हरिहर झा

जनवरी 7, 2016

भूखी

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:52 पूर्वाह्न
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प्याज के टुकड़े को चीर कर
टपकता रस बह रहा
अधबने चावल पर गिर कर
फिसलता
जाने क्या कह रहा
जिसमें डूबने लगी
राहत पाती
एक भूखी की कराह;
एक सपना पल रहा कोख में
नींबू-सा निचोड़ रहा माँ का गर्भ
चिपचिपाते कीड़े की तरह
जो ज़हरीला तो न था
पर वह अपना बदन जला गई;
सड़े अनाज की रोटी से कैसे बन पाती
हड्डियां, मांस पेशियां?
परेशान तेवर
और दर्द – बन्द मुठ्ठी में
मां का लड़खड़ाता वात्सल्य!
भड़भड़ा कर उठी समेटने स्वयं को
डरती हुई होनी की परछाई से भी
निवाला ठूंसा मुँह मे;
“रोटी समझ में आवे
पिरोटिन विटेमिन
वो छोकरा जाने क्या क्या बकता है
होता होगा किसी सरग में
मरे बिना वह नसीब नहीं”

दबीदबी और मौन
आशायें और उन्माद
समय की लहरें बहा ले गई
बची तो बस खिल्ली उड़ाती मौत।

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