हरिहर झा

अप्रैल 29, 2014

दूध का ऋण

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:17 पूर्वाह्न
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रोता रहा रात भर!
एक गहन अन्धेरी गुफ़ा से
अपना जीवन चुरा कर
भागा था।
फँस गया हूँ चक्रव्यूह में
वर्जनाओं के घेरे में।

दबे पांव चलने के बावजूद
उफनता दूध गिर पड़ा मेरे पैरों पर।
क्योंकि चुरा ले जा रहा था
मां का दूध, बिना ऋण चुकाये।
भाग निकला था…

कुछ दिखाई न दिया
आवरण में
टहनियों में छुपते-छुपाते…
तिमिर था गहन,
डाली काटने के बदले
हाथ काट लिया।

फिर, अपने से कट कर
‘मनमानी’ का तो अर्थ भी भूल गया
जिसका इल्ज़ाम ढो रहा था।
निर्दोष साबित करने में
झुलसाता रहा अपनी अक्ल को
उन्माद प्रतीत होता था सब को।

इस भटकन में,
डर के मारे,
देखता था तिरछी नजरों से
जहां पर सजा कर रखी थी
हर चोरी की चीज़।

जो ज़बरदस्ती बांध कर
थानेदार ने मेरे भेजे में उतारी थी,
वह भी
उस भेजे में
जिसमें थी केवल राख,
जो नानी माँ ने
घुट्टी में पिलाई थी।
चुपके चुपके सरक सरक कर
फैली है बदन में,
बनती है राह का रोड़ा
जिससे ठोकर खाये बिना,
ऐसे निकल जाना चाहता हूँ
कि कोई पदचाप भी न सुन पाये,
पकड़ा न जाऊँ।

जवाब तो है मेरे पास
सब की साज़िश का।
चला था दुनिया को मिटाने
खुद मर कर…
लेकिन रोक लेती है माँ मुझे।
जाने कहाँ से टपक पड़ी थी,
पिछली बार!
कंजूस बनिये की तरह,
क्योंकि,
बाकी ही तो था –
उसके दूध का ऋण।

अनहदकृति में   दूध का ऋण

 

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