हरिहर झा

मई 27, 2017

सूना रस्ता नैन तके

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:02 पूर्वाह्न
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सपनों में सुन शरमाये
पियु की ठकुर सुहाती
रोये दे कर उपालंभ
फिर मन में हरसाती।

सोचे कैसा हरजाई
संग लगा रे दुश्मन
सूना रस्ता नैन तके
फड़फड़ काँपे चिलमन।

छोड़े कजरा नैनन को
रिश्ते सब सौगाती।

प्यास जगाता ओस पिला
ऐसा सावन ठगिया
आँसू हँसते कोपल पर
दंश उगाती बगिया।

बैरी बादल पी जाता
नदियाँ जो बरसाती।

धरती रेगिस्तान हुई
बारिश पर पाबन्दी
ढलक न पाई मोती बन
कोई बूंदाबांदी।

कलियाँ सूखे पतझड़ में
दिल का दर्द सुनाती।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-KUU1415-soona-rasta-nain-takey

 

मार्च 22, 2017

रूह में लपेट कर

Filed under: अतुकांत,अनहद-कृति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:19 पूर्वाह्न
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धुंआ-धुआं हो रहा श्मशान की ओर
पर पालकी में बैठी दुल्हन
अपने आंचल में सपने संजोये
मृगनयनों से अपने पुरूष को निहारती
एक बर्फ़ीली आँधी से अनजान
रसवन्ती उमंगों से भरी
पपीहे की ओर इशारा करती
खो गई घुमड़ती घटाओं में।

जब कि मलमल के रेशों के भीतर छुपी
जर्जर खटिया में फँसती कोमल त्वचा
अभ्यस्त हो गई पीड़ा के लिये
पर यह छलावा…
आस्था को हिलाती
प्यार में बनावटी आतुरता
और इसके
रेशमी स्वप्नों से निकलते काँटे
हो गये असहनीय!
हृदय की व्यथा
और तन्हाई को डूबोती रही
आँसुओं में
इधर वेदना बहा ले गई
दिल की हसरतें।

फिर युग की आँधी में
उड़ती कलम ने
श्मशान की आग को
केवल स्थानान्तरित किया
बुझाया नहीं…।
ताप अपनी रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह
ग़ज़ब की हिम्मत!
चुकाई भारी कीमत
श्मशान की आग को
रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह!

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-KUU1415-rooh-mein-lapet-kar

जनवरी 10, 2017

बरगद के तले

Filed under: अतुकांत,अनहद-कृति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:40 पूर्वाह्न

बरगद के तले
महकते फूलों की खुशबू
आती हुई पदचाप,
कोमल डालियाँ
मुलायम फूलों का स्पर्श
लटों की उलझन में फँसता
मैं गिरफ़्तार।

हरी-हरी घास का रेशमी बिछोना
ओंस की बूंदो का कोमल स्पर्श
पोर-पोर में समाती
झरते पानी की सुरीली आवाज़।

खिलखिलाते फूल
यह दिवास्वप्न या
रिसते घावों का करुण उपकथन…
एक गहरी प्यास की भूमिका।

हवा सुरसुराई कानों में
एक गुरूमंत्र –
पहाड़ी की घाटियों से गूँजता शंखनाद,
मंदिर के गुंबद से निकलता घंटनाद
भीतर मौन निःशब्द
लो शुरु हुआ अनहद नाद।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-KUU1415-poem-bargad-ke-taley

 

 

सितम्बर 19, 2016

वायदों का पतंग

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:16 पूर्वाह्न

उड़नतश्तरी में
तारों का गुच्छा लगता है
वायदों का पतंग तुम्हारा अच्छा लगता है

रंभा की क्रीड़ा दिखला दी
बॉलीवुड से लाकर
रक्तबीज को भभकी दी
नाटक में गाल फुला कर
फिल्मी सम्मोहन ने
लाक्षागृह में यों भरमाया
शकुनी मामा का पासा अब कच्चा लगता है।

’बिजली’ देखी चन्द्रकला सी
जगी भाग्य की रेखा
खूब उड़े नभ में
पतंग के नीचे हमने देखा
डोर नहीं थी
सर्प नचाते बाजीगर की माया
काले दानव का जादू अब बच्चा लगता है।

कन्नी कटने वाली
चरखी नेताजी का पेट
मांजा बिल्कुल तेज लगा है
पतंग बना राकेट
चिंगारी भस्मासुर की
तो दहकी पूरी काया
स्वांग मोहिनी रूप में भी तो सच्चा लगता है।

 

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-vaaydOn-kaa-patang

 

अगस्त 8, 2016

पगलाई आँखें ढूंढती

Filed under: अनहद-कृति,गीत,विरहिणी,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:54 पूर्वाह्न

 

पगडंडी के पदचिन्ह से भी
क्षितिज देखा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह

फूल सूंघे, छुअन भोगी
सपन का वह घर
कचनार की हर डाल लिपटी राह में दर दर
मधुरस पिया जम कर वहीं
छाया चितेरा जिस जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
डोर पर चलती
ठहरने के नहीं लायक
नट नटी का खेल
कैसा कर रहा नायक
साँस में हर, बीन सुनती
वह सँपेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
चीथड़ों के इस कफन में
चाँद चकनाचूर
सूरज धधकता
राख की आँधी उड़ी भरपूर
गहरी गुफा से याद का
मलबा उखेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-paglaayi-aankhein-dhoondhtee1

My Mistress:

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=18812

 

 

 

जून 14, 2016

दुल्हन का सपना

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:07 पूर्वाह्न
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तासे, ढोल बजे,
शहनाई में  दिल की बजी घंटियाँ।

धड़कन से दिल के तारों को
कँपना है
गीत राग  में
रंग भरा इक  सपना है

निखर मेहँदी
और महावर में कैसी  सजती दुनियाँ।

ठाटबाट हैं ,
गम दहेज सा अनचाहा
पौरुष का वरदान
उसे है मनचाहा

दिल  सम्राट सा
और  बड़ा ’समारट’ है  मेरा सैंयाँ।

भाव बने
रंगीन बादल आप स्वयं
मन  में चली हिलोरें
बनी भरतनाट्यं

शुरू नाच  हुआ
अप्सरा के पैरों में हैं  पैंजनियाँ।

कोई बचाये
जुदाई के चंगुल से
जोबन बैरी
तार खींचता बाबुल से

आंसू टपटप बहें
बखत बिदाई मिलें गलबहियाँ।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-dulhan-kaa-sapna

 

नवम्बर 1, 2015

शहर में दिवाली

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:07 पूर्वाह्न
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लिये मुस्कान
’रोबो’ की
दिवाली खूब लहराई
हँसी लेकर मुखौटो पर
शहर की शान इतराई

रण में
दुंदुभी बज गई
बजे ’डीजे’ नगारों से
हुई मुठभेड़
कि अब कौन ,
पदक छीने हजारों से

कटारे बन गई
चितवन
उफन तलवार बौराई

पड़ा परशाद,
थाली पर
पकौड़े चाट की छाया
धुँआ सा छा गया पल में
कहीं बारूद फैलाया

बुझे दीपक,
रुदन करती
हुई ’शृंखला’ मँडराई

घिसे बर्तन सभी जग के,
चली लछमी धुँधलके में
दरस के नैन प्यासे थे
खुला उपहार बदले में

दिखी जर्जर हुई चूनर
सुबकती झील गहराई

पहन कर स्वर्ण,
खुशियों का
नया आयाम हाँसिल हो
धरम का स्वाँग
रच डाला
भले ही नजर कातिल हो

अकड़ से
दान देते ही
लटकती जीभ ललचाई

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-shehar-mein-diwali1

अप्रैल 2, 2015

नाच हुआ पिपासा का

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:10 पूर्वाह्न
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प्रसव हुआ, भविष्य लिये
आई रंभाती रात
शिशु ने जग में पैर पसारे
मन का दर्पण लिये देह पर
कोई ज़िन्दगी निकल पड़ी।

वर्तन सीखे, भाषा सीखी
सच और झूठ का भान हुआ
बुरी नज़र पर आँख पड़ी तो
लिंग-भेद का ज्ञान हुआ।
खेल गये बचपन के, ख़ुद से
खिलौने-सा व्यवहार हुआ
विकृत हुई समझ, जो देखा
अपराधों का मान हुआ।

फैला जमघट कुकर्मों का
विभत्स हुयीं गलियाँ नुक्कड़
खुला आवरण नाक सिकोड़े
बही गन्दगी निकल पड़ी।

झूठे नापदंड बदन के
हावी हो गये बालिका पर
नग्न देह ललचाती नज़रें
दिल पर कितना आघात हुआ।
आई याद दादी की सीख
अपराध-बोध में लुढ़क पड़ी
माया नगरी, उलझ-उलझ मन
चकाचौंध से मात हुआ।

पत्थर-तोड़ बजी धुन ऐसी
नाच हुआ काम-पिपासा का
निर्वस्त्र देह से लाज लुटी
शातिर हुड़दंगी निकल पड़ी।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-naach-hua-pipaasa-kaa

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=152

जून 4, 2013

साथ नीम का

Filed under: अनुभूति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:38 पूर्वाह्न
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पत्ता पत्ता रोयें जैसा
उँगली जैसी डाली
हरे रंग के दामन से लो चली
हवा मतवाली

विषकन्या नाचे धमनी में
निबौलियाँ शाखों में
अद्भुत छटा न देखी जाय
सुन्दरतम लाखों में
अजब गजब देती खुशहाली
छाया से रिस रिस कर बहती पूनम
रात उजाली

नीचे शिला ग्रामदेव की
झुके सभी का माथा
सुने पवन जो माटी बोले
एक विरानी गाथा
गाए अदभुत करे जुगाली
चरमर बिखरे पत्तों में, माया की
छाया काली

झाँक दिलों में देखे सबके
सपने ऊँचे ऊँचे
स्नेह उँडेला झगड़े टाले
इस छाया के नीचे
बज गई मौसम की करताली
सरबत कड़वा, स्नेह दूध सा, करती
है रखवाली।

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/neem/hariharjha.htm

http://www.navgeetkipathshala.blogspot.com.au/2013/05/blog-post_28.html
A Gulmohr Tree:
http://hariharjha.com/2007/02/11/a-gulmohr-tree/

जून 19, 2012

मायके में खुश रहना

Filed under: रचनाकार,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:58 पूर्वाह्न

मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना
भाभी तेवर दिखलाये तो बिल्कुल ना डरना

ननद बनी तो राज तुम्हारा अपने घर में क्या डर
हुक्म चलाती रहना वह तो तेरे बाप का ही घर
यहां रोज हों हलवा पूड़ी मुझे बहुत ही खलता
मेरे घर का बजट तो सूखी रोटी से ही चलता

पूज्य पिता का पिस्ता काजू जो भी चाहे चरना
मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना

जाने के इशारे पर तुम तुरंत गले मिल जाना
नाटक में ही दिल का दुखड़ा ऊंचे सुर में गाना
भैया और भतीजे नन्हे तुम्हें जान से प्यारे
कैसे उनको छोड़ पाओगी वे अखियों के तारे

भाभी काम करें तुम नल से पानी ना भरना
मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना

झूठी शान बघारे जो सबकी नजरों मे चढ़ती
इसके उसके कान भरे तो घर में इज्जत बढ़ती
गारे की भी ननद बुरी कहावत सच करना
सीरियल देख पल्लवी का तुम रोल अदा करना

कहानी घर घर की सा सबके आगे देना धरना
मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना

मेरा क्या मैं तो चंगा हूं आजादी से रहता
होटल में पब में मदिरा का सुन्दर झरना बहता
कसम है हर झूठे आंसू की हाथ नहीं हिलाता
बार गर्ल दिख जाय तो मैं आंख नहीं मिलाता

सच मानो पटाखों पर अब छोड़ दिया है मरना
मायके में खुश रहना चिन्ता मेरी मत करना ।

-हरिहर झा

http://www.parikalpna.com/2011/07/%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%B0-%E0%A4%9D%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%8B-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

http://www.rachanakar.org/2011/04/blog-post_05.html

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