हरिहर झा

जनवरी 1, 2008

विक्षिप्त

न मिली थी माँ की थपकियां
और अब खो दी
प्रेमिका की स्मित मुस्कान
तो चल पड़ा वह
आकांक्षा लिये विश्वविजय की
पत्थर सी जड़ आंखों में
एक  सपना दबाये
जिसमें मंद झकोंरों  से गुजरी किरण किरण
चंचल नयनो में  प्रतिबिम्बित  होती
उस मतवाली का
चेहरा उठाये
अधरों की ओंट से अधर जोड़ने की प्यास
चुहुल करते ली थी उसने अंगड़ाई
रंगीन छेड़छाड़ और बिखरते मोती
प्रेम का स्पन्दन

पर ह्दय को मसोस कर
दबा गया कोमल भाव
अकेलेपन का सताया
जब रिश्तों ने
झूठा नाटक रचाया
तो अलग थलग होकर
बिछाये थे जो अरमान
कुचल डाले उसने
अब तो चमक रही  युगल मीनारें गगनचुंबी
जो फैला रही खून से सनी हुई बाहें
डूबा वह शतरंज की क्रीड़ा में
मोहरा बना
जुनून से भरा उसका माथा पकड़ा उंगलियों ने
फूट पड़ा एक  दर्दनाक प्रतिशोध

जब बारूद बनी दमित कुंठा
विषमय बनी यौन पिपासा
ज्वाला चिंघाड़ी अन्तर्मन की गहराइयों से
अमंगल ही तो हुआ
पर हुआ जो धमाका
गाज गिरी जो मिट्टी को मथकर
राक्षस का उद्गम
जो सोंचता –
यह आतंकवादी दुनियां
क्यों मुझे ही कहती
आतंकवादी
मैं इसकी
सजा दूंगा
धमाकों से बरबाद होंगे
वे घरबार
सब के सब
दीवार बन कर
खड़े हैं  मेरे और उसके बीच
ये सड़क और गलियां
जो उसके पास
नहीं ले जाती
कर दूंगा इन्हे तबाह
और जो मरेगें
उसके स्वजन
उसके चाचा, मामा, ताउ
मामुली किसान और मजदूर का भेष धरे
मैं खत्म कर दूंगा यह धोखा
बन्दूक और बम गोले हैं
मेरा पुरूषत्व
अहा ! मुझे मिलेगी मेरी मंजील
कैसा विपल्व ? कैसी  विनाशलीला?
सब कुछ होगा कितना रोमान्टिक !
यह विस्फोट या संभोग?
मैं कोई विक्षिप्त नहीं ….

         -हरिहर झा

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