हरिहर झा

अप्रैल 15, 2009

प्यार गंगा की धार

Filed under: काव्यालय,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:02 पूर्वाह्न
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रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार
बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार

    
भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार
भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार

  
भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार
माँ की लीला कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार

     
प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार
छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार

    
क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम –
पुष्प के रस का तार
बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।

        -हरिहर झा

pleasure or pain?

http://boloji.com/poetry/4001-4500/4085.htm 

http://hariharjha.wordpress.com/2008/03/31/pleasure-or-pain/

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फ़रवरी 12, 2009

चिड़चिड़ी

Filed under: अतुकांत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:16 अपराह्न
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केवल उंगलियां देख कर
घबराती ग्वालिन
देख रही अपनी ’मौसी’ का चेहरा –
आग-बबूला
पहाड़ से लुढ़कते पत्त्थर सा क्रोध
उफनती नदी खो चुकी अपनी शालिनता
काँपते हुये हिरन के बच्चे
कुलांचे भरते
देखते कगार पर अपनी मृत्यु
कत्लगाह से छुट पाने की विफलता पर
बैठे अनमने हो कर
पलकें एकटक
जिनके बोल खो जाते कहीं धुएँ में ।

देखा था मौसी ने –
ऋषि-मुनियों के यज्ञ की आहुति का धुआँ –
टकराते चकमक पत्थर से निकलती
अग्नि से प्रज्ज्वलित हवन
जिसके साथ जुड़ी प्रार्थना और श्रद्धा ने ही
बददिमाग कर दिया मौसी को
अब तो कण्डे के उपले भी
जल कर उसे देने लगे हैं
तंग करती हुई गुदगुदी
क्यों नहीं सह पाती
अपने लाड़ले बेटों की शरारत ?
कहती है –
“सिगरेट सा यह धुआँ !
क्यों छोड़ते हो अधोवायु
तुम्हारी बिना बैल की गाड़ी से ?
और तु्म्हारे कारखानो के
इन मशीन-पुर्जों में
हाय राम !
खुद ही पीसी जा रही हूँ
कब तक जलाऊंगी अपनी चमड़ी
और अस्थियां !
बड़ी तकलिफ देते हो मुझे !
कहे देती हूँ
मरोगे बिना मौत
मैं आगा-पीछा नहीं देखती
गुस्से में
शुरू कर दूंगी
मेरा काली-नृत्य शुरू
तो फिर कोई शिव की छाती
रोक नही पायेगी
मेरे पैर !”

सठिया गई है मौसी
देखी नहीं जाती उससे
हमारी प्रगति
हमारी समृद्धि और विकास
कोढ़ के मरीज सी
बदसूरत हो चली
चिड़चिड़ी मौसी ।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2008/10/blog-post_17.html
her teasing face:
http://www.poetry.com/dotnet/P8989404/999/4/display.aspx
http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/

नवम्बर 29, 2007

प्यार गंगा की धार

Filed under: काव्यालय,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:14 पूर्वाह्न
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रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार
बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार

   
भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार
भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार

    
भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार
माँ की लीला कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार

   
प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार
छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार

  
क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम –
पुष्प के रस का तार
बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।

                -हरिहर झा

http://manaskriti.com/kaavyaalaya/pyaar_gangaa_kee_dhaar.stm
For “My mother!”  click:

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/my-mother/

OR
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अक्टूबर 31, 2007

प्रिये तुम्हारी याद

Filed under: अनुभूति,गीत,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:15 अपराह्न
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प्रेम पाशमय जीवन सुना कर जाने के बाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
झिलमिल स्मृति चित्र उभरते और सताते मुझको
अकुलाए से पंथ प्यार की राह जताते मुझको
झूम रहे वे नयन चकोरे मुस्काते फूलों में
झुला रहे मदभरे प्यार से हिलमिल के झूलों में

  
स्वर मधुर सब तेरे लगते सुन विहंग के नाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
व्यथित नयन बस जगे जगे से एक झलक की आस
रूप गंध कुछ स्पर्श  नहीं इस तनहाई के पास
स्वप्नों में जी भर देखा पर बुझी न उर की प्यास
दिवास्वप्न बुन बुन  कर मेरी पीड़ा बनी उदास

  
सहा न जाता एकाकी पल घिर आया अवसाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

       -हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/priye.htm

For  The terrible hurricane  click on:

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अगस्त 23, 2007

प्यार की उमंग

Filed under: गीत,तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:58 पूर्वाह्न
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मोम की कसक जो दर्द बन गई

पिघलपिघल लौ से दूर हो गया

आंसुओं की गर्मी से कराह कर

खण्ड मे बंटा तो चूर हो गया

   

रागरागिनी के लय विलय हुये

छटपटाता भाव मौन हो गया

ग्रीष्म चूसता रहा समुद्र को

अंधकार चांद ही को डस गया

     

लड़झगड़ नदी सुमेरू श्रृंग के

केश घने खींच कर पकड़ रही

वायु भय से कांप कर लिपट रही

पर्वतों  की चोंटियां जकड़ रही

       

सुन विलाप जलप्रपात जब हंसा

क्यों हंसा जो गिर रहा पाताल मे

अन्तर्मुखी हो सुन रहा गाती हुई

माधुरी के स्वर अनोखी ताल में

   

किरन भी यह देख कर के हंस उठी

हंस उठी आकाश की गहराईयां

दूर हुई छिटक करके बह गई

खो गई लो गमो की परछाईयां

      

कलि मुस्कुराई देख कर सभी

चेहरे  खुशी से खिल रहे भले

चांदनी नजर मिलाती चांद से

फूल तितलियों से  मिल रहे गले

   

अभिसार  अर्चना का रूप ले

मेघ की उड़ान नृत्य बन गई

दामिनी का नृत्य प्यार हो उठा

प्यार की उमंग फिर बहक गई।

-हरिहर झा

For “Blackens your Face” read

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अगस्त 10, 2007

शरमा रहा

Filed under: तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:43 पूर्वाह्न
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पौ फटी नभ लाल हो कर सूर्य से शरमा रहा

चांद गर्वित रूप था कल

मेरे आगे कुछ नहीं

लजाती दुल्हन से पूछो

मेरी उपमा हर कहीं

दाग नभ के आईने मे जाने क्यों है मुहं चिढ़ाता

 

फेंक ठन्डी रोशनी बस मन ही मन शरमा रहा

मुहं छिपा कर चांदनी से चांद अब शरमा रहा

 

गर्व यौवन का छलकता

भिगा देता तन बदन

वार रति का पार होता

बिद्ध उर होता मदन

रूप का अंबार बन

गलहार बांहों मे सिमटता

हुस्न अपने इश्क के दामन मे यों शरमा रहा

मेहबूब ढ़ंक कर चेहरा जुल्फों में यों शरमा रहा । 

पौ फटी नभ लाल हो कर सूर्य से शरमा रहा

            -हरिहर झा  

For “Long live hypocrisy” :

http://hariharjha.wordpress.com/2007/08/07/long-live-hypocrisy/

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