हरिहर झा

सितम्बर 27, 2011

पलाश के प्रति

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:54 पूर्वाह्न
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तुझ में आग
देखी, लगी मुझमें आग
लिये अपने अपने भाग
चल तो पड़े, मुश्किल बड़ी।

वन में तू
हिमकणों की, शीतल अग्नि !
तप रहा मैं,
गरमा रहा
तू इस तरह, मुस्का रहा
लगे दुल्हन,
दमकती यह लाल आभा
लगता है कि, शरमा रहा

रंगरेज ने तोहे का
कीन्हो लाल
लहू मेरा , क्रोध से लाल
तू तृप्त है, मैं बेहाल
मेरे गले आफ़त पड़ी।

नफ़रत लिये,
सारे जहाँ को, लूट लूँ मैं
चाह ऐसी छटपटाती
महक तेरी
विश्व भर में, प्यार देती
भव्य आभा कौंध जाती

धन्य बिजली !
धमनियों की त्रस्त बिजली
हा निगोड़ी पापिन जली
बेचैन मन दुख की कड़ी।

-हरिहर झा

I am Silent

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