हरिहर झा

मार्च 22, 2017

रूह में लपेट कर

Filed under: अतुकांत,अनहद-कृति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:19 पूर्वाह्न
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धुंआ-धुआं हो रहा श्मशान की ओर
पर पालकी में बैठी दुल्हन
अपने आंचल में सपने संजोये
मृगनयनों से अपने पुरूष को निहारती
एक बर्फ़ीली आँधी से अनजान
रसवन्ती उमंगों से भरी
पपीहे की ओर इशारा करती
खो गई घुमड़ती घटाओं में।

जब कि मलमल के रेशों के भीतर छुपी
जर्जर खटिया में फँसती कोमल त्वचा
अभ्यस्त हो गई पीड़ा के लिये
पर यह छलावा…
आस्था को हिलाती
प्यार में बनावटी आतुरता
और इसके
रेशमी स्वप्नों से निकलते काँटे
हो गये असहनीय!
हृदय की व्यथा
और तन्हाई को डूबोती रही
आँसुओं में
इधर वेदना बहा ले गई
दिल की हसरतें।

फिर युग की आँधी में
उड़ती कलम ने
श्मशान की आग को
केवल स्थानान्तरित किया
बुझाया नहीं…।
ताप अपनी रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह
ग़ज़ब की हिम्मत!
चुकाई भारी कीमत
श्मशान की आग को
रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह!

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