हरिहर झा

जून 4, 2014

टीस

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:54 पूर्वाह्न
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पड़ोस की वह अन्धी लड़की
पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?

टीस उठती है मेरे दिल में
इतना भी नहीं जान पाती वह
और जान कर करेगी भी क्या ?
देखने से तो रही बिना आंख के

वैसे वह जन्म से अन्धी नहीं
सहपाठिन थी मेरी
केमेस्टी की प्रयोगशाला में
हुई एक दुर्घटना
ऐसी अफवाह है
कि थी किसी की शरारत
पर जब वह पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?
फटती हैं मेरे दिल की नसें
चीर जाती हैं सीने की पसलियां
निकलती पीड़ा की बूंदें
समा जाती रक्त में
मैं पागल हो उठता हूँ ।

कभी कभी सोंचता हूँ
क्यों न उसके इलाज का खर्च भी
मैं उठा लूं
पर इतना भी संवेदना में
बह जाना
ठीक नहीं
क्यों कि इसमें मैंने… मैंने…
क्या किया था
इसका प्रमाण भी क्या है
कौन जानता है इसे?

हां, जो मैं भुगत रहा हूँ
इसका नाम है कुछ
गर्मी दिमाग में
कि लपलपाती वेदना की भाप
फेफड़ों से बाहर निकलने पर
श्वांस नली
चिल्लाती है
ऐसी टीस उठती है ।

http://www.anhadkriti.com/creator.php?cnum=314&knum=87

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=19308

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