हरिहर झा

मई 8, 2018

मैली हो गई बहुत चदरिया

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:43 अपराह्न
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मैली हो गई बहुत चदरिया।
मृगजल पीया, संजोया मन में
प्यास कहाँ बुझ पाये
भर भर पानी खींचा फिर भी
जाने क्यों तृषा जलाये

मुरली की धुन कौन सुनाये
अंगारों से भरी गगरिया।

रावन बैठा है दिल में
छल चला परायों अपनों में
बम-गोले ले निकला
उससे जूझ रहा हूँ सपनों में

बूझा ना शत्रु , लड़ने निकल पड़ा
शस्त्रों की बाँध गठरिया ।

जाऊँ कहाँ घना अंधेरा
उड़ती मिट्टी पथरीली
काजल भरा लबालब मन में
राहें भी होती गीली

ढूँढू कहाँ कहाँ, पीड़ा को
दूर भगा देने का जरिया

तनातनी , भीतर कोई थपकी
दे कहता ताली दो
कण्ठ लबालब भरे बिफरते
जी भरकर गाली दो

नाटक किया ज्ञान पाने का
पहन खड़ाऊँ, उठी लकुटिया।

http://sahityasudha.com/articles_july_2nd_2017/kavita/harihar_jha/maili_ho.html