हरिहर झा

मार्च 8, 2007

नखरारी नार

Filed under: तुकान्त,मंच,रचनाकार,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:58 पूर्वाह्न

पिचकारी खेले ससुरी ऐसे
रंग फेंक कर के मचलती कैसे
बौछार तीर की निकलती ज्वाला
चमकार बिजली की झूमती बाला
 

लुभायमान लगती रंग से भरी वो
लम्बी छरहरी लगती परी वो
हुडदंग के बीच बेखबर हो घूमती
आंचल में रंग लिये मस्ती से झूमती
 

जग किसके रंग से रंगमय हो रहा
छलकता तारुण्य नयन से बह रहा
नादानी देख कर उसे न डांटना
पीते ही स्नेह वह  चाहती बांटना
 

कलाई  से पकड़ कोई मसखरी करता
तन भीगा मन कैसी ख्वाहिश से भरता
कोई भी मनचला मन में न डरता
कस कर हथेली से आलिंगन भरता
 

नखरारी नार की अल्हड़ता कैसी?
सबके आगोश में बेशरम वैसी
ख्याल बुरा लाये तो देगी वो गारी
वो है तुम्हारी प्यारी पिचकारी


  –हरिहर झा
मार्च 1, 2007 

http://hindinest.com/kavita/2007/06.htm

http://rachanakar.blogspot.com/2007/03/hori-kherat-nakhari-nar.html

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फ़रवरी 16, 2007

ऐसा बोर सैयां

Filed under: अतुकांत,मंच,व्यंग्य,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:51 पूर्वाह्न

रंग फेका लाल गुलाबी
वो वेवलेन्थ की बात करने लगा
बुद्धु नादान सैयां
आइन्स्टीन को मात करने लगा

मैंने छोड़ी पिचकारी
वो हवा के दबाव की बात करने लगा
खिला दी मैंने कुछ मिठाई
शुगर की चिन्ता दिनरात करने लगा

गिनी चुनी लकडि़यां
भाई लोगों ने इकठ्ठा की
जलती होली देख कर
पर्यावरण की बात करने लगा  

समझाया असत्य पर
सत्य की होती विजय
होलिका जली प्रह्लाद बच गया
वो फायरप्रूफ कपड़ों की बात करने लगा

फिल्मी स्टार झूमे नाचे
दे गये होली का रंग
देखी मस्ती टी वी पर
टी वी के एन्टेना की बात करने लगा

गीत कवित्त भजन
होलीरस मे डुबा गये
हुल्लड़टोली की गाली सुन कर
भाषाव्याकरण की बात करने लगा 

राधा किशन का होलीरास
मथुरा मे शुरू होने लगा
ऐसा बोर सैयां 
वो द्वारका की खुदाई की बात करने लगा

 हरिहर झा
मार्च 15ई 2005

http://www.hindinest.com/kavita/2003/091.htm

मित्र !

Filed under: अतुकांत,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:53 पूर्वाह्न

                          

मित्र !
हम तो चले थे
उस नकली
और मशीनटाइप जिन्दगी से दूर
बाइसिकल उठाये
सैर पर
सारी औपचारिकताओं को छोड़ कर
दिल की बात करने
पर ट्यूब टायर मे फंसे कांटे
दुख अपना कैसे  बांंटे

मित्र !
हम तो चले थे
अंर्तमन की लिप्सा को
सुरों मे बांधते हुये
शरमलोकाचार की दीवार लांघते हुये
फूहड़ फिल्मी गीतों से गला फाड़ते हुये
बेसुरे राग मे
अब सुनसान
इस नदी किनारे बैठ कर
अगर रोया या गाया
तो हंस पड़ेगी
हमारी ही छाया।

मित्र !
बहुत हो गई
मीठी कोयल की तान
खूब कर लिया
खुले आसमां का बखान
प्रकृति मे एकरूप होने का दावा
मानसिक शांति का बहलावा
कच्ची और कांटेदार सड़क पर
धूल फांकते हुये
अब पैदल ही चलो
भीष्म बनी कांटो से बिद्ध
साइकिल रगड़ कर
थोड़ा गुस्से से भड़क कर
पर थोड़ा
मन ही मन बिगड़ते हुये
अब वापस चलो मित्र <

-हरिहर झा
15 अप्रेल 2004
मित्र!  हरिहर झा  पुरस्कृत
http://www.hindinest.com/kshala/014/14ks3.htm
 

निकल कन्दराओं से

Filed under: तुकान्त,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:40 पूर्वाह्न

निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
वात्स्यायन के कामसूत्र सूरतुलसी मीरा के पद

सोंच रहा नवनीत ज्ञान का पास है फिर भी दूर
पा न सकूं पर यत्न किये जाने पर हूं मजबूर
 

जीवन क्या? मृत्यु क्या? क्यों बन्धन हैं इस काया के
मोक्ष मिले तो कैसे? कब चक्कर छुटें माया के

अहं ब्रह्म को याद किया दिल हुआ हर्ष से गद्गद्
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद

देवपुत्र होने का मुझको चढ़ा कभी अभिमान
डारविन की खोज कहे मै बन्दर की संतान

त्यागतपस्या ब्रर्ह्मचय को जब आदर्श बनाया
खगमृग जैसी कामवासना फ्रायड ने बतलाया

कीटपतंगो़े सा नरजीवन नीत्शे ने कर दी हद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद

कहां ज्ञान को सरल बनाने रामकथा रच डाली
रामराम रट छुरी बगल मे बस आडम्बर खाली

शब्दों के रेशों की डोरी खुद को बंधता पाया
हर पुस्तक जंजीर बनी कारागृह मन को भाया

पोथी लिख लिख हुआ मुझे लो ब्रह्मा होने का मद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद।

  -हरिहर झा
अगस्त 15, 2005
 

http://www.hindinest.com/kshala/015/15ks2.htm
 

मदिरा ढलने पर

Filed under: तुकान्त,मंच,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:28 पूर्वाह्न

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

प्यास बुझाने पानी मांगा
अमृत की अब चाह नहीं

नन्हा दीपक साथ मे हो
आवश्यक जगमग राह नहीं

मौत आये यों सजधज कर
फिर र्स्वगलोक मे क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

दुनिया मे नहीं कोई पराया
सब के सब अपने देखे

सबकी यादें मीठी मीठी
फिर मिलने के सपने देखे

क्या खूब लुभाती मृगतृष्णा
तृप्ति मिलने पर क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

निंदक नियरे पानी बन कर
चित साफ करें धोयंे विकार

शत्रु भी कर दें सावधान
हों पग बढ़ने को जब तैयार

खलनायक मे जब राम छिपा
प्रभु प्रगट हुये तो क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

कांटे भी रक्षा करने को
तैयार खड़े हैं होशियार

फूलों का उपवन क्यों चाहूं
हर कलि सुगंधित है अपार

जुगनू की जगमग अति सुन्दर
पूनम की रात मे क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

 -हरिहर झा
मई 1 2005

http://www.hindinest.com/kavita/2005/101.htm

बन कविता मुस्कुराती

Filed under: तुकान्त,मंच,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:22 पूर्वाह्न

मन मे पीड़ा जब सताती,
बन कविता मुस्कुराती

दुख बने दो तट अधर के
प्यार की वाचा निकलती

थपेड़ों मे बन गई पतवार
जिव्हा सी मचलती

शांत कर ले मनगगन
मंझधारभंवरों मे सीखाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

एटमी हथियार चुपचुप
कौन पागल या दिवाना

युद्ध मे लोरी सुनाता
स्तब्ध रह जाता जमाना

शोले उगलती तोप कैसे
शान्त रह कर फूल उगाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

सौम्य तो कभी वीररस
श्रृंगार से सजती सजाती

बन विदुषक वेदना को
पी सदा हन्सती हन्साती

घाव पर मलहम लगा कर
विश्व को करुणा  सीखाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

यातना के शिविर मे जब
नर बने कीड़ेमकोड़े

शहीदों की याद में
गाती कविता हाथ जोड़े

प्रेरणा देकर दिलों मे
ज्योति की माला सजाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती।

-हरिहर झा
मई 1 2005 

http://www.hindinest.com/kavita/2005/101.htm