हरिहर झा

अप्रैल 2, 2015

नाच हुआ पिपासा का

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:10 पूर्वाह्न
Tags: , ,

प्रसव हुआ, भविष्य लिये
आई रंभाती रात
शिशु ने जग में पैर पसारे
मन का दर्पण लिये देह पर
कोई ज़िन्दगी निकल पड़ी।

वर्तन सीखे, भाषा सीखी
सच और झूठ का भान हुआ
बुरी नज़र पर आँख पड़ी तो
लिंग-भेद का ज्ञान हुआ।
खेल गये बचपन के, ख़ुद से
खिलौने-सा व्यवहार हुआ
विकृत हुई समझ, जो देखा
अपराधों का मान हुआ।

फैला जमघट कुकर्मों का
विभत्स हुयीं गलियाँ नुक्कड़
खुला आवरण नाक सिकोड़े
बही गन्दगी निकल पड़ी।

झूठे नापदंड बदन के
हावी हो गये बालिका पर
नग्न देह ललचाती नज़रें
दिल पर कितना आघात हुआ।
आई याद दादी की सीख
अपराध-बोध में लुढ़क पड़ी
माया नगरी, उलझ-उलझ मन
चकाचौंध से मात हुआ।

पत्थर-तोड़ बजी धुन ऐसी
नाच हुआ काम-पिपासा का
निर्वस्त्र देह से लाज लुटी
शातिर हुड़दंगी निकल पड़ी।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-naach-hua-pipaasa-kaa

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=152