हरिहर झा

जुलाई 18, 2017

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Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:00 पूर्वाह्न

Kritya-2    |  अनहदकृति     |   साहित्य-कुंज । boloji । अनुभूति । कृत्या। kritya |PoemHunter

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फुँफकारता है नाग

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:53 पूर्वाह्न

देह जलती
क्रोध में फुँफकारता है नाग
हर जगह क्यों फैलती
दुर्गन्ध देती आग?

कीचड़ सना कपास है
पर चल रही चरखी
जान कर नफ़रत गले में
निगलते मक्खी।

प्रेम रस के बिना सूखा
जल भरा तड़ाग

बेच सपने चढ़े ऊपर
सिंहासन शंकित
भेड़िये लो शपथ लेते
हो गये अंकित।

स्याही छोड़ी कुकरम की
फैलते हैं दाग।

बदलते परिवेश में
टकराये गागर-जल
सींचता आँसू नयन में
बिखरता काजल।

जलन फैली हर कली में
तड़पता है बाग।

http://anhadkriti.com/harihar-jha-poem-phunphkaarta-hai-naag

 

अगस्त 8, 2016

पगलाई आँखें ढूंढती

Filed under: अनहद-कृति,गीत,विरहिणी,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:54 पूर्वाह्न

 

पगडंडी के पदचिन्ह से भी
क्षितिज देखा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह

फूल सूंघे, छुअन भोगी
सपन का वह घर
कचनार की हर डाल लिपटी राह में दर दर
मधुरस पिया जम कर वहीं
छाया चितेरा जिस जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
डोर पर चलती
ठहरने के नहीं लायक
नट नटी का खेल
कैसा कर रहा नायक
साँस में हर, बीन सुनती
वह सँपेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
चीथड़ों के इस कफन में
चाँद चकनाचूर
सूरज धधकता
राख की आँधी उड़ी भरपूर
गहरी गुफा से याद का
मलबा उखेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-paglaayi-aankhein-dhoondhtee1

My Mistress:

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=18812

 

 

 

जुलाई 31, 2015

चुड़ैल

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:05 पूर्वाह्न
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नहीं बनाना मुझे सहेली-वहेली

खुश हूँ अपने आप में

अपने काम से काम

मेरा अंतर्मुखी स्वभाव इजाजत नहीं देता

यह क्या हो गया है मुझे पता नहीं

क्यों मैं अपने आप में सिमटती जा रही हूँ?

 

हार गई वह बेचारी

मेरा दुखी मन सहला-सहला कर

कितना मुश्किल है यह सब !

पर न उठी मेरे मन के गलियारे में

खुशियां और किलकारियां

तो सुना डाली उसने मुझे वह

टिमटिमाते तारों में छिपी कहानी

खोल दी अपनी अंतरंग दास्तान

चाहती तो बचा कर रख सकती थी

अपने पति को

जिसके पैरों की आहट थी

सौगात मेरे लिये

पर सहेलीनुमा विश्वास जीतने के लिये

भेजे ई-मेल

दिखा डाले उसने

अपने हनिमून पर लिये फोटो

कुछ विडम्बना ही हुई थी ऐसी

वह भी जानती है

उन फोटो में उसकी जगह पर

मैं हो सकती थी

 पर अंगड़ाई ली समय ने

 मैं पत्थर-दिल

सह गई सब कुछ

कब उठे और

कब अर्पित हुये भाग्य को

मेरे विद्रोह

एहसास भी न हुआ किसी छोर पर

पर अब मैं अनाप-शनाप

कुछ भी सोंचती हूँ

कि चुड़ैल है वह  !

पगला गई हूँ 

नहीं जान पाती

 कि क्यों चिड़ायेगी वह बच्चों की तरह

या जलायेगी मुझे

कि मेरा प्रेमी है उसके कब्जे में

भला क्यों छिड़केगी

जले पर नमक  ?

पर मैं हूँ कि कतराती हूँ

आँख चुराती हूँ उससे

अशिष्ट होती जा रही हूँ उसके साथ ।

जुलाई 1, 2014

आधुनिक माँ: चन्द हायकू

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:46 पूर्वाह्न

किराये पर
माँ की कोख मिलती
भाड़ा कितना?

आया की सेवा
डाक्टर का इलाज
“माँ” एक पेशा?

नीति हैरान
कानून परेशान
गर्भ या फैक्ट्री

जड़ को खोजा
विश्व को जड़ पाया
चेतन शून्य

गीता में आत्मा
स्त्री या पुरूष नहीं
चाहो जो बनो

-हरिहर झा
http://www.lekhni.net/3407587.html

Towards the Sky

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=14303

अप्रैल 18, 2013

परदेस में होली

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:53 पूर्वाह्न

उदास मन के
साये में
होली खेली डरते डरते

“चैन न बिगड़े सोफे से”
रंगो का थैला बाँट दिया
बच्चों ने कुछ बात न मानी
गुस्से में आकर डाँट दिया

बिना मार ही
रोई मुन्नी
नीर नयन से झरते झरते

अवकाश नहीं, भागे ऑफिस
देर रात को थके थकाये
लेपटॉप में बोझिल ’खिड़की’
घर में खाना कौन पकाये

भूले हलवा
तंग आगये
बरगर पीज़ा चरते चरते

संडे को होली में, कह कर
हुल्लड़बाज विदेशी हमको
चुपड़े थे हम लाल गुलाबी
क्लिक किया अफसर ने हमको

पुलिस न पहचानी
हुलिये में
बचे इस तरह मरते मरते

-हरिहर झा

http://hariharjha.com/

जनवरी 4, 2012

त्योहार

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:50 पूर्वाह्न
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सद्भावना का इत्र सुगंधित इस फूल के हार में
रिमझिम बरस रही फुहार का , आनन्द त्योहार में

हार गई है रुदन-रागिनी मुस्काने झेल रही
सब के चेहरों पर हँसी की , फुलझड़ियां खेल रही

किरण निकली इन्द्रधनुष सी बादल से छन छन के
उजियारा लो फैल गया है गलियारे में मन के

चांदनी धरती पर दूध के सागर में नहा गई
साकीबाला छाई सजधज मधुशाला बहा गई

-हरिहर झा

जनवरी 1, 2008

विक्षिप्त

न मिली थी माँ की थपकियां
और अब खो दी
प्रेमिका की स्मित मुस्कान
तो चल पड़ा वह
आकांक्षा लिये विश्वविजय की
पत्थर सी जड़ आंखों में
एक  सपना दबाये
जिसमें मंद झकोंरों  से गुजरी किरण किरण
चंचल नयनो में  प्रतिबिम्बित  होती
उस मतवाली का
चेहरा उठाये
अधरों की ओंट से अधर जोड़ने की प्यास
चुहुल करते ली थी उसने अंगड़ाई
रंगीन छेड़छाड़ और बिखरते मोती
प्रेम का स्पन्दन

पर ह्दय को मसोस कर
दबा गया कोमल भाव
अकेलेपन का सताया
जब रिश्तों ने
झूठा नाटक रचाया
तो अलग थलग होकर
बिछाये थे जो अरमान
कुचल डाले उसने
अब तो चमक रही  युगल मीनारें गगनचुंबी
जो फैला रही खून से सनी हुई बाहें
डूबा वह शतरंज की क्रीड़ा में
मोहरा बना
जुनून से भरा उसका माथा पकड़ा उंगलियों ने
फूट पड़ा एक  दर्दनाक प्रतिशोध

जब बारूद बनी दमित कुंठा
विषमय बनी यौन पिपासा
ज्वाला चिंघाड़ी अन्तर्मन की गहराइयों से
अमंगल ही तो हुआ
पर हुआ जो धमाका
गाज गिरी जो मिट्टी को मथकर
राक्षस का उद्गम
जो सोंचता –
यह आतंकवादी दुनियां
क्यों मुझे ही कहती
आतंकवादी
मैं इसकी
सजा दूंगा
धमाकों से बरबाद होंगे
वे घरबार
सब के सब
दीवार बन कर
खड़े हैं  मेरे और उसके बीच
ये सड़क और गलियां
जो उसके पास
नहीं ले जाती
कर दूंगा इन्हे तबाह
और जो मरेगें
उसके स्वजन
उसके चाचा, मामा, ताउ
मामुली किसान और मजदूर का भेष धरे
मैं खत्म कर दूंगा यह धोखा
बन्दूक और बम गोले हैं
मेरा पुरूषत्व
अहा ! मुझे मिलेगी मेरी मंजील
कैसा विपल्व ? कैसी  विनाशलीला?
सब कुछ होगा कितना रोमान्टिक !
यह विस्फोट या संभोग?
मैं कोई विक्षिप्त नहीं ….

         -हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2007/12/blog-post_16.html

For A half poet

http://hariharjha.wordpress.com/2007/10/19/a-half-poet/

OR
http://hariharjha.wordpress.com

अक्टूबर 31, 2007

प्रिये तुम्हारी याद

Filed under: अनुभूति,गीत,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:15 अपराह्न
Tags: , ,

प्रेम पाशमय जीवन सुना कर जाने के बाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
झिलमिल स्मृति चित्र उभरते और सताते मुझको
अकुलाए से पंथ प्यार की राह जताते मुझको
झूम रहे वे नयन चकोरे मुस्काते फूलों में
झुला रहे मदभरे प्यार से हिलमिल के झूलों में

  
स्वर मधुर सब तेरे लगते सुन विहंग के नाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
व्यथित नयन बस जगे जगे से एक झलक की आस
रूप गंध कुछ स्पर्श  नहीं इस तनहाई के पास
स्वप्नों में जी भर देखा पर बुझी न उर की प्यास
दिवास्वप्न बुन बुन  कर मेरी पीड़ा बनी उदास

  
सहा न जाता एकाकी पल घिर आया अवसाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

       -हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/priye.htm

For  The terrible hurricane  click on:

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-terrible-hurricane/

OR

http://hariharjha.wordpress.com

सितम्बर 29, 2007

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Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:36 पूर्वाह्न

सिडनी हिन्दी समाजहरिहर झा › सिडनी हिन्दी समाज द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन क्रूज़ में

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