हरिहर झा

फ़रवरी 26, 2007

पतझड़*

Filed under: अनुभूति,तुकान्त,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:15 पूर्वाह्न

 -हरिहर झा

आंसू मे डूबी वीणा ले मधुर गीत मै कैसे गाता
बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता

खेलकूद सब बेच दिया बस दो पैसों के खातिर
बहा पसीना थका खून खाने को तरस गया फिर
गिरवी रख कर बचपन मजदूरी से जोड़ा नाता
शाला कैसे जा पाता जब रूठा हाय< विधाता

तरस गया देह ढंकने को यूनिफार्म कहां से लाता
बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता

बस्ता लिये चला स्कूल मै सपना ऐसा देखा   
सोने के मेडल से चमकी अरे! भाग्य की रेखा
दिनभर शरीर झुलसाने के झगड़े हो गये दूर
भोंपू बजा कान मे मेरे सपने हो गये चूर

कैसे भूखा रह कर र्खचा फीस किताबों का कर पाता
बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता

किस्मत ऐसी कहां कि हंस कर किलकारी मैं भरता
रोज बाप की गाली खाकर पिट जाने से डरता
कैसे अपने आंसू पोछूं  नरक बना यह जीवन
गुमसुम सोच न पाता कैसे दुख झेले यह तनमन

मां बूढ़ी बीमार खाट पर उसे खिलाता क्या मै खाता
बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता।

1 जून 2005

*(संगीत-रूप में उपलब्ध)

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/patjhad.htm

http://narad.akshargram.com/archives/author/harihar-jha/

फ़रवरी 18, 2007

मां की याद

Filed under: अनुभूति,तुकान्त,मंच,साउथ एशिया टाइम्स — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:56 पूर्वाह्न

मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई
पंचतारा होटलों की शान शौकत कुछ न भाई

  
बैरा निगोड़ा पूछ जाता किया जो मैंने कहा
सलाम झुकझुक करके मन में टिप का लालच रहा
खाक छानी होटलों की चाहिए जो ना मिला
करोध मे हो स्नेह किसका?  कल्पना से दिल हिला

प्रेम में नहला गई जब जम के तेरी डांट खाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई

तेरी छाया मे पला सपने बहुत देखा किए
समृद्धि सुख की दौड़ मे दुख भरे दिन जी लिए
महल रेती के संजोए शांति मैं खोता रहा
नींद मेरी छिन गई बस रात भर रोता रहा

चैन पाया याद करके लोरी जो तूने सुनाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई

लाभ हानि का गणित ले जिंदगी की राह में
जुट गया मित्रों से मिल प्रतियोगिता की दाह में
भटका बहुत चकाचौंध में खोखला जीवन जिया
अर्थ ही जीने का अर्थ, अनर्थ में डुबो दिया

हर भूल पर ममता भरी तेरी हंसी सुकून लाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई।

 -हरिहर झा
16 मई 2006

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mamtamayi/maakiyaad2.htm

फ़रवरी 16, 2007

चुप हूं

Filed under: अनुभूति,मंच,शेर,साउथ एशिया टाइम्स — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:06 अपराह्न

खुल कर रोया था जनमने के बाद
हालात अब ये है कि बरसों से चुप हूं।

अंदाज़े-बयां था कातिल का जुर्म किसका है
सामने उसके उसका नाम लेने से मैं चुप हूं।

भूखा पेट मेरा और डकार लेने को कहा
चूहा पेट का न दिख जाय इसलिए मै चुप हूं।

सोचा था हंस हंस कर पियेंगे ग़म के आंसू
सैलाब ग़म का आया इसलिए मैं चुप हूं।

दिल से दरिया-ए-इश्क बहा देने के बाद
कहा कि अब अश्क बहा इसलिए मैं चुप हूं।

घाव पर मलहम के बदले नमक छिड़का
ये भी क्या कम है खुदा कि मैं चुप हूं।

गुनाह बहाना बना नए गुनाह करने को
फंसा दलदल मे पर ये तमाशा कि मैं चुप हूं।

क्या बोलूं जब पूछा खुदा ने गुनाहों का सच
सच केवल इतना ही कि तू पूछे और मैं चुप हूं।

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/chup.htm

प्रीत के गीत

Filed under: अनुभूति,तुकान्त,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:57 अपराह्न

कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी
दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा
चांदनी श्वेत परिधान से सज गई
खिलखिलाता पवन छेड़ता ही रहा

इठलाती डालिया मन्द मन्द झूलती
दो हृदय बांध कर गुदगुदाने लगी
सरिता भी कलकल का स्वर सजाती हुई
छलछल के नाद से गीत गाने लगी

पेंजनिया छमछम बजने बजाने लगी
अवनि के हृदय में ज्वार उठने लगा
कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी
दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा

आया मधुमास अब कलियां बोराई
प्यार के वार में छटपटाने लगी
वसन्त आया तो बहकती झुमती
मदिरा के प्यालों सी डगमगाने लगी

बिंबों प्रतिबिंबों के चंचल से चितवन मे
सृष्टि का सूर्य भी मुस्कराने लगा
कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी
दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा

दूर किसी प्रेम मन्दिर के देव की
सुमधुर घंटियां झनझनाने लगी
नृत्य करती रति मृदंग की थाप पर
मधुकर के गीत की धुन सुनाने लगी

ताल गंुजती हुई लय डुबाती हुई
तन थिरकता रहा मन चहकने लगा
कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी
दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_02/02_04pravishtiyan6.htm#hj

गुनगुनी धूप है

Filed under: अतुकांत,अनुभूति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:51 अपराह्न

अलगाई लतिका ने
वृक्ष के सीने को
ले लिया बाहों में
हंस पड़ा पवन
मुस्काया मन ही मन
रात तो है जा चुकी
अब गुनगुनी धूप है

क्षीर का स्नान कर
विदा ली थी चांदनी ने
भेज गई सुरभि
गुलाब की पंखुड़ी में
सेज की गंध घुली
बोराए बहार में
गाने लगे अलि
झूम रहे तितली पर

उभरी थी प्रीत कभी
सपनों की सरगम से
निशा की डराती
गुफा से गुजरता
दहकती दुपहरिया की
स्वेद का समागम
गंगा की;, गगन की
गहराई में
यही गुनगुनी धूप है।

रजनी निगोड़ी
पोत गई थी कालिमा
अवनि के मुख पर
शबनमी आंसू बहा
रोती मचलती बावरी
कोन पोंछे कालिमा अब
कोने पोंछे आंसुओं को
मीठी मीठी सुबह आई
हर्षमय उल्लास देती
सौन्दर्य का उपहार देती
गुनगुनी यह धूप है।

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_01/01_04pravishtiyan1.htm#hj

रावण और राम

Filed under: अतुकांत,अनुभूति,साउथ एशिया टाइम्स — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:40 अपराह्न

अमरत्व की आकांक्षा से लथपथ रावण
कांचन कामिनी के पीछे भागता
अहं- 
जो धुएं की लकीर
उसे बचाने के लिये सारी रात जागता

रंगोली को ंमिट्टी समझ
मिटा देता यहांवहां
दस मुखों वाली पहचान
बेचारा छुपाएगा कहां!

घबराता सूर्य से
उसे जीत लेने का दंभ भरता
झूठी तसल्ली के लिए
उसका दास की गिनती मे आवाहन करता

कलुषित भाव कुछ दे न पाया
पर झनकती तमन्ना सिर निकालती
खुजालखुजाल कर पीड़ा को
सुख पाने की इच्छा पालती

मृगतृष्णा का छोर न मिला
पाप पुण्य से कैसे लड़े?
सिंहासन डगमगाने लगा
मृत्यु के देव सामने खड़े

तो छोड़ कर अपनी काया
ज़मीर के कण बिखेरता हुआ
घुलमिल गया हम सब की अस्थिमज्जा में
नखशिख तक वही लंकेश
अपनी पूरी साज़सज्जा में

बस, अब मन का राम
मुदित, सुरक्षित
साथ में रावण
तो अब फिर से
अयोध्या का राज छोड़ कर
राम जंगल नहीं मांगेगा
धोबी के कहने पर
सीता को नहीं त्यागेगा

लो, वृत्तियों की वानरसेना को मिला
लंकादहन का काम
अब भीतर ही भीतर लड़ लेंगे
रावण और राम।

-हरिहर झा

16 अक्तूबर 2006

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/ravanaurraam.htm

ऐसा बोर सैयां

Filed under: अतुकांत,मंच,व्यंग्य,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:51 पूर्वाह्न

रंग फेका लाल गुलाबी
वो वेवलेन्थ की बात करने लगा
बुद्धु नादान सैयां
आइन्स्टीन को मात करने लगा

मैंने छोड़ी पिचकारी
वो हवा के दबाव की बात करने लगा
खिला दी मैंने कुछ मिठाई
शुगर की चिन्ता दिनरात करने लगा

गिनी चुनी लकडि़यां
भाई लोगों ने इकठ्ठा की
जलती होली देख कर
पर्यावरण की बात करने लगा  

समझाया असत्य पर
सत्य की होती विजय
होलिका जली प्रह्लाद बच गया
वो फायरप्रूफ कपड़ों की बात करने लगा

फिल्मी स्टार झूमे नाचे
दे गये होली का रंग
देखी मस्ती टी वी पर
टी वी के एन्टेना की बात करने लगा

गीत कवित्त भजन
होलीरस मे डुबा गये
हुल्लड़टोली की गाली सुन कर
भाषाव्याकरण की बात करने लगा 

राधा किशन का होलीरास
मथुरा मे शुरू होने लगा
ऐसा बोर सैयां 
वो द्वारका की खुदाई की बात करने लगा

 हरिहर झा
मार्च 15ई 2005

http://www.hindinest.com/kavita/2003/091.htm

मित्र !

Filed under: अतुकांत,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:53 पूर्वाह्न

                          

मित्र !
हम तो चले थे
उस नकली
और मशीनटाइप जिन्दगी से दूर
बाइसिकल उठाये
सैर पर
सारी औपचारिकताओं को छोड़ कर
दिल की बात करने
पर ट्यूब टायर मे फंसे कांटे
दुख अपना कैसे  बांंटे

मित्र !
हम तो चले थे
अंर्तमन की लिप्सा को
सुरों मे बांधते हुये
शरमलोकाचार की दीवार लांघते हुये
फूहड़ फिल्मी गीतों से गला फाड़ते हुये
बेसुरे राग मे
अब सुनसान
इस नदी किनारे बैठ कर
अगर रोया या गाया
तो हंस पड़ेगी
हमारी ही छाया।

मित्र !
बहुत हो गई
मीठी कोयल की तान
खूब कर लिया
खुले आसमां का बखान
प्रकृति मे एकरूप होने का दावा
मानसिक शांति का बहलावा
कच्ची और कांटेदार सड़क पर
धूल फांकते हुये
अब पैदल ही चलो
भीष्म बनी कांटो से बिद्ध
साइकिल रगड़ कर
थोड़ा गुस्से से भड़क कर
पर थोड़ा
मन ही मन बिगड़ते हुये
अब वापस चलो मित्र <

-हरिहर झा
15 अप्रेल 2004
मित्र!  हरिहर झा  पुरस्कृत
http://www.hindinest.com/kshala/014/14ks3.htm
 

निकल कन्दराओं से

Filed under: तुकान्त,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:40 पूर्वाह्न

निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
वात्स्यायन के कामसूत्र सूरतुलसी मीरा के पद

सोंच रहा नवनीत ज्ञान का पास है फिर भी दूर
पा न सकूं पर यत्न किये जाने पर हूं मजबूर
 

जीवन क्या? मृत्यु क्या? क्यों बन्धन हैं इस काया के
मोक्ष मिले तो कैसे? कब चक्कर छुटें माया के

अहं ब्रह्म को याद किया दिल हुआ हर्ष से गद्गद्
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद

देवपुत्र होने का मुझको चढ़ा कभी अभिमान
डारविन की खोज कहे मै बन्दर की संतान

त्यागतपस्या ब्रर्ह्मचय को जब आदर्श बनाया
खगमृग जैसी कामवासना फ्रायड ने बतलाया

कीटपतंगो़े सा नरजीवन नीत्शे ने कर दी हद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद

कहां ज्ञान को सरल बनाने रामकथा रच डाली
रामराम रट छुरी बगल मे बस आडम्बर खाली

शब्दों के रेशों की डोरी खुद को बंधता पाया
हर पुस्तक जंजीर बनी कारागृह मन को भाया

पोथी लिख लिख हुआ मुझे लो ब्रह्मा होने का मद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद।

  -हरिहर झा
अगस्त 15, 2005
 

http://www.hindinest.com/kshala/015/15ks2.htm
 

मदिरा ढलने पर

Filed under: तुकान्त,मंच,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:28 पूर्वाह्न

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

प्यास बुझाने पानी मांगा
अमृत की अब चाह नहीं

नन्हा दीपक साथ मे हो
आवश्यक जगमग राह नहीं

मौत आये यों सजधज कर
फिर र्स्वगलोक मे क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

दुनिया मे नहीं कोई पराया
सब के सब अपने देखे

सबकी यादें मीठी मीठी
फिर मिलने के सपने देखे

क्या खूब लुभाती मृगतृष्णा
तृप्ति मिलने पर क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

निंदक नियरे पानी बन कर
चित साफ करें धोयंे विकार

शत्रु भी कर दें सावधान
हों पग बढ़ने को जब तैयार

खलनायक मे जब राम छिपा
प्रभु प्रगट हुये तो क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

कांटे भी रक्षा करने को
तैयार खड़े हैं होशियार

फूलों का उपवन क्यों चाहूं
हर कलि सुगंधित है अपार

जुगनू की जगमग अति सुन्दर
पूनम की रात मे क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

 -हरिहर झा
मई 1 2005

http://www.hindinest.com/kavita/2005/101.htm

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