हरिहर झा

मई 27, 2017

सूना रस्ता नैन तके

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:02 पूर्वाह्न
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सपनों में सुन शरमाये
पियु की ठकुर सुहाती
रोये दे कर उपालंभ
फिर मन में हरसाती।

सोचे कैसा हरजाई
संग लगा रे दुश्मन
सूना रस्ता नैन तके
फड़फड़ काँपे चिलमन।

छोड़े कजरा नैनन को
रिश्ते सब सौगाती।

प्यास जगाता ओस पिला
ऐसा सावन ठगिया
आँसू हँसते कोपल पर
दंश उगाती बगिया।

बैरी बादल पी जाता
नदियाँ जो बरसाती।

धरती रेगिस्तान हुई
बारिश पर पाबन्दी
ढलक न पाई मोती बन
कोई बूंदाबांदी।

कलियाँ सूखे पतझड़ में
दिल का दर्द सुनाती।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-KUU1415-soona-rasta-nain-takey

 

अगस्त 8, 2016

पगलाई आँखें ढूंढती

Filed under: अनहद-कृति,गीत,विरहिणी — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:54 पूर्वाह्न
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पगडंडी के पदचिन्ह से भी
क्षितिज देखा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह

फूल सूंघे, छुअन भोगी
सपन का वह घर
कचनार की हर डाल लिपटी राह में दर दर
मधुरस पिया जम कर वहीं
छाया चितेरा जिस जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
डोर पर चलती
ठहरने के नहीं लायक
नट नटी का खेल
कैसा कर रहा नायक
साँस में हर, बीन सुनती
वह सँपेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
चीथड़ों के इस कफन में
चाँद चकनाचूर
सूरज धधकता
राख की आँधी उड़ी भरपूर
गहरी गुफा से याद का
मलबा उखेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-paglaayi-aankhein-dhoondhtee1

My Mistress:

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=18812