हरिहर झा

नवम्बर 1, 2015

शहर में दिवाली

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:07 पूर्वाह्न
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लिये मुस्कान
’रोबो’ की
दिवाली खूब लहराई
हँसी लेकर मुखौटो पर
शहर की शान इतराई

रण में
दुंदुभी बज गई
बजे ’डीजे’ नगारों से
हुई मुठभेड़
कि अब कौन ,
पदक छीने हजारों से

कटारे बन गई
चितवन
उफन तलवार बौराई

पड़ा परशाद,
थाली पर
पकौड़े चाट की छाया
धुँआ सा छा गया पल में
कहीं बारूद फैलाया

बुझे दीपक,
रुदन करती
हुई ’शृंखला’ मँडराई

घिसे बर्तन सभी जग के,
चली लछमी धुँधलके में
दरस के नैन प्यासे थे
खुला उपहार बदले में

दिखी जर्जर हुई चूनर
सुबकती झील गहराई

पहन कर स्वर्ण,
खुशियों का
नया आयाम हाँसिल हो
धरम का स्वाँग
रच डाला
भले ही नजर कातिल हो

अकड़ से
दान देते ही
लटकती जीभ ललचाई

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-shehar-mein-diwali1

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नवम्बर 4, 2011

मनवा क्यों नाच रहा

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:36 पूर्वाह्न
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खून शहर का निसार
सपनों की लाली पर
मनवा क्यों नाच रहा
शीशे की थाली पर

दारू की बोतल में
जिजीविषा हार गई
फड़फड़ है घायल तन
नाजुक मन मार गई
लुटा गई जिस्म यहाँ
भँवरे की गाली पर

’हाँसिल हो’ ये बुखार
जीते हैं मरते हैं
भूतों के अड्डों में
अट्टहास करते हैं
महलों के ख़्वाब चले
जगते हैं ताली पर

निबटाते काम-काज
थक कर यों चूर हुये
सुस्ताते, सोच रहे
घर से क्यों दूर हुये
मछली से आन फँसे
सिक्कों की जाली पर

– हरिहर झा

नवगीत की पाठशाला से साभार :
http://navgeetkipathshala.blogspot.com/2011/07/blog-post_25.html

Pleasure or Pain?

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=2802