हरिहर झा

दिसम्बर 7, 2017

भीग लिया

Filed under: अनहद-कृति,गीत,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:03 पूर्वाह्न

घर पर रोज
नहाया यारो,
साबुन से घुल-मिल कर ख़ूब
बारिश में
कुछ भीग लिया,
क्यों नाराज़ मेरा महबूब।

क्या हो गया?
ज़ुकाम हुआ,
कभी निगोड़ी सर्दी।
झेला अन्तर्द्वन्द्व बहुत
मन की गुंडागिर्दी।
क्या समझूं कोई खींचे
तड़पाये बेदर्दी,
रक्त वर्ण कपोल,
उधर सिंदूर की पाबन्दी।

बहता झरना,
संभल न पाया
ख़ुद को छोड़ा, गया डूब।

बादल छाये ज़ुल्फ़ों से
तो बरसेगा पानी,
छुई-मुई थे अंग,
जुबां की अपनी मनमानी।
मुग्ध हुआ,
घेर रहा था
मुझ पर उसका साया,
डगमग हो गया नियंत्रण
तो संभाल न पाया।

फिसल पड़े पग पनघट से
या छलांग लगी नदी में कूद।
बारिश में कुछ भीग लिया,
क्यों नाराज़ मेरा महबूब।

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