हरिहर झा

मई 27, 2017

सूना रस्ता नैन तके

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:02 पूर्वाह्न
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सपनों में सुन शरमाये
पियु की ठकुर सुहाती
रोये दे कर उपालंभ
फिर मन में हरसाती।

सोचे कैसा हरजाई
संग लगा रे दुश्मन
सूना रस्ता नैन तके
फड़फड़ काँपे चिलमन।

छोड़े कजरा नैनन को
रिश्ते सब सौगाती।

प्यास जगाता ओस पिला
ऐसा सावन ठगिया
आँसू हँसते कोपल पर
दंश उगाती बगिया।

बैरी बादल पी जाता
नदियाँ जो बरसाती।

धरती रेगिस्तान हुई
बारिश पर पाबन्दी
ढलक न पाई मोती बन
कोई बूंदाबांदी।

कलियाँ सूखे पतझड़ में
दिल का दर्द सुनाती।

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