हरिहर झा

सितम्बर 13, 2019

हिन्दी में

Filed under: अनुभूति,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:53 पूर्वाह्न

उर्दू, बृज, अवधि के कवि का रंग समाया हिन्दी में
तुलसी, मीरा ने भक्ति का गीत सुनाया हिन्दी में

कन्नड, बंगला गुजराती हो, सब को बहना सी प्यारी
विविध सुरों में समरसता का जादू भाया हिन्दी में

बालक की तुतलाहट, माँ की लोरी थी किस भाषा में
बड़बड़ गीत से खेले थे उनको भी गाया हिन्दी में

गीतों की झंकार, दिलों का प्यार धड़कता है किस में
बोलिवुड का चमत्कार इसलिये तो छाया हिन्दी में

आजादी के लिये कौनसी भाषा बोली बापू ने
अंग्रेजों का जुल्म समझ में सबको आया हिन्दी में

चक्कर खाये रामू ने जब आँफ़िस में गिटपिट सुन कर
मन्त्री तक को आसमान से नीचे लाया हिन्दी में

’अनुभूति’ में:

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/hindi/harihar_jha.htm

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/hindi/harihar_jha.htm

जुलाई 5, 2019

कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र

Filed under: गीत,साहित्य सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:44 अपराह्न
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चलो दिख गये, इसी मॉल पर, 
शॉपिंग करते परख रहे इत्र
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र!

जाने बस, बिजली कौंधी,   
ज्योत जली, अंतस के चिराग में 
उल्लास की, सिसकी की यादें क्यों, 
अब तक छाई दिमाग में
बतियाते थे देख राह में  नागफनी, 
कभी गुलाब पवित्र 
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र!

छीन झपट, फिर  मन के तार,  मिल जाते, 
मित्र-धर्म  के नाते
कबड्डी खो-खो खेल प्यारा, 
गिरते पड़ते, फिर उठ जाते   
जंगल में बिल्ली-दौड़ से, 
भरमाते,  
दब गये वे चरित्र
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र!

उठा कर, फैंक देने का अभिनय,  
करते  छुकछुक गाड़ी में? 
मन माफिक शर्त मनवाते, छुपाते, 
सब कपड़े झाड़ी में  
पीठ पर कपडों के ऊपर, बनाते,  
खच्चर गदहे के चित्र
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र!

प्लान, चुराने 
गुड़-घी शक्कर, हमने खोल दिये थे फाटक
दूर की कौड़ी,  बहस जीतने, 
इंग्लिश  बोलने का नाटक
आती जब,  झगड़े-फसाद में एक हँसी, 
उठते  भाव विचित्र
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र 
 http://www.sahityasudha.com/articles_Dec_2nd_2017/kavita/harihar_jha/kaise.html 

 

जून 5, 2019

जलन से उग जाते डंख

Filed under: गीत,साहित्य सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:34 पूर्वाह्न
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मैं अकेला 
सिसकता हूँ, काल की कर्कश ध्वनि सुनता। 
   
बेड़ियों में 
खुद को जकड़, लागे है कोई छलता     
देख औरों की सफलता, अंगारों में 
दिल जलता   
ऊटपटांग भाव उठते, छा गई 
ईर्ष्या की मलिनता। 
   
देख आँखे टपक जाती  किसी के 
सुहावने पंख    
देख कर कोई पुरस्कृत, जलन से 
उग जाते डंख  
टूट कर मै छटपटाता, 
शून्य में पथराई, हीनता 

मन का मुरारी 
रिझाने  मक्खन लगाया लाड़ में   
”मैं”  की फँफूदी 
हर जगह, हर कोई  जाय भाड़ में  
डग चले हैं 
आसमाँ में, लूँ लांघ सीढ़ी, है विवशता  

ढोल मेरा, 
डंका बजे, काटे मुझे कौन कीड़ा     
समझो महामहिम  मुझको,  लघु-ग्रंथी, देती पीड़ा  
जग मान  जाय तो भी क्या खुद मान लेने में कठिनता।
  http://www.sahityasudha.com/articles_Dec_2nd_2017/kavita/harihar_jha/jalan.html 

 

दिसम्बर 20, 2018

मनमानी राह ले बैठा

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:03 पूर्वाह्न
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किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।

गलत सलत परिधान ले लिये,
पहन लिये विदूषक जैसे
काऊबॉय सा कभी लगे तो,
कभी कोई फटीचर जैसे
दाग लग गये सब वस्त्रों में,
कम ना थे अपने भी लफड़े
धोबन उजले धोती थी पर
फाड़ गई कुचेले कपड़े

जगह जगह पैबन्द लगे हैं,
खोल रहे है कच्चा चिट्ठा
किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।

छलक रही थी उर्जा भीतर
खुशियों से भरपूर खजाना
गरूर मन का उबल पड़ा तो
अपनो को ही किया बेगाना

सोंचा था दिल की धड़कन पर
अपना ही राग सुनायेगे
जाम भरेगी साकी हम तो
चियर्स कहते बतियायेगें

नैनो में मधुशाला थी पर
चिढ़ कर दिखा गई अंगूठा
किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।
http://www.sahityasudha.com/articles_Oct_2nd_2017/kavita/harihar_jha/manmani.html

अप्रैल 22, 2018

फरिश्ता आने वाला है

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:56 पूर्वाह्न
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नन्हा बालक या नन्ही परी
भाये कचोरी या मीठी पूरी,
लुभाती बोली में कहे मम्मी
रबड़ी बनी है यम्मी यम्मी।
घर में कितना उजाला है
फ़रिश्ता आने वाला है।

सर्दी आई जम्पर पहना,
फूलों का गुच्छा लगे गहना,
सब फाड़ दिये फैशन के लफड़े
गर्मी हुई तो फैंके कपड़े,
पहनी गले में माला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

कुछ भी कहा इसे मत तोड़ो
लेकर इसे ऐसे न दौड़ो,
क्या है, ले जाओ हमें बताकर।
हथेली में रखा कहीं छुपाकर
मासूम-सा घोटाला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

घुटने के बल चलता इधर,
पकड़ो यहाँ से जाये उधर,
हाथों से खिसक कर जाये छूट,
लगे प्यारा और कितना क्यूट,
मीठा एहसास  पाला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-kids-farishtA-aanE-wAlA-hai

 

 

मार्च 28, 2018

दीपक कई जले

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:56 अपराह्न
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घंटी बजते ही मंदिर में
दीपक कईं जले
काली रात अमावस ने लो,
वस्त्र धरे उजले।

लक्ष्मी जी की शुरू आरती,
कर्पूर की महक
फैली खुशी हवा में इतनी,
मन में उठी चहक।
नये नये वस्त्रों में बालक
कैसे डोल रहे
लड्डू देख देख शिशु अपना,
मुखड़ा खोल रहे
लार टपकती, सब बच्चों के
मीठे बोल चले।

मुस्कानो से जुड़ती जाती
चूड़ी की खनखन
सुना अप्सराओं ने,
रुनझुन आन बजे घनघन।
दीपक देते रहे रोशनी,
चाँद सितारों को
खुशी बाँटती रही फुलझड़ी
कईं हजारों को,
देख देख हँसते फूलों को
मुस्काये गमले।

काँटे पुष्प बने माला में,
कलि  बतियाती हैं
सब हैं दुल्हा दुल्हन पूरा,
विश्व    बराती है
जीवन जैसे खुद  ब्रह्मा ने
दुनिया नई   रची।
राह नई, गली अंधियारी
मन में कहाँ बची
तमस भले ही हो ताकतवर,
कभी  न दाल गले।

किसने इंद्र वरुण अग्नि को,
आफत में डाला
सौलह हजार ललनाओं पर
संकट का जाला
नरकासुर का दर्प दहाड़ा
शक्ति का आभास
दुर्गति रावण जैसी ही तो
बोलता इतिहास
ज्योत जली, यह देखा
अचरज़ लौ की छाँव तले।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-deepak-kayI-jalE

 

 

फ़रवरी 18, 2018

दंश का व्यवहार

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:38 पूर्वाह्न
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डराती हैं खुली पलकें,
नींद पाने हो रहा मनुहार।

झूलते बसंत
हिचके में कि
जिनको डस गया कोहरा
घर जला कर दीप को
शातिर खिलाड़ी बनाते मोहरा
जला कर हर पंखुड़ी
वे कह रहे हैं
होली का त्योहार।

रिश्तों में पकती खीर चुप
मदिरा की भट्टी दे रही घुड़की
साकी को,
ढाँपते रेशे उड़े
लिबासों  की धज्जियाँ ठिठकी
नोचते हैं गिद्ध,
घायल जंतुओं से प्यार का इजहार।

दहकती धरती को
सूरज थपकियां दे;
बहुत ही खलता
बवण्डर एहसान में
कुछ झोपड़ों को
चूम कर चलता
दहकती साँसे चली
छूकर त्वचा से,
दंश का व्यवहार।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-dansh-kA-vyavahAr

 

जनवरी 12, 2018

दो इन्हें सम्मान

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:49 पूर्वाह्न
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अर्ध-नारी रूप का
शिव से लिया वरदान
नर उसे धिक्कारता क्यों, है नहीं कुछ भान।

कान्ह आते रहे जग में
नाची है राधा
वृहन्नला से ही क्यों
टूटती श्रद्धा?
भीष्म आदर-पात्र,
गाली क्यों बने शिखण्डी
पहेली अद्भूत तो,
हैं क्रुद्ध पाखण्डी
क्यों करो नफ़रत भला, दो इन्हें सम्मान।

विज्ञान अपने अस्त्र ले
देखा इन्हे  परखा
कड़कती थी धूप,
करूणा की हुई  बरखा
इनकी सदियों ने सहे
समाज के अन्याय
ईश-पुस्तक, मुहर झूठी
खुल पड़े अध्याय
धर्म की दीवार लांघो, दो इन्हें भी मान।

प्रकृति का
प्रयोग सहता कोई योगी
’गे’ अपराधी नहीं है
बिल्कुल नहीं रोगी
कुदरत ने सोच दी
दिल सदा उलझा रहे
तार जोड़े इनके भी
गीत कुछ सांझा रहे
प्रेम इनका नृत्य है, सुन लो मधुरी तान।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-dO-inhE-sammAn

 

दिसम्बर 7, 2017

भीग लिया

Filed under: अनहद-कृति,गीत,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:03 पूर्वाह्न

घर पर रोज
नहाया यारो,
साबुन से घुल-मिल कर ख़ूब
बारिश में
कुछ भीग लिया,
क्यों नाराज़ मेरा महबूब।

क्या हो गया?
ज़ुकाम हुआ,
कभी निगोड़ी सर्दी।
झेला अन्तर्द्वन्द्व बहुत
मन की गुंडागिर्दी।
क्या समझूं कोई खींचे
तड़पाये बेदर्दी,
रक्त वर्ण कपोल,
उधर सिंदूर की पाबन्दी।

बहता झरना,
संभल न पाया
ख़ुद को छोड़ा, गया डूब।

बादल छाये ज़ुल्फ़ों से
तो बरसेगा पानी,
छुई-मुई थे अंग,
जुबां की अपनी मनमानी।
मुग्ध हुआ,
घेर रहा था
मुझ पर उसका साया,
डगमग हो गया नियंत्रण
तो संभाल न पाया।

फिसल पड़े पग पनघट से
या छलांग लगी नदी में कूद।
बारिश में कुछ भीग लिया,
क्यों नाराज़ मेरा महबूब।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-humor-bheeg-liyA

सितम्बर 27, 2017

नभ को छू लिया मैंने

देह छू कर रूह तक को
छू लिया मैंने।
उछाली उंगली
कि नभ को छू लिया मैंने।

व्यर्थ है
उड़ना हवा में
चाँद तारे खोजना
व्यर्थ है मंगल, शनि कुछ,
भेजने की योजना।
डर की आँधी, सर्प उड़ते
आग का पसीजना।
बम-धमाकों के ठहाके,
रुदन का बस गुंजना,
डूब आँसू में समन्दर पा लिया मैंने।

आँख कजरारी
कभी तो दे गई झांसा,
मन सुलगता
कोई जादू कर गई ऐसा।
दिल दिवारें ध्वस्त,
कैसे दूर हो हिंसा
भोग की दुनिया में
आई प्रेम की लिप्सा।
कली खिलती तो
बहारें खोल दी मैंने।

उगले शराब महुवा
सिकुड़े
मीठी खजुरिया
कूप अंधा डींग में
मात हो गया दरिया
आँधी में रोय रही
लालटेन बावरिया
फूँस के तिनके चले
उड़ी मेरी छपरिया
जोड़ तिनकों का,
बना ली मंजिलें मैंने।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-nabh-kO-choo-liyA-maine

 

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