हरिहर झा

सितम्बर 27, 2017

नभ को छू लिया मैंने

देह छू कर रूह तक को
छू लिया मैंने।
उछाली उंगली
कि नभ को छू लिया मैंने।

व्यर्थ है
उड़ना हवा में
चाँद तारे खोजना
व्यर्थ है मंगल, शनि कुछ,
भेजने की योजना।
डर की आँधी, सर्प उड़ते
आग का पसीजना।
बम-धमाकों के ठहाके,
रुदन का बस गुंजना,
डूब आँसू में समन्दर पा लिया मैंने।

आँख कजरारी
कभी तो दे गई झांसा,
मन सुलगता
कोई जादू कर गई ऐसा।
दिल दिवारें ध्वस्त,
कैसे दूर हो हिंसा
भोग की दुनिया में
आई प्रेम की लिप्सा।
कली खिलती तो
बहारें खोल दी मैंने।

उगले शराब महुवा
सिकुड़े
मीठी खजुरिया
कूप अंधा डींग में
मात हो गया दरिया
आँधी में रोय रही
लालटेन बावरिया
फूँस के तिनके चले
उड़ी मेरी छपरिया
जोड़ तिनकों का,
बना ली मंजिलें मैंने।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-nabh-kO-choo-liyA-maine

 

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जून 17, 2008

उजाले तक

Filed under: हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:46 पूर्वाह्न
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सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक
दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक

लेपटोप पंहुच गये गांव में बस्ती में
मोबाइल हथेली में सब्जी दूध वाले तक

हेरी पोटर देख-देख सर्पीली तेज हवा चली
फैल गया दंश लहू में गोरे तक, काले तक

झेलते रहे भिड़न्त इस दुनियां के खेल में
तो गेंद देखो आ पहुंची दुश्मन के पाले तक

खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक

फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक

दरवाजे पे गमगीन हुये गोता हमने यूं खाया
कि चाबी पंहुच ही गई लटकते ताले तक

-हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/blog-post_02.html

For “The weather” :

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=33