हरिहर झा

जून 19, 2012

मायके में खुश रहना

Filed under: रचनाकार,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:58 पूर्वाह्न

मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना
भाभी तेवर दिखलाये तो बिल्कुल ना डरना

ननद बनी तो राज तुम्हारा अपने घर में क्या डर
हुक्म चलाती रहना वह तो तेरे बाप का ही घर
यहां रोज हों हलवा पूड़ी मुझे बहुत ही खलता
मेरे घर का बजट तो सूखी रोटी से ही चलता

पूज्य पिता का पिस्ता काजू जो भी चाहे चरना
मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना

जाने के इशारे पर तुम तुरंत गले मिल जाना
नाटक में ही दिल का दुखड़ा ऊंचे सुर में गाना
भैया और भतीजे नन्हे तुम्हें जान से प्यारे
कैसे उनको छोड़ पाओगी वे अखियों के तारे

भाभी काम करें तुम नल से पानी ना भरना
मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना

झूठी शान बघारे जो सबकी नजरों मे चढ़ती
इसके उसके कान भरे तो घर में इज्जत बढ़ती
गारे की भी ननद बुरी कहावत सच करना
सीरियल देख पल्लवी का तुम रोल अदा करना

कहानी घर घर की सा सबके आगे देना धरना
मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना

मेरा क्या मैं तो चंगा हूं आजादी से रहता
होटल में पब में मदिरा का सुन्दर झरना बहता
कसम है हर झूठे आंसू की हाथ नहीं हिलाता
बार गर्ल दिख जाय तो मैं आंख नहीं मिलाता

सच मानो पटाखों पर अब छोड़ दिया है मरना
मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना ।

-हरिहर झा

http://www.parikalpna.com/2011/07/%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%B0-%E0%A4%9D%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%8B-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

http://www.rachanakar.org/2011/04/blog-post_05.html

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अक्टूबर 4, 2007

मां और मातृभूमि

Filed under: तुकान्त,रचनाकार — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:14 पूर्वाह्न
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( एक प्रवासी भारतीय के द्रष्टिकोण से )

छुटा देश तो जीना दूभर  दुखड़ा किससे कहना 

माया मोह की गठरी लादे सुख दुख इसके सहना

     

समझे दर्द  न दिल का कोई घूटी  रही अभिलाषा

मातृस्नेह की एबीसी मे कैसे हो सकती परिभाषा

रहा न अपना,  देश पराया अपना लेने का बीड़ा

याद क्यों आई? मां  ने जन्म दिया था उसकी पीड़ा

  

मां का गर्भ था स्वर्ग के जैसा,  छाया परमानन्द

शयनकक्ष की अद्भूत निंद्रा, सुख सुविधा मे बन्द

  

माता का लहू पोषण देता भूख लगी और तृप्ति

मां की धमनी पीपल छैयां कष्ट गया निवृत्ति

सांस लिये का श्रम न जहां हो जब पूरा आराम

मां की धड़कन गीत बना बस सुना सुबह और शाम

   

केवल नौ महिने क्या बीते मां हो गई मजबूर

प्रसव की पीड़ा भोगी खुद और किया स्वयं से दूर

   

जो दिवारें पाल पोस कर बांटती सुख आनन्द

देती धक्का शर्मसार हो रह न सका मैं बन्द

निकल न पाऊं, रह ना पाऊं अद्भूत रही सुरंग

ममता खदेड़ रही क्यों मुझको छिड़ी हुई क्यों जंग

   

शिशु जन्म ले इसमे चाहे हों जितने संताप

मातृभूमि को छोड़ विदेश मे बसना है क्या पाप ? 

   

प्रेरणा :  राहुल सांकृत्यायन –http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/ghummakkad/ghummakad1.htm

http://rachanakar.blogspot.com/2007/08/maa-aur-matrubhoomi.html

 

For Lotus in the Mud

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/06/lotus-in-the-mud/

 

OR

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मार्च 8, 2007

नखरारी नार

Filed under: तुकान्त,मंच,रचनाकार,हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:58 पूर्वाह्न

पिचकारी खेले ससुरी ऐसे
रंग फेंक कर के मचलती कैसे
बौछार तीर की निकलती ज्वाला
चमकार बिजली की झूमती बाला
 

लुभायमान लगती रंग से भरी वो
लम्बी छरहरी लगती परी वो
हुडदंग के बीच बेखबर हो घूमती
आंचल में रंग लिये मस्ती से झूमती
 

जग किसके रंग से रंगमय हो रहा
छलकता तारुण्य नयन से बह रहा
नादानी देख कर उसे न डांटना
पीते ही स्नेह वह  चाहती बांटना
 

कलाई  से पकड़ कोई मसखरी करता
तन भीगा मन कैसी ख्वाहिश से भरता
कोई भी मनचला मन में न डरता
कस कर हथेली से आलिंगन भरता
 

नखरारी नार की अल्हड़ता कैसी?
सबके आगोश में बेशरम वैसी
ख्याल बुरा लाये तो देगी वो गारी
वो है तुम्हारी प्यारी पिचकारी


  –हरिहर झा
मार्च 1, 2007 

http://hindinest.com/kavita/2007/06.htm

http://rachanakar.blogspot.com/2007/03/hori-kherat-nakhari-nar.html

जनवरी 31, 2007

अर्थहीन कविता

Filed under: अतुकांत,रचनाकार,हिन्दी — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:27 अपराह्न

सार्थक है वह कविता –
जो मंत्रियों की चाटुकारिता से
परहेज न करे
जो राजों रजवाड़ों के भाट चारण का
वारिस हो सके
करोड़ीमल के संस्मरण में
कुछ प्रशस्तियाँ गा सके –

पर इस अर्थ प्रधान
स्वार्थ प्रधान युग में
पुरस्कार की क्या बात
जो चार पैसे न कमा कर ला सके
अर्थहीन है वह कविता….

अर्थहीन है वह कविता …
बिखरे विचारों की सजावट करती हुई
भ्रष्टाचार से बगावत करती हुई
विवश विद्रोह को मायने देती हुई
मियां मिठ्ठुओं को आइना दिखाती हुई
या फिर प्रेम की रंगीनियों में सोई हुई
प्रकृति के आगोश में खोई हुई
अर्थहीन है वह कविता….

पर ऐसी कविता
जो किसी ख़ेमे में छीना झपटी कर
झंडा उठा ले
राजनीतिक वादों इरादों पर
अपनी तुकबन्दी की छाप छोड़े
और मोदक की थाली की तरह सजाए –
खयाली पुलावों की चाशनी से बने
चुनावी घोषणा पत्र पर कसीदे करे
सफल है वह कविता…

जो जोखिम उठाए
रद्दी की टोकरी में गिर जाने का
पाखंडी शिखंडियों का मखौल सहने का
नेता भए विधाता के तीसरे नेत्र खुलने का
और सच का साथ दे
मोटी खाल में छिपे काइयाँपन को
व्यंग बाणों से भेद कर
लहूलुहान करे
तू-तू मैं-मैं की चीख पुकार के बीच
किसी अनहत नाद की सी प्रतीक्षा में
शांत सौम्य आनंदित भाव से
विवेक विचार का सृजन करे
अर्थहीन है वह कविता …

http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_18.html