हरिहर झा

जुलाई 18, 2017

फुँफकारता है नाग

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:53 पूर्वाह्न
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देह जलती
क्रोध में फुँफकारता है नाग
हर जगह क्यों फैलती
दुर्गन्ध देती आग?

कीचड़ सना कपास है
पर चल रही चरखी
जान कर नफ़रत गले में
निगलते मक्खी।

प्रेम रस के बिना सूखा
जल भरा तड़ाग

बेच सपने चढ़े ऊपर
सिंहासन शंकित
भेड़िये लो शपथ लेते
हो गये अंकित।

स्याही छोड़ी कुकरम की
फैलते हैं दाग।

बदलते परिवेश में
टकराये गागर-जल
सींचता आँसू नयन में
बिखरता काजल।

जलन फैली हर कली में
तड़पता है बाग।

http://anhadkriti.com/harihar-jha-poem-phunphkaarta-hai-naag

 

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मई 1, 2012

लिखना बाकी है

Filed under: गीत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:40 पूर्वाह्न
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शब्दों के नर्तन से शापित
अंतर्मन शिथिलाया
लिखने को तो बहुत लिखा
पर कुछ लिखना बाकी है

रुग्ण बाग में पंछी घायल
रक्त वमन जब बहता
विभत्स में शृंगार रसों की
लुकाछिपी खेलाई
विद्रोही दिल रोता रहता
दर्द बहुत ही सहता
फिर भी लफ्जों को निचोड़ कर
बदबू ही फैलाई
खाद समझ नाले से मैंने
कीचड़ तो बिखराया
किन्तु हाय! गन्ध फूलों की
बिखराना बाकी है।

साफ करूंगा वस्त्र भाव के
बचपन में कुछ सोंचा
किन्तु आज तक मैले कपड़े
धूल हटा ना पाया
दुर्गंध भरे, बिखरे बालों
को कितना भी नोचा
निर्मल करे सुभाये ऐसा
कुछ भी लिख ना पाया
ज्योत जलाने चला भले ही
अंधकार में डूबा
अब तक घने तिमिर की परतें
खुल जाना बाकी है।

कागद ने खुश होकर नभ के
रहस्य खूब उभारे
स्याही में डूबा तो, अचरज
पंछी खुद को पाया
ले आई आकाश में कलम
दुबका डर के मारे
उड़ ना पाया मुक्त हवा में
गड्ढे में घुस आया
बहुत किया डबरे में छपछप
थक कर यों पछताया
सागर से उठती लहरों को
छू लेना बाकी है

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2012/04/blog-post.html
A Half Poet :
http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=330

सितम्बर 1, 2008

कम्प्यूटर कविता लिखेंगे!

एक युग था
कवि
कविता क्या लिखता था !
भावों को व्यक्त करता था
संवेदनशील मन से
पीड़ा को मथता
तब गंगोत्री से
कविता की धारा बहती
भावनाओं का संचार
फलीभूत होता था

अब गये
पतवार चलाने के दिन
चरखा कातते थे गांधी बाबा
गये चरखे के दिन
अब अन्धाधुन्ध कारखानो से
निकलती कपड़ों की थान
देखो कम्प्यूटर पर
दर्जन कविता की शान

अब कवि लिखेंगे सोफ्टवेयर
सोफ्टवेयर लिखेगा कविता
धड़ाधड़ ले लो
कविता-सविता
भावों और शब्दों की खिचड़ी बना कर
खायेंगे चटखारे लेकर
हिंसक और
विभत्स
आई सी चिप्स से निकलते रस
उल्टी करते रस ;
फड़फड़ा उठेगें
राइम और रिथम
शब्दों को बिलोते औजार
नोचेंगे शैली का जिस्म
अब कवि की क्या बिसात !
कम्प्यूटर कविता लिखेंगे
लेपटोप तालियां बजायेंगे ।

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/07/blog-post_04.html
For “Hobbits disappeared!” and other poems :
 
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=53