हरिहर झा

जून 15, 2010

नाटक

Filed under: अतुकांत,आखर कलश — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:07 पूर्वाह्न
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समन्दर पार कंटीली झाड़ी के पीछे
झोपड़ी के आंगन में
भले सताती चिन्तायें और बढ़ती धड़कन
पर जहां मिलती थी
प्रेम की सौगात
चाहता तो ले लेता
हँसते हुये
लेकिन ठहराव से विद्रोह कर के
यहां तो फंस गया दुविधा में
धुंधलाई शाम में बीयर की बोतल खुलने पर
चांद ने
जब अंधियारे को चूमा
तो मेरी शान से सजाई हुई
बत्तियों को
अस्तित्व का खतरा नजर आया
मैंने मुँह बिचका लिया
तन गई एक एक नस
जिसकी थकान ही
लिख डालती सलवटें बिस्तर पर ।

जागते हुये देख रहा हूँ सपना कि
नींद नहीं आती डालर के नोटो पर
कितनी अच्छी थी बाजरे की रोटी
सरसों का साग
अब यहां पर
हर मुस्कान शिष्टाचार के विरुद्ध है
और खुश होने का अर्थ
देशद्रोह , एक घमन्ड, एक पाखन्ड
जो कविता की आत्मा के खिलाफ है
तो भीगो ले अपने तकिये
स्वार्थ पर प्रेम की और
देह पर आत्मा की जीत के लिये
भोग पर अध्यात्म की जीत के लिये
रोना न आये तो रो ले
ग्लीसरीन लगा कर !
समझ ले !
टपकते आँसू एक संस्कृति है ।
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http://aakharkalash.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html

Folly of the wisdom

http://hariharjha.wordpress.com/2007/11/08/folly-of-the-wisdom/

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