हरिहर झा

नवम्बर 1, 2015

शहर में दिवाली

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:07 पूर्वाह्न
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लिये मुस्कान
’रोबो’ की
दिवाली खूब लहराई
हँसी लेकर मुखौटो पर
शहर की शान इतराई

रण में
दुंदुभी बज गई
बजे ’डीजे’ नगारों से
हुई मुठभेड़
कि अब कौन ,
पदक छीने हजारों से

कटारे बन गई
चितवन
उफन तलवार बौराई

पड़ा परशाद,
थाली पर
पकौड़े चाट की छाया
धुँआ सा छा गया पल में
कहीं बारूद फैलाया

बुझे दीपक,
रुदन करती
हुई ’शृंखला’ मँडराई

घिसे बर्तन सभी जग के,
चली लछमी धुँधलके में
दरस के नैन प्यासे थे
खुला उपहार बदले में

दिखी जर्जर हुई चूनर
सुबकती झील गहराई

पहन कर स्वर्ण,
खुशियों का
नया आयाम हाँसिल हो
धरम का स्वाँग
रच डाला
भले ही नजर कातिल हो

अकड़ से
दान देते ही
लटकती जीभ ललचाई

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-shehar-mein-diwali1

जुलाई 31, 2015

चुड़ैल

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:05 पूर्वाह्न
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नहीं बनाना मुझे सहेली-वहेली

खुश हूँ अपने आप में

अपने काम से काम

मेरा अंतर्मुखी स्वभाव इजाजत नहीं देता

यह क्या हो गया है मुझे पता नहीं

क्यों मैं अपने आप में सिमटती जा रही हूँ?

 

हार गई वह बेचारी

मेरा दुखी मन सहला-सहला कर

कितना मुश्किल है यह सब !

पर न उठी मेरे मन के गलियारे में

खुशियां और किलकारियां

तो सुना डाली उसने मुझे वह

टिमटिमाते तारों में छिपी कहानी

खोल दी अपनी अंतरंग दास्तान

चाहती तो बचा कर रख सकती थी

अपने पति को

जिसके पैरों की आहट थी

सौगात मेरे लिये

पर सहेलीनुमा विश्वास जीतने के लिये

भेजे ई-मेल

दिखा डाले उसने

अपने हनिमून पर लिये फोटो

कुछ विडम्बना ही हुई थी ऐसी

वह भी जानती है

उन फोटो में उसकी जगह पर

मैं हो सकती थी

 पर अंगड़ाई ली समय ने

 मैं पत्थर-दिल

सह गई सब कुछ

कब उठे और

कब अर्पित हुये भाग्य को

मेरे विद्रोह

एहसास भी न हुआ किसी छोर पर

पर अब मैं अनाप-शनाप

कुछ भी सोंचती हूँ

कि चुड़ैल है वह  !

पगला गई हूँ 

नहीं जान पाती

 कि क्यों चिड़ायेगी वह बच्चों की तरह

या जलायेगी मुझे

कि मेरा प्रेमी है उसके कब्जे में

भला क्यों छिड़केगी

जले पर नमक  ?

पर मैं हूँ कि कतराती हूँ

आँख चुराती हूँ उससे

अशिष्ट होती जा रही हूँ उसके साथ ।

अप्रैल 2, 2015

नाच हुआ पिपासा का

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:10 पूर्वाह्न
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प्रसव हुआ, भविष्य लिये
आई रंभाती रात
शिशु ने जग में पैर पसारे
मन का दर्पण लिये देह पर
कोई ज़िन्दगी निकल पड़ी।

वर्तन सीखे, भाषा सीखी
सच और झूठ का भान हुआ
बुरी नज़र पर आँख पड़ी तो
लिंग-भेद का ज्ञान हुआ।
खेल गये बचपन के, ख़ुद से
खिलौने-सा व्यवहार हुआ
विकृत हुई समझ, जो देखा
अपराधों का मान हुआ।

फैला जमघट कुकर्मों का
विभत्स हुयीं गलियाँ नुक्कड़
खुला आवरण नाक सिकोड़े
बही गन्दगी निकल पड़ी।

झूठे नापदंड बदन के
हावी हो गये बालिका पर
नग्न देह ललचाती नज़रें
दिल पर कितना आघात हुआ।
आई याद दादी की सीख
अपराध-बोध में लुढ़क पड़ी
माया नगरी, उलझ-उलझ मन
चकाचौंध से मात हुआ।

पत्थर-तोड़ बजी धुन ऐसी
नाच हुआ काम-पिपासा का
निर्वस्त्र देह से लाज लुटी
शातिर हुड़दंगी निकल पड़ी।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-naach-hua-pipaasa-kaa

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=152

जुलाई 1, 2014

आधुनिक माँ: चन्द हायकू

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:46 पूर्वाह्न

किराये पर
माँ की कोख मिलती
भाड़ा कितना?

आया की सेवा
डाक्टर का इलाज
“माँ” एक पेशा?

नीति हैरान
कानून परेशान
गर्भ या फैक्ट्री

जड़ को खोजा
विश्व को जड़ पाया
चेतन शून्य

गीता में आत्मा
स्त्री या पुरूष नहीं
चाहो जो बनो

-हरिहर झा
http://www.lekhni.net/3407587.html

Towards the Sky

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=14303

जून 4, 2014

टीस

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:54 पूर्वाह्न
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पड़ोस की वह अन्धी लड़की
पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?

टीस उठती है मेरे दिल में
इतना भी नहीं जान पाती वह
और जान कर करेगी भी क्या ?
देखने से तो रही बिना आंख के

वैसे वह जन्म से अन्धी नहीं
सहपाठिन थी मेरी
केमेस्टी की प्रयोगशाला में
हुई एक दुर्घटना
ऐसी अफवाह है
कि थी किसी की शरारत
पर जब वह पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?
फटती हैं मेरे दिल की नसें
चीर जाती हैं सीने की पसलियां
निकलती पीड़ा की बूंदें
समा जाती रक्त में
मैं पागल हो उठता हूँ ।

कभी कभी सोंचता हूँ
क्यों न उसके इलाज का खर्च भी
मैं उठा लूं
पर इतना भी संवेदना में
बह जाना
ठीक नहीं
क्यों कि इसमें मैंने… मैंने…
क्या किया था
इसका प्रमाण भी क्या है
कौन जानता है इसे?

हां, जो मैं भुगत रहा हूँ
इसका नाम है कुछ
गर्मी दिमाग में
कि लपलपाती वेदना की भाप
फेफड़ों से बाहर निकलने पर
श्वांस नली
चिल्लाती है
ऐसी टीस उठती है ।

http://www.anhadkriti.com/creator.php?cnum=314&knum=87

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=19308

अप्रैल 29, 2014

दूध का ऋण

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:17 पूर्वाह्न
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रोता रहा रात भर!
एक गहन अन्धेरी गुफ़ा से
अपना जीवन चुरा कर
भागा था।
फँस गया हूँ चक्रव्यूह में
वर्जनाओं के घेरे में।

दबे पांव चलने के बावजूद
उफनता दूध गिर पड़ा मेरे पैरों पर।
क्योंकि चुरा ले जा रहा था
मां का दूध, बिना ऋण चुकाये।
भाग निकला था…

कुछ दिखाई न दिया
आवरण में
टहनियों में छुपते-छुपाते…
तिमिर था गहन,
डाली काटने के बदले
हाथ काट लिया।

फिर, अपने से कट कर
‘मनमानी’ का तो अर्थ भी भूल गया
जिसका इल्ज़ाम ढो रहा था।
निर्दोष साबित करने में
झुलसाता रहा अपनी अक्ल को
उन्माद प्रतीत होता था सब को।

इस भटकन में,
डर के मारे,
देखता था तिरछी नजरों से
जहां पर सजा कर रखी थी
हर चोरी की चीज़।

जो ज़बरदस्ती बांध कर
थानेदार ने मेरे भेजे में उतारी थी,
वह भी
उस भेजे में
जिसमें थी केवल राख,
जो नानी माँ ने
घुट्टी में पिलाई थी।
चुपके चुपके सरक सरक कर
फैली है बदन में,
बनती है राह का रोड़ा
जिससे ठोकर खाये बिना,
ऐसे निकल जाना चाहता हूँ
कि कोई पदचाप भी न सुन पाये,
पकड़ा न जाऊँ।

जवाब तो है मेरे पास
सब की साज़िश का।
चला था दुनिया को मिटाने
खुद मर कर…
लेकिन रोक लेती है माँ मुझे।
जाने कहाँ से टपक पड़ी थी,
पिछली बार!
कंजूस बनिये की तरह,
क्योंकि,
बाकी ही तो था –
उसके दूध का ऋण।

अनहदकृति में   दूध का ऋण

 

The Heartache  in    boloji

जनवरी 8, 2014

मौसम

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:24 पूर्वाह्न
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सर्दी आई तो
सिकुड़ गये प्राण,
छिन गई हृदय की उष्मा
जिसमे पंखुड़ियां खिल खिल जाती थी|
अबोध चिड़िया मीठे गाती थी
बस, डरा धमका कर
कुरेद गई सिहरन से कम्पित घाव को,
खामोश रह कर देखता हूँ इस बदलाव को|

और अब महसूस करता हूँ बेचैनी से
गर्मी में करवट बदल बदल कर
पसीने में लथपथ जीजिविषा,
तबाही मची है
गतिमान हो कर बह निकली चासनी अंगप्रत्यंग से,
चिन्गारियों का यह सिलसिला
जाने कब तक जारी रहेगा,
कौन सुलझा पायेगा मौसम की
इन गुत्थियों को|

सामने संगमरमर की तराशी हुई मूर्ति
अपने ताज पर
सहनशीलता का भार लिये ऐंठी है,
चटख जाने के डर से
अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठी है|

बाग में पंखुड़ी
जो सहती है सब कुछ चुपचाप,
वीतरागी हो कर झुलस जाती है
उसके धर्मग्रन्थ मे यही लिखा है,
कि पंखुड़ी झुलसती है
फिज़ा में फिर से शामिल होने के लिये|

लेकिन जब कर दिया झुलसने से इन्कार
एकता के हार ने,
मूर्ति को गले में चुभना शुरू किया
और शोषण के लिये दी गहरी सज़ा
बदबू देकर लिया सताने का मज़ा
तो हर हालत में
दांत किटकिटाये
डरावनी सर्द रातों मे
या नफ़रत के गर्म अंगारों में।

-हरिहर झा
http://anhadkriti.com/creator.php?cnum=202&knum=87
Love is an Illusion
http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=18221

जुलाई 29, 2013

श्रृंगार करे उत्सव की रानी

Filed under: गीत,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:54 पूर्वाह्न

रिमझिम तरंग  की चलती टोली
इधर  हवा  में  बिखरी  रंगोली

लहरें हृदय की  उतर ना पायें
यह धरती और आकाश कम है
उछली जाती कहाँ मस्त मौजों !
दिल की खुशियाँ तो स्वयं हम हैं !

मन के कोने से  निकली परियां
कैसी  झूमें नाचें  हमजोली

गाये बजाये  सावन सुहाना
बाग में नशा  छाया है ऐसे
कलियाँ डोलती और बतियाती
घोलती शहद कानों  में जैसे

खड़ी है  मुखर  चाँद के  सामने
लजाते सुर में  चांदनी  भोली

श्रृंगार  करे उत्सव की रानी
सजाये काफिला  हँसते हँसते
मनचले  आशिक सा  पल्लू गिरे
बचता कईं बार  फँसते फँसते

घटा सुनहरी  पहनाये उड़ उड़
धरती को सुन्दर  घाघर-चोली

जून 4, 2013

साथ नीम का

Filed under: अनुभूति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:38 पूर्वाह्न
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पत्ता पत्ता रोयें जैसा
उँगली जैसी डाली
हरे रंग के दामन से लो चली
हवा मतवाली

विषकन्या नाचे धमनी में
निबौलियाँ शाखों में
अद्भुत छटा न देखी जाय
सुन्दरतम लाखों में
अजब गजब देती खुशहाली
छाया से रिस रिस कर बहती पूनम
रात उजाली

नीचे शिला ग्रामदेव की
झुके सभी का माथा
सुने पवन जो माटी बोले
एक विरानी गाथा
गाए अदभुत करे जुगाली
चरमर बिखरे पत्तों में, माया की
छाया काली

झाँक दिलों में देखे सबके
सपने ऊँचे ऊँचे
स्नेह उँडेला झगड़े टाले
इस छाया के नीचे
बज गई मौसम की करताली
सरबत कड़वा, स्नेह दूध सा, करती
है रखवाली।

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/neem/hariharjha.htm

http://www.navgeetkipathshala.blogspot.com.au/2013/05/blog-post_28.html
A Gulmohr Tree:
http://hariharjha.com/2007/02/11/a-gulmohr-tree/

मई 2, 2013

उपलब्धि

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:59 पूर्वाह्न
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डकार ली गड्डी नोटों की
फाँका चूरण थोड़ा

सिर पर पाँव धरे चढ़ना था
एक एक सीड़ी पर
हाथी के पैरों में पड़ कर
वार किया कीड़ी पर

लहूलुहान माथे पर आज
बरस रहा है कोड़ा

बमविस्फोट में नींद आई
बंसी ने झकझोरा
उमड़ घुमड़ कर भीगे बादल
मेरा पानी कोरा

जाऊँ मंगल पर विमान से
पंछी डालें रोड़ा

अश्वमेध से हाँसिल कर लूँ
सपनो ने भरमाया
पूर्णाहुति स्वयं की देकर
मन ही मन बौराया

हार गया जीवन से तो क्या
जीता मेरा घोड़ा

-हरिहर झा
http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=15673

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