हरिहर झा

फ़रवरी 15, 2007

मौन मुखर!*

Filed under: गीत,मंच,साहित्य कुन्ज — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:02 पूर्वाह्न

        
कैसे मन की अगन बुझे
राख मे शोल़े़, जलन तुझे

झुलसी लपटें क्यों सह कर
              मौन मुखर!

दिल बोले हर अंग जले
वाणी सरगम की निकले

सांसे चुपचुप क्यों डर कर
              मौन मुखर!

नभमण्डल के तारे मौन
जग की वाचा सुनता कौन

मानव आहें भरभर कर
              मौन मुखर!

भाव भरी  कविता गढ़ कर
सुरलय की सीढ़ी चढ़ कर

दिव्य साधना मे गल कर
             मौन मुखर!

मौन शुन्य से निकली सृष्टि
ब्रह्मज्ञान  की अनुपम द्रष्टि

मोक्षद्वार पर पहुंचेगा नर
              मौन मुखर!

जीवन से कुछ राहें निकली
पर जिस दिन अर्थी निकली

प्राणो के स्वर हुये मुखर
            मौन मुखर!

                    -हरिहर झा

(संगीत-रूप में उपलब्ध)
     

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm

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कीचड़ मे कमल

Filed under: अतुकांत,साउथ एशिया टाइम्स,साहित्य कुन्ज — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:56 पूर्वाह्न

पाषाण हो चुका यह हृदय
जिससे चट्टाने आपस मे टकरा  कर
चूर होती
बह रही नदियों मे
पर अब भी
कोपले खिलने का अंदेशा
चिडि़यों के चहचहाते स्वर
सुनने की उत्कंठा
और फुलों से महकती
सुगंध के स्वप्न अभी बाकी ।

किसीने अपनी तलवार से
बंजर धरती पर
चीर दी अंतडि़यां
पर गरजते धमकाते बादलों मे
करुणा की गुंजाईश अब भी बाकी
निष्ठुर धरती से
भावुक संवेदना उपजने की आशा
अब भी बाकी
मुर्दा आसमान से
जीवनशक्ति   बरसाने की
अपील अब भी बाकी ।                       

रुहानी प्यार की कोई जगह नहीं
क्योंकि अब प्यार हो चुका है एक
सौदा
गणित का एक समीकरण
या एक कंप्यूटर प्रोग्राम
कुछ तत्वों का बहता हुआ  रसायन
कीचड़ के इस फैलाव मे भी
कमल खिलने की
उम्मीद अब भी बाकी।
                     -हरिहर झा

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm

दिल का दर्द

Filed under: तुकान्त,मंच,साहित्य कुन्ज — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:49 पूर्वाह्न

खोईखोई उलझनो का कुछ तो राज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

झांझर झमझम बजी सृष्टि का मूल
तारे ग्रह नक्षत्र चितवन की धूल
मेघ कालेछिद्र से नैन के काजल
युगयुगान्तर निकल गये कि जैसे पल

कल से बहते आंसुओं का समन्दर आज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

राजकुल की मर्यादा सबको भाई
भोली सी प्रेमलहर जा टकराई
क्या बला है ! प्राण किसलिये अटक गये
प्रमुख जिन्हें राजधर्म क्यों भटक गये

छोड़ दिया तख्त छोड़ दिया ताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

शरमा कर झुकी हुई नजर की हाला
चिन्गारी प्रेम की वियोग की ज्वाला
धधकते अंगार सा खून जब बहा
तड़पता सिसकता दिल मौन ही रहा

खुल कर रोने के लिये मोहताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है।

 -हरिहर झा

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm