हरिहर झा

जुलाई 11, 2018

कोपल की लाचारी

Filed under: गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:25 पूर्वाह्न

जंगल में मंगल है,
कच्ची कोपल की लाचारी
बन्दर की चौपाल जमा
पपिहा गाये दरबारी।

रामराज्य की
टांग खींच कर
कुत्ते मांगे वोट;
गिद्ध नोचते, करते
जिन्दा लाशों से विस्फोट;
बालक रोता रहे
ना मिल पाये जीवन की भीख;
कोई मरे या कोई जीवे ,
सुने ना कोई चीख;

चलदी कोई मासूम
झपटे लंपट व्यभिचारी।

चुगने की आशा में
रामू मन ही मन हरषाये;
भई निराशा, मनवा रोवे
फूल क्यों कुम्हलाये;
फुलवारी में
बगैर लछ्मी के
बीज मिले न खाद;
चप्पल घिसे रोज रोज की
पहुँचा ले कर फरियाद;
किसकी कुंडी खड़काये
द्वार न खोले दरबारी।

 

तिनका लिये
आया पंछी
सिर पर गीर गई गाज़;
रिक्त घोसला बिखरे दाने,
माली है नाराज;
छिपाये मुँह,
किराया बाकी,
पूछे आती लाज;
गिड़गिड़ाये,माफी मांगे पर,
घेर रहे हैं बाज;

माथा नीचा, दुष्टों का
माने खुद को आभारी।

http://www.sahityasudha.com/articles_may_1st_2017/kavita/harihar_jha/kopal_ki.html