हरिहर झा

नवम्बर 29, 2007

प्यार गंगा की धार

Filed under: काव्यालय,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:14 पूर्वाह्न
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रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार
बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार

   
भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार
भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार

    
भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार
माँ की लीला कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार

   
प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार
छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार

  
क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम –
पुष्प के रस का तार
बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।

                -हरिहर झा

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नवम्बर 21, 2007

पतझड़ी-वसन्त

Filed under: अतुकांत,अनुभूति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:22 अपराह्न
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दुनिया वालों, सुनो सुनो
खूब मजे लो वसन्त ऋतु के
पर कुछ हमारी भी सुनो।
भारत क्या और चीन क्या
यूरोप और अमरिका क्या
“या निशा सर्वभूतानां”
जब सारी दुनिया
पसीने से तरबतर
तब हम ऑस्ट्रेलियावासी
लिहाफ ओढ़ते हैं
हीटर चलाते हैं
जब दुनिया ठन्ड से थर थर कांपती
तब हमें दिखते हैं ‘सी-बीच’ पर
अर्धनग्न नजारे
दिल कहे न…जा …ऱे …।

सिलिकन वेली के खिलते सुमन
और भारत के
अनजान कस्बे की कोयल
कंप्यूटर के वेबकेम पर
सुर में सुर मिलाती हैं
“वसन्त आया”
तब मेरी खिड़की से बाहर
सूखे पत्ते आवारा पशुओं की भांति
एक दूसरे पर गिरते हुये
भटकते हैं
तब जी चाहता है
सिर अपना सड़क पर
ठोक ठोक कर उल्टा चलुं
पैरों से सोच सोच कर
दिवाली में खेलुं फाग
और होली में पटाखें छोडूं
क्योंकि हम तो
ऑस्ट्रेलियावासी
धरती के निचले गोलार्ध में
मकड़ी की भांती
पैर जमीन से चिपका कर
उल्टे चलते हैं।

 -हरिहर झा

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नवम्बर 14, 2007

धरा पर गगन

Filed under: अनुभूति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:24 अपराह्न
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खुशियों की बौछार खिलखिलाता मौसम आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

देवालय पर पूर्ण चन्द्रमा अनहोनी यह बात
दीप जल रहे लगता निकली तारों की बारात
फुलझडि़यों की माला निहारिकाओं का आभास
फूट रहे पटाखे बम चलते कदमों के पास

युवकों की शरारत मस्ती का आलम छाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

चरणों में लक्ष्मी मैया के झुक झुक जाता माथ
मिठाइयां सूखे मेवे ले लेते भर भर हाथ
भागे दुख जंजाल छा गई दीप पर्व की माया
गोल घूम रहे ग्रह नक्षत्र स्वर्ग यहां लो आया

इन्द्रलोक की उर्वशी का नृत्य उतर आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

खेल रहे खिलौनों से बन वायुयान के चालक
नई नई पौशाक अकड़ते खेल रहे हैं बालक
इन्तजार था महिनों से कि कब आये दिवाली
लटक मटकते झूम बजाते दो हाथों से ताली

तोतली बोली शिशुओं की  कितना आनन्द समाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया।

 – हरिहर झा

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Smiled the Sun :

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नवम्बर 8, 2007

हम कवि हैं या मसखरे

हम कवि हैं या मसखरे
सब को हँसाते
जनता का दिल लुभाते
कविता याने कि कैसी हो
बहती नदी जैसी हो
पहले कविता लिखी छन्द में
बोले संपादक जी – अमां यार
कुछ नया लिखो कि कविता संवरे
क्या ये कलि और भंवरे!
गये कालिदास के जमाने
ये हटाओ नागफनी, लगाओ कैक्टस
मैंने देखा – सिसक रही कविता
दहेज की सताई सुहागिन की तरह
मैं बहुत रोया
शब्दों को अंग्रेजी में धोया
हर पंक्ति मुझसे सवाल पूछती
और बवाल मचाती
अपने चेहरे पर घाव दिखाती
तो चढ़ा दिये उस पर मुखौटे
अब कौन नीर भरी
कौन दुख की बदली
ऐसी लाइन पर लाइन बदली
कि ले आये सीधे
रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रक का हार्न
वेयर आइ वाज़ बोर्न !
गलत सलत
सब कुछ चलत
खड़े हो गये मंच पर
अध्यक्ष बोले – करो बातुनी स्त्रियों पर व्यंग्य
मैं रह गया दंग
आवाज आई – बोलो कुछ
पत्नी की राजनीति पर, नहीं..हनीमून में आपबीती पर
नहीं… नहीं… हिजड़ों की संस्कृति पर
तंग आकर हमने
एक जोक सुना दी – नोन वेजिटेरियन
जिसके आर पार
फूहड़पन का व्यापार
हुई तालियों की गड़गड़ाहट
मुझे घोषित किया – श्रेष्ठ कवि.. एक महाकवि
मैं खुश, श्रोता खुश
स्वर्ण-पदक दिया गया
हँसाती चैनल ने सराहा
पर भीतर से मेरा दिल कराहा
शरम आई मुझे अपनी सफलता पर
तीर चुभ गया
काश ! ऐसी प्रशंसा व्यंग्य में की होती
तो कविता की मेरे हाथों
दुर्गति न होती ।

http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/10/57-25-09.html

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