हरिहर झा

अगस्त 30, 2007

लम्हा

Filed under: तुकान्त,शब्दान्जलि — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:46 पूर्वाह्न

नदी की बूंद सा बहता लम्हा
हुआ ना तिजोरी मे कैद लम्हा

 

ख्यालों पे जीवन लुटाता रहा
जीत हार बदले मे पाता रहा
हथेली पे सरसों उगाई जीवन भर
मरने की आशा जुटाई जीवन भर

   

टिक टिक  घड़ी की सुनाता लम्हा
सपनो के जाले बुनाता लम्हा

 

काटे कटता समय यों अकेले
लगा पंख उड़ता भर बीच मेले
तन्हाई गमो की कब बोल पाई
हंसती गाती राहें सब को भाई

 

चुप चुप चले बोर करता लम्हा
घेरे खुशी शोर करता लम्हा

नाटक जग का प्यारनफरत लाये
ना जाने किस क्षण र्पदा गिर जाये
चेतना का दीपक जलाता तिल तिल
तो भी यह चक्रव्यूहभेदन मुश्किल

 

परतदरपरत प्याज खुलता लम्हा
तीखी कुछ मीठी गन्ध देता लम्हा।

For “My Mistress!”

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फ़रवरी 14, 2007

मित्रों से झगड़ता चल

Filed under: मंच,शब्दान्जलि,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:04 पूर्वाह्न

मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल
बोर हुई इस दुनिया में तू मजा उन्हें भी देता चल।

अपनी बात को ऊंची रखे वो ऊंचा कहलायेगा
सब से कट कर निपट अकेला तपस्वी बन जायेगा
भूले भटके कोई अगर तुझे पूछने आ जाय
जूते सिर पे रख ले फिर भी नहीं भागने पाये

बकझक करके गला पकड़ ले खरी खोटी सुनाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।

मिले लड़ाई का अवसर तो दुश्मन से भी यारी हो
शांति ऐसी दो पल में बस लड़ने की तैयारी हो
समझ कि तेरे मधुर वचन बस गाली की तैयारी हो
फूलों की माला में खंजर चल जाने की बारी हो

फटे में बन्धु, टांग अड़ा ले दुश्मन बन भिड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता च॥

भले लोग चुपचाप भला करने का बीड़ा उठायें
नियम बता दे इधर उधर के कुछ भी न कर पायें
काम नहीं, केवल भाषण बाजी के अवसर चुनना
सीधी सच्ची बत कहे कोई तो कभी न सुनना

लम्बी बहस किये जा सबमें अपनी टांग अड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।

-हरिहर झा

http://shabdanjali.com/kavita/harihar%20jha.htm