हरिहर झा

सितम्बर 29, 2007

हरिहर झा › Create New Post — WordPress

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:36 पूर्वाह्न

सिडनी हिन्दी समाजहरिहर झा › सिडनी हिन्दी समाज द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन क्रूज़ में

सितम्बर 20, 2007

जहरीला सांप

Filed under: तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:07 पूर्वाह्न

भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप

उगले जहर घृणा का कितना नाप सके तो नाप

 

नीच इरादा पूरा करने लिया धरम का डंडा

निर्बल का लहू चूस रहा हट्टा कट्टा मुस्टंडा

बुद्धि बल कुछ नहीं पास में लिया हाथ मे डंडा

स्वारथ पूरा करने नित अपनाता ये हथकंडा

खून खराबे देख गया मानवता का दिल कांप

भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप

  

विधवा हो गई कईं सुहागिन जीवन अब दुश्वार

कितने बच्चे बिन मां के बस रोते हैं लाचार

मनचाही  मांगे रख दी फैलाया मृत्यु का डर

भोले भाले लोगों की हत्यायें करता कायर !

  

दूथ पिलाओ जहर उगल कर देता यह संताप

भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप

  

चूहा बहादुरी दिखाता छिपी ढ़ोल मे पोल

मानव जीवन की मर्यादा लहू मांस से तो

गीद्ध लोमड़ी कैसे जाने जीवदया का मोल

रावण, कंस की दानवता को लिया हृदय मे घोल

क्रूर इरादे शैतानों के भांप सके तो भांप

भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप

                                            (समर्पित  : आतंकवादियों को ) 

                                              हरिहर झा

  Who is “Lisa!”?read on :

  http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/14/lisa/ 

  OR

  http://hariharjha.wordpress.com     

सितम्बर 13, 2007

खिलने दो खुशबू पहचानो

Filed under: अनुभूति,तुकान्त,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:06 पूर्वाह्न

विषम स्थिति हो लोग पराये फिर भी सब मे ईश्वर जानो
भांति भांति के फूल जगत मे खिलने दो खुशबू पहचानो

 

अन्तरिक्ष में ज्वाला भड़की चांद सितारे अस्त हुए
महाकाल ने डेरा डाला देवलोक भी ध्वस्त हुए
शीत लहर में आहें सिसकी कैसा यह हिमपात हुआ
चरम अवस्थाओं के झूले घात गई प्रतिघात हुआ

 

कहा धरा ने संयम बरतो देखो जीवन को पहचानो
बगिया बोली कली प्यार की खिलने दो खुशबू पहचानो

 

धर्म मार्ग पर यथा बाल शिशु किलकारी भरते जाते
भक्तिभाव का रस पी पी कर आनंदित होकर गाते
छन्द ताल मे बहे नदी उन्मुक्त बहे गति से झरना
शब्द ब्रह्ममय जगत यहां बिन दाग चदरिया को धरना

 

पोंगा पंडित इतराया तुम वेदशास्त्र को क्या जानो
कहा जगत ने अरे इन्हे भी खिलने दो खुशबू पहचानो

 

जंजीरों मे घिरी नारियां हुई स्वतन्त्रता बेमानी थी
देवी कह कर फुसलाया शोषण की नीति ठानी थी
सूत्रपात हो क्रान्ति काआधीदुनियांको होश हुआ
प्रगति पथ पर अधिकारों की समता का उद्घोष हुआ

 

भोग्या नहीं, नहीं अबला है स्त्रीशक्ति को पहचानो
प्रेमस्रोत के फूल महकते खिलने दो खुशबू पहचानो 

 

हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_03/03_04pravishtiyan3.htm#hj 

 

For “Hunger – 3 Faces: (  Which one is 3rd Face?) 

http://hariharjha.wordpress.com/

OR

http://hariharjha.wordpress.com/2007/09/11/hunger-3-faces/

सितम्बर 6, 2007

धुमिल हो गये

Filed under: तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:33 पूर्वाह्न
Tags: ,

( युद्ध की विभिषिका से पीड़ितों को समर्पित ) 

टकरा लिये मौत से हरदम जीवन से अब हारे

आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे

क्रूर इरादे शैतानों के

कि्रड़ा करते रहे आग में

गोली तोपों की आवाजें

भर देते हैं दिल दिमाग मे

जूझ रहे हैं हालातों से ये नसीब के मारे

आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे

स्वार्थ किसी का बन चुड़ेल

करता है कैसी लीला

भूख गरीबी कंगाली

में देखो आटा गीला

फैल रही बिमारी ऐसी छुटे सभी  सहारे

आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे

भाई जुदा होगये

अकेलापन खाने को दौड़े

अंग जुदा हो गये

कि पीड़ा बरस रही या कोड़े

शहर हुआ श्मशान कि देखो कफन हमें पुकारे

आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे

                   

          हरिहर झा

For “The weather”

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-weather/

OR

http://hariharjha.wordpress.com