हरिहर झा

जुलाई 31, 2015

चुड़ैल

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:05 पूर्वाह्न
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नहीं बनाना मुझे सहेली-वहेली

खुश हूँ अपने आप में

अपने काम से काम

मेरा अंतर्मुखी स्वभाव इजाजत नहीं देता

यह क्या हो गया है मुझे पता नहीं

क्यों मैं अपने आप में सिमटती जा रही हूँ?

 

हार गई वह बेचारी

मेरा दुखी मन सहला-सहला कर

कितना मुश्किल है यह सब !

पर न उठी मेरे मन के गलियारे में

खुशियां और किलकारियां

तो सुना डाली उसने मुझे वह

टिमटिमाते तारों में छिपी कहानी

खोल दी अपनी अंतरंग दास्तान

चाहती तो बचा कर रख सकती थी

अपने पति को

जिसके पैरों की आहट थी

सौगात मेरे लिये

पर सहेलीनुमा विश्वास जीतने के लिये

भेजे ई-मेल

दिखा डाले उसने

अपने हनिमून पर लिये फोटो

कुछ विडम्बना ही हुई थी ऐसी

वह भी जानती है

उन फोटो में उसकी जगह पर

मैं हो सकती थी

 पर अंगड़ाई ली समय ने

 मैं पत्थर-दिल

सह गई सब कुछ

कब उठे और

कब अर्पित हुये भाग्य को

मेरे विद्रोह

एहसास भी न हुआ किसी छोर पर

पर अब मैं अनाप-शनाप

कुछ भी सोंचती हूँ

कि चुड़ैल है वह  !

पगला गई हूँ 

नहीं जान पाती

 कि क्यों चिड़ायेगी वह बच्चों की तरह

या जलायेगी मुझे

कि मेरा प्रेमी है उसके कब्जे में

भला क्यों छिड़केगी

जले पर नमक  ?

पर मैं हूँ कि कतराती हूँ

आँख चुराती हूँ उससे

अशिष्ट होती जा रही हूँ उसके साथ ।

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मई 1, 2012

लिखना बाकी है

Filed under: गीत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:40 पूर्वाह्न
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शब्दों के नर्तन से शापित
अंतर्मन शिथिलाया
लिखने को तो बहुत लिखा
पर कुछ लिखना बाकी है

रुग्ण बाग में पंछी घायल
रक्त वमन जब बहता
विभत्स में शृंगार रसों की
लुकाछिपी खेलाई
विद्रोही दिल रोता रहता
दर्द बहुत ही सहता
फिर भी लफ्जों को निचोड़ कर
बदबू ही फैलाई
खाद समझ नाले से मैंने
कीचड़ तो बिखराया
किन्तु हाय! गन्ध फूलों की
बिखराना बाकी है।

साफ करूंगा वस्त्र भाव के
बचपन में कुछ सोंचा
किन्तु आज तक मैले कपड़े
धूल हटा ना पाया
दुर्गंध भरे, बिखरे बालों
को कितना भी नोचा
निर्मल करे सुभाये ऐसा
कुछ भी लिख ना पाया
ज्योत जलाने चला भले ही
अंधकार में डूबा
अब तक घने तिमिर की परतें
खुल जाना बाकी है।

कागद ने खुश होकर नभ के
रहस्य खूब उभारे
स्याही में डूबा तो, अचरज
पंछी खुद को पाया
ले आई आकाश में कलम
दुबका डर के मारे
उड़ ना पाया मुक्त हवा में
गड्ढे में घुस आया
बहुत किया डबरे में छपछप
थक कर यों पछताया
सागर से उठती लहरों को
छू लेना बाकी है

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2012/04/blog-post.html
A Half Poet :
http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=330

सितम्बर 24, 2009

मण्डी बनाया विश्व को

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:14 पूर्वाह्न
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लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

क्रेन पर ऊँचा चढ़ा कर, चैन उसकी क्यों तोड़ दी
दर्शन बनाया लोभ का , मझधार नैया छोड़ दी
ऋण-यन्त्र से मन्दी बढ़ी, डॉलर नदी में बह लिया
अर्थ के मैले किनारे,   नाच से सम्मोहित किया

बहकता उन्माद सिर पर, क्यों हमें बहका न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

है सैज सिक्कों की बनी, सब बेवफ़ायें सो रही
मण्डी बनाया विश्व को, निलाम ’गुडवील’ हो रही
गर्मजोशी बिकी, जादू सौदागरी का चल गया
शेयरों से आग धधकी, ज्वाला में लहू जल गया

तड़पता सूरज दहक कर कहो क्यों झुलसा न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

’उपभोग’ की जय जय हुई, बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना ’सामान’ और , रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला विज्ञापन की, हर कोई यहाँ फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर, विषकन्या-रूप  डँस लिया

फैकी गुठली रस-निचुड़ी, कहो  क्यों ठुकरा न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post_7797.html

Hunger – 3 Faces

http://hariharjha.wordpress.com/2007/09/11/hunger-3-faces/

मार्च 11, 2009

अभागी मैं

Filed under: अतुकांत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:36 पूर्वाह्न
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मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर
मेरा स्वत्व छिन कर ले गये
बेडि़यां उतारने के बहाने
कुछ नई बेडियां जोड़ गये
भोली मैं
अपनी खुशी की दुनियां में
फुदकती रही चहकती रही
अपने केशों को मर्दों की तरह
छोटा कर
जीती रही एक छलावा
पुरूषाये वस्त्र पहन कर
देती रही अपने को
एक भुलावा

भूल गई
घर के साथ दोहरा शोषण
हो रहा आफिस के काम पर
तडा़क सा किया तलाकित
अधिकार देने के नाम पर
ताकि तुम मुझे
सिंगल मदर या
अविवाहित मा के रूप में
छोड़ कर
मुझसे अपनी नजर मुड़ा सको
नन्हा गुल मुझे सौप कर
गुलछर्रे उड़ा सको।

मैं जिन्दा थी
केवल रिश्तों के नाम पर
फूल पत्तियों से लदी
अपनी जड़ से विहिन
पर व्यक्तित्व देने के बहाने
नोचते रहे पत्तियों को मेरी शाखों से
चिपकाते रहे
ब्यूटीसेलुन के लोशन से
नकली फुल मेरी देह पर
प्रतियोगी मापदंड बना कर
निहारते रहे अपनी आंखो से।

वस्त्रों के आवरण पर आवरण
मुझे ओढ़ा दिये थे
स्वामी होने की भावना से
आदिम पुरूष ने
कि कोई मुझे
झपट न ले
बनाये थे काराग्रह मेरे चारो और
मै नाईटक्लब की बाला सी
देखती रह गई
जब तुमने एक एक भारी आवरण को उतार कर
मुझे हल्का किया बादलों सा
पर उतारते उतारते
यह क्या किया तुमने
उतार ली मेरी चमड़ी तक
कभी फेशन के नाम पर
कभी स्वतन्त्रता के नाम पर
और अभागी मै
वस्तु थी
बच्चे की पैदाईश के लिये
वस्तु रह गई
दुनियां की नुमाइश के लिये।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/01/blog-post_6976.html

Let Them Blossom

http://boloji.com/poetry/3001-3100/3061.htm

सितम्बर 1, 2008

कम्प्यूटर कविता लिखेंगे!

एक युग था
कवि
कविता क्या लिखता था !
भावों को व्यक्त करता था
संवेदनशील मन से
पीड़ा को मथता
तब गंगोत्री से
कविता की धारा बहती
भावनाओं का संचार
फलीभूत होता था

अब गये
पतवार चलाने के दिन
चरखा कातते थे गांधी बाबा
गये चरखे के दिन
अब अन्धाधुन्ध कारखानो से
निकलती कपड़ों की थान
देखो कम्प्यूटर पर
दर्जन कविता की शान

अब कवि लिखेंगे सोफ्टवेयर
सोफ्टवेयर लिखेगा कविता
धड़ाधड़ ले लो
कविता-सविता
भावों और शब्दों की खिचड़ी बना कर
खायेंगे चटखारे लेकर
हिंसक और
विभत्स
आई सी चिप्स से निकलते रस
उल्टी करते रस ;
फड़फड़ा उठेगें
राइम और रिथम
शब्दों को बिलोते औजार
नोचेंगे शैली का जिस्म
अब कवि की क्या बिसात !
कम्प्यूटर कविता लिखेंगे
लेपटोप तालियां बजायेंगे ।

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/07/blog-post_04.html
For “Hobbits disappeared!” and other poems :
 
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=53

मई 1, 2008

गुम हुये होबिट

Filed under: अतुकांत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:21 पूर्वाह्न
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सोंचा था ईश्वर ने
दुनियां हो रंगीन
ना रहे कोई एकाकी
जानवर तो जानवर
फिर नर क्यों अकेला?
जैसे हाथी और घोड़ा
कबुतर और चिडि़या, बंदर और गुरिल्ला
आदमी के साथ करो कुछ फिट
पर लुप्त हो गये – गुम हुये होबिट ।

क्या अच्छा न होता कि
होमो-सेपियन के अलावा
एक दूसरी तरह का नाइंसान इंसान
जो इन्सान जितना जानवर न हो
पर इन्सानियत में कम न हो !
डर गया विधाता
एक बुद्धू – याने बुद्धिशाली आदमी
बना बैठा हिन्दू-मुसल्मां
बामन-शूद्र – अलगअलग नस्ल….
आगया जो दूसरी तरह का इंसान
फिर कैसे रोक पायेगा खुले आम
हत्या, मारपीट
बजेगी ईट से ईट
तो क्या होगा?
मानव पियेगा लहू
और होबिट खायेगा मीट
गुम हुये होबिट ।
होबिट ने सीखा खानापकाना
गुमसुम होकर
मानव के सामने सिर झुकाना
होबिट-मानव भाई-भाई
पड़ न जाय भारी कीमत चुकाना
बड़ी चालु चीज़ है आदमी – करेगा चीट
गुम हुये होबिट ।

मुख में बुद्ध
भीतर से क्रुद्ध
इंसान-इंसान में
होता विश्वयुद्ध
लाखों लोगों को
एटम की गर्मी में
भूनेगा
पकायेगा
खा पायेगा इतना !
सोंच कर यही मर जायगा होबिट
गुम हुये होबिट ।

वे संतुष्ट थे झोपड़ी में
जंगल में
समृद्धि के तनाव से मुक्त;
ये तो इन्सान चिढ़ गया
ऐसे भोलेपन पर
उदारता का ढोंग रच कर
जाने क्या लाद दिया
होबिट पर
कहती किंवदंतियां
वे थे “नरक के वासी”
न होबिटस्तान मांगा
न और कुछ
तीन या चार फिट के ये वामन –
नन्हे ठिगने बौने लोग
धरती छोड़ गये – विशाल
एक नन्हे ठिगने बौने दिल वाली
लालची नस्ल के लिये
बस गुम हुये होबिट।

– हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/03/blog-post_21.html

For “Cheers Or Jeers”
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=41
OR
http://hariharjha.wordpress.com/2007/04/02/cheers-or-jeers/