हरिहर झा

अप्रैल 27, 2007

विसंगति

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:27 पूर्वाह्न

भूखे श्वान गुर्राते हैं
चांद चुपचाप खिसकने लगा हैं
इस शहर मे
कुछ लाशें जिन्दा इंसानो को
दफनाती हैं
कुर्सियां इंसानों की गर्दनपर बैठ कर
शान से अकड़ती है।
समझ मे नहीं आता
क्यों लगाई है लगाम
खिलते फूलों शाखों पत्तियों पर
क्यों ?

मेरी क्षुब्ध आत्मा तड़पती है
चिल्लाती है मेरी
फड़फड़ाती  हुई  आवाज।

जवाब मे 
नोच न पाने की पीड़ा से
व्यथित हो कर
भूखे श्वान
मुझे
संडासे से पकड़ कर
श्वानवाहन मे धकेल कर
दूर जंगल मे छोड़ आते हैं ।
  
             – हरिहर झा

For A spiritual feel :

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अप्रैल 19, 2007

नंगा बोल पड़ा

Filed under: तुकान्त,मंच,व्यंग्य,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:12 पूर्वाह्न

                       
कंगला डूबा चिन्ता मे तू मुझे लूट कर क्यों ले जाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

रिश्वत भ्रष्टाचार से पनपे नेताजी की बात
पकड़े गये पद मन्त्री का अब कैसे मारें लात
भाषणबाजी लगे झाड़ने दिन देखा ना रात
अन्तरात्मा को घसीट  की विरोधियों पर घात

आत्मा की आवाज कहां की हाय गरीब की सुन ना पाय
 नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

बुद्धूराम समझ बैठे खुद बुद्धि के अवतार
दो और दो को तीन बतायें समझें खुद होंशियार
अक्ल बड़ी या भैंस कहें तो भैंस बड़ी है यार
समझाया तो गुस्से मे आकर कर देंगे वार

खाली भेजे मे भी चिन्ता उनका भेजा कोई न खाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

धरम के ठेकेदार चले हैं ध्वजा धरम की थाम
छुरी छुपाई बगल में मुख से लिया राम का नाम
दौड़े सुख की चाह मे वृत्ति रही काम या दाम
मन मे हरि को खोज न पाये ढूंढे चारो धाम

नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने को जाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय़।

                           – हरिहर झा

अप्रैल 14, 2007

मेरी मर्जी

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:31 पूर्वाह्न

मै स्वतन्त्र हूं
अपनी मर्जी का मालिक
गीता पढ़ुं या नमाज
कहां का कैसा समाज
जो डाले मुझ पर दबाव
यह मै और मेरा स्वभाव ।

मुझे है सड़ीगली प्रथाओं से परहेज
यह बात अलग
कि खुद अपनी इच्छा से
बेटी के लिये दे रहा दहेज
बड़े आये तुम  हड्डी मे कबाब
कैसा और कोनसा दबाब
अपना घर फूंक कर
पितरों की शांति के लिये
बुलाता पन्डितों की फौज
शान से करवाता मृत्युभोज
भाड़ मे जाय समाजसुधार
मेरा स्टेटस, मेरा अहम्
मै जो करूं मेरी मर्जी ।

हां मर्जी गई भाड़ मे
जब जीन्स पहने कोई ग्रामीणबाला
तो करदो उसका मुंह काला
रचाये ब्याह उंचे  कुल में
नीचे  कुल की छोरी
या विधवा बने फिर से दुल्हन
हमारा करेगी मानमर्दन
तो काट कर रख देगें गर्दन
रहे अपनी मर्जी से अकेली
पति के नाम पर आंसू बहाकर
या अब लो जीवनमरण का प्रश्न
कोई अपनी इच्छा से
होना चाहे सती
तो धर लेगें मौन
दबाव देने वाले हम कौन
उसके प्राण  उसकी मर्जी  ।

भीतर का आतंकवादी
भावनाओं का करता ब्लेकमेल
और चिल्लाता
मुझे किसी ने बहकाया नहीं
फंसाया नहीं
गुमराह नहीं किया
मजहब के लिये मैं करता आत्मबलिदान
दुनियां, समाज और यह परिवेश
क्या करें  ?
जो मै करता वह मेरी मर्जी ।

                        – हरिहर झा

अप्रैल 6, 2007

भरम भारी पिटारा खाली

Filed under: मंच,व्यंग्य,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:11 अपराह्न

राजनीति के दावपेंच मे चला अगर ना सिक्का  जाली
लोग हमीं को देंगे गाली भरम भारी पिटारा खाली

जम कर जेब भरो आखिर कुर्सी के लिये बहाया धन
लाइसेंस हो नोनसेंस  गर  खाया  नहीं  कमीशन
इन्कमटेक्स की रेड गिरा कर करवा दो बस चर्चा
बिटिया की शादी मे कर दो कईं करोड़ का खर्चा

कमी रह गई शादी मे कुछ काला धन जो किया न खाली
लोग हमीं को देंगे गाली भरम भारी पिटारा खाली

टिकिट खरीदा रोकड़ा देकर खड़ा हुआ इलेक्शन में
कहां की जनसेवा? वसुल दुगुना करने के टेन्शन में
विरोधियों की नाक काट दो फांस लो किसी फन्दे में
झुठमुठ इल्जाम लगा दो गड़बड़ कर दी चन्दे मे

टृक मे भर भर लोग मंगाओ भाषण मे जो बजे न ताली
लोग हमीं को देंगे गाली भरम भारी पिटारा खाली

विधायकों को पेटी दे कर बैठूं मन्त्री के पद पर
नई योजनायें बन कर क्रान्ति हो कोरे कागद पर
सब के सब दलबदलु खरीद लिये हैं अच्छे दामो में
खाक बना नेता जो धन लुटे ना उलटे कामो में

नक्शे में तुम नहर दिखादो दिखी वहां जो गन्दी नाली
लोग हमीं को देंगे गाली भरम भारी पिटारा खाली

झूठे  वादे  रोजी रोटी  बेघर  को  छत  देने
निजी स्वार्थ को पूरा करने हाथ उठे मत देने
बला कौनसी वैश्वीकरण समझ नहीं कुछ आता
सेवक हूं मै जनता का भारत का भाग्यविधाता

हर शाख पे उल्लु बैठा हो उस बाग की कौन करे रखवाली
लोग हमीं को देंगे गाली भरम भारी पिटारा खाली।
 

                                            -हरिहर झा