हरिहर झा

सितम्बर 27, 2017

नभ को छू लिया मैंने

देह छू कर रूह तक को
छू लिया मैंने।
उछाली उंगली
कि नभ को छू लिया मैंने।

व्यर्थ है
उड़ना हवा में
चाँद तारे खोजना
व्यर्थ है मंगल, शनि कुछ,
भेजने की योजना।
डर की आँधी, सर्प उड़ते
आग का पसीजना।
बम-धमाकों के ठहाके,
रुदन का बस गुंजना,
डूब आँसू में समन्दर पा लिया मैंने।

आँख कजरारी
कभी तो दे गई झांसा,
मन सुलगता
कोई जादू कर गई ऐसा।
दिल दिवारें ध्वस्त,
कैसे दूर हो हिंसा
भोग की दुनिया में
आई प्रेम की लिप्सा।
कली खिलती तो
बहारें खोल दी मैंने।

उगले शराब महुवा
सिकुड़े
मीठी खजुरिया
कूप अंधा डींग में
मात हो गया दरिया
आँधी में रोय रही
लालटेन बावरिया
फूँस के तिनके चले
उड़ी मेरी छपरिया
जोड़ तिनकों का,
बना ली मंजिलें मैंने।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-nabh-kO-choo-liyA-maine

 

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सितम्बर 15, 2008

छलना!

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:14 पूर्वाह्न
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घुटन है दिल में बहुत, नाराज दोनो रब जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

पी गया आंसू, जो अग्नि ना बुझी तो विष पिये
प्यासी निगाहें दौड़ती, क्या ढूँढ़ लाने के लिये
ढीठ सी दिखती, कभी तो मुंह मुझसे मोड़ती
चिलचिलाती धूप में भी, क्यों न पीछा छोड़ती ?

धधकती इस आंच में, तड़पा गई मुझको यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

सुनसान राहों में नजर डाली तुझे ढूँढ़ा किये
मिलन हो इस लालसा में, दाग दामन पर लिये
क्यों सताया रूप ने, निर्मम हुई मन की व्यथा
शापित हुई, लज्जित हुई है प्यार की पूरी कथा

हँस के शरमाई, मैं समझा प्रेम की देवी यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

जीत सूने मौन की, संगीत पर ऐसे हुई
दुराशा तेरी न जाने, फलित क्यों कैसे हुई
दुख से बोझिल मन हुआ है, देह जर्जर प्रेम बिन
बोल तेरे याद आये, ख्याल आये रात दिन

नागिन कहूँ, छलना कहूँ, तू लूट लेती है जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

-हरिहर झा

Her Teasing Face :

http://www.poetry.com/dotnet/P8989404/999/4/display.aspx

http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/

मई 16, 2008

कामदेव

Filed under: गीत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:54 पूर्वाह्न
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संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
आँच नियन्त्रण से बाहर हो कर ना दे मुंह काला

मूरत देखी खजुराहो में आसक्ति की माया
कत्थक हो या भरतनाट्यम वही भाव तो छाया
अनुभूति हो अभिव्यक्त तो जीवन मीठी बानी
दमन किये दिल रहा भटकता प्यासा मांगे पानी

तपती आंच में रहा उबलता फफक उठा तब छाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला

प्रीत बिना बेचैन रहा दिल दौड़ा था दिन रात
ऋषि मुनि के संयम को यह पशु दे गया मात
मिलने को लैला से मजनू मारा मारा फिरता
सोये लेकर नशा वासना अंधकूप में गीरता

सपने में बन सांप डराये किस कुतिया को पाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला

कुरेद कर भीतर से कोई व्यर्थ अड़ाये टांग
होती नादानो सी हरकत़ खाली जैसे भांग
प्रेम का स्वांग रचा कर लेता कामदेव प्रतिशोध
जोश खो गया होंश ना रहा कहां ज्ञान का बोध

दबी भावना पर शोभित था शर्म हया का ताला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला

– हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html

 

Hobbits disappeared! Why and How? :

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=53
OR
http://hariharjha.wordpress.com/