हरिहर झा

अगस्त 15, 2008

भीग गया मन

Filed under: गीत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:11 पूर्वाह्न
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भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे
खुशियों की बौछार भले बाजी जीते या हारे

सांकल स्वर्ग द्वार पर लटकी ललक हुई हम तोड़ें
खुशियां अश्कों में प्रतिबिम्बित़ इन्द्रधनुष हम जोड़ें
अन्धेरे को धमकाता जब मोम संभल ना पाया
प्रेम धार ले दीपक ने तब ज्योति-पुंज बरसाया

सुख में डूबे, खूब नहाये बौछारों के मारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे

अन्तर्ध्यान हुये कर्कश सुर शुरु हैं कलरव गान
बोझिल भृकुटि ढीली पड़ गई फिसल पड़ी मुस्कान
“होगा प्रलय, मचे तबाही” डरा लिये सब झाँसे
गुम हुई बेदर्दी आवाजें घबराहट की साँसें

चिल्लाहट लो मौन हो गई शून्य हुये सब नारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे

तितली झूमे पंख लिये आमन्त्रण शिशु भावों को
दर्द मिट गये ऐसे मलहम लगते सब घावों को
शत्रु बन गये मित्र आ बसे ह्दय की बस्ती में
अमृत विष के भेद मिट गये मगन भये मस्ती में

मृदुजल कलश संजो कर रखे पी गये सागर खारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे

-हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/06/blog-post_20.html

 

A Spiritual Feel !

http://poetry.com/dotnet/P7382407/999/42/display.aspx

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अगस्त 1, 2008

डर

Filed under: अतुकांत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:16 पूर्वाह्न
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बड़ा ख्याल रखा
डर डर कर कि
तुम्हारी निरव वाणी के
सन्नाटे से मेरी
मुरझाई चेतना का संतुलन न बिगड़े
गीर न पड़ूं धम से
पर तुम्हारी निश्छल हंसी का
क्या भरोसा
जाने कब अपना दायरा भूल कर
छेड़ दे कोमल तन्तु
उजागर कर दे
उलझे अरमान
और बिखरी तमन्नायें …
अन्तस का पिघलता लावा
आंखों में उभार दे
इसलिये तो
जीवन को
स्वार्थी प्यार से
कस कर हथेली से दबाये
रोके रखा
डर बैठाया मन पर कि
क्या होगा अगर
सचमुच मैं मर गया तो ?
मेरी अकड़ और अहं का टूटना
या कि किताबी भाषा में … आत्मा का मिलन…
इससे तो बेहतर
क्यों न जी लें
हम अलग अलग शरीर में ।

            -हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/06/blog-post_06.html

 

सृजनगाथा में

http://www.srijangatha.com/2008-09/august/kavita-%20harihar%20jha.htm

Hunger And Gloom
http://poetry.com/dotnet/P8989404/999/2/display.aspx