         सच कहा है
नियति पर किसी का वश नहीं चलता
इंसान अपना भाग्य नहीं बदलता

पत्ता पत्ता इश्वर की आज्ञा से हिलता है
वह चाहे तो
बेमौसम फूल खिलता है

विधि का विधान
क्या बदलेंगे देवदूत
हाथ की लकिरें हैं
सिमेंट सी मजबूत

भले ही विज्ञान ने
दुनियां की शक्ल बदल डाली
दवाओं ने इंसान की
उम्र बदल डाली

पर बदलने वाले हैं वे जो अभी नासमझ हैं
 अक्ल के कच्चे हैं
जो दर्शन और संस्कृति के  ज्ञान मे
अभी बच्चे हैं

वे जूझते हैं टकराते हैं
धरती की धूल उड़ा कर
ग्रहों मे पत्थर ढुंढते हैं
चांद के बाद मंगल मे
क्या राशियों का मिलान ढुंढते है?

नादान !
समझ ले किस्मत का लिखा हुआ
किस्मत तेरे हाथ मे धरेगा
भाग्य मे लिखी इसी मंगल को मौत
तो तू मंगल को मरेगा

        
यह बात अलग
कि किसी टीके के प्रभाव मे
बीस साल बाद
तू बुध को मरा
तो भाग्य की बदलाहट को
जानेगा कैसे ?
बिना पढ़े भाग्य का परिवर्तन
पहचानेगा कैसे ?

कहेगा  किस्मत मे था सो हुआ
क्योंकि किस्मत से डरना था
समझेगा बुद्धू यही कि
तुझे बुध को मरना था।

–  हरिहर झा