हरिहर झा

मार्च 20, 2009

मौत का एहसास

Filed under: गीत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:43 पूर्वाह्न
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मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

धमनियां फैली शीरा में
काल की गुर्राहटें भी
देह बुनता लाल चादर
राख में हैं सलवटें भी
फिर दिखी फूलों की माला
डालती सांसों पे ताला

फिसलने लगी जीजिविषा
लो चरमराती हड्डियों पर
मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

फलसफा अपना बनाकर
भीड़ को सौंपे जो नारे
सृष्टि अपनी ही रची
मैंने बनाये चाँद तारे
ढह गई फिर से दीवारें
हिल उठे वे खंडहर भी
धमाके से स्वर्ग आई
जल चुकी जो लाश चलकर
मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

-हरिहर झा

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