हरिहर झा

दिसम्बर 20, 2018

मनमानी राह ले बैठा

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:03 पूर्वाह्न
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किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।

गलत सलत परिधान ले लिये,
पहन लिये विदूषक जैसे
काऊबॉय सा कभी लगे तो,
कभी कोई फटीचर जैसे
दाग लग गये सब वस्त्रों में,
कम ना थे अपने भी लफड़े
धोबन उजले धोती थी पर
फाड़ गई कुचेले कपड़े

जगह जगह पैबन्द लगे हैं,
खोल रहे है कच्चा चिट्ठा
किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।

छलक रही थी उर्जा भीतर
खुशियों से भरपूर खजाना
गरूर मन का उबल पड़ा तो
अपनो को ही किया बेगाना

सोंचा था दिल की धड़कन पर
अपना ही राग सुनायेगे
जाम भरेगी साकी हम तो
चियर्स कहते बतियायेगें

नैनो में मधुशाला थी पर
चिढ़ कर दिखा गई अंगूठा
किसी और की क्या है गलती
मनमानी राह ले बैठा।
http://www.sahityasudha.com/articles_Oct_2nd_2017/kavita/harihar_jha/manmani.html

जुलाई 11, 2018

कोपल की लाचारी

Filed under: गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:25 पूर्वाह्न

जंगल में मंगल है,
कच्ची कोपल की लाचारी
बन्दर की चौपाल जमा
पपिहा गाये दरबारी।

रामराज्य की
टांग खींच कर
कुत्ते मांगे वोट;
गिद्ध नोचते, करते
जिन्दा लाशों से विस्फोट;
बालक रोता रहे
ना मिल पाये जीवन की भीख;
कोई मरे या कोई जीवे ,
सुने ना कोई चीख;

चलदी कोई मासूम
झपटे लंपट व्यभिचारी।

चुगने की आशा में
रामू मन ही मन हरषाये;
भई निराशा, मनवा रोवे
फूल क्यों कुम्हलाये;
फुलवारी में
बगैर लछ्मी के
बीज मिले न खाद;
चप्पल घिसे रोज रोज की
पहुँचा ले कर फरियाद;
किसकी कुंडी खड़काये
द्वार न खोले दरबारी।

 

तिनका लिये
आया पंछी
सिर पर गीर गई गाज़;
रिक्त घोसला बिखरे दाने,
माली है नाराज;
छिपाये मुँह,
किराया बाकी,
पूछे आती लाज;
गिड़गिड़ाये,माफी मांगे पर,
घेर रहे हैं बाज;

माथा नीचा, दुष्टों का
माने खुद को आभारी।

http://www.sahityasudha.com/articles_may_1st_2017/kavita/harihar_jha/kopal_ki.html

जून 5, 2018

कविराज बनते फिरते हो

Filed under: गीत,मंच,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:55 पूर्वाह्न

लाटसाहब की तरह रोज
कविराज बनते फिरते हो
हवा निकल जायेगी
भंडाफोड़ करूंगी याद रहे।
माथापच्ची कौन करे,
तुम बहस किसे जिताते हो
कवि-सम्मेलन में जाते
या कहाँ समय बिताते हो
जासूसी से मिले कार में
सोनपरी के पीले गजरे
ढोंगी हो! लिखते प्रवचन
और छप्पन छुरियों पर नजरे

फिलोसफी की आड़,
पड़ोसन पर कवितायें लिखते हो
बेईमानी का चिठ्ठा,
बन्द पड़ा खोलूंगी याद रहे।

मोबाइल में कोड-वर्ड में
किससे बातें करते हो?
प्रेम-पत्र मिल जाये तो तुम,
अपनी कविता कहते हो
फ़ेसबुक की फ्रैंड से मिल कर
जाने क्या व्यापार किया
भूले मेरा जनम-दिन क्यों,
कभी ना मुझको हार दिया

मुझ पर कंजूसी, औरों के
होटल का बिल भरते हो
मिनिट मिनिट और पाई पाई,
हिसाब करूंगी याद रहे।

घर में भूख नहीं होती,
किस किस के संग खाते हो?
चादर अपनी मैली करके
नाम कबीरा लेते हो?
नकली चेहरे लगा लगा
भोलापन केश करते हो
ड्राइव मुझसे करवा कर
तुम पब में ऐश करते हो

झाड़ू-पोछों में क्यों उलझूं
तुम्हे प्रिय जब मधुशाला
तुम घर में, मैं कैसिनो में
घूमुंगी यह याद रहे।

मैं झाँसी की रानी बन कर
तुम्हे मजा चखाऊंगी
दुखती रग पर हाथ रखूँ
हँस कर के तुम्हे रुलाऊंगी
पति-परमेश्वर समझ लिया,
पुरूष-प्रभुता के रोगी!
सारी अकड़ एक मिनिट में
टाँय टाँय यह फिस होगी

तो सुनो किट्टी-पार्टी है कल
तुम बच्चों को नहलाना
वर्ना पूरी महफिल में
एक्सपोस करूंगी याद रहे।

http://sahityasudha.com/articles_july_2nd_2017/kavita/harihar_jha/kaviraj.html

नवम्बर 1, 2015

शहर में दिवाली

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:07 पूर्वाह्न
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लिये मुस्कान
’रोबो’ की
दिवाली खूब लहराई
हँसी लेकर मुखौटो पर
शहर की शान इतराई

रण में
दुंदुभी बज गई
बजे ’डीजे’ नगारों से
हुई मुठभेड़
कि अब कौन ,
पदक छीने हजारों से

कटारे बन गई
चितवन
उफन तलवार बौराई

पड़ा परशाद,
थाली पर
पकौड़े चाट की छाया
धुँआ सा छा गया पल में
कहीं बारूद फैलाया

बुझे दीपक,
रुदन करती
हुई ’शृंखला’ मँडराई

घिसे बर्तन सभी जग के,
चली लछमी धुँधलके में
दरस के नैन प्यासे थे
खुला उपहार बदले में

दिखी जर्जर हुई चूनर
सुबकती झील गहराई

पहन कर स्वर्ण,
खुशियों का
नया आयाम हाँसिल हो
धरम का स्वाँग
रच डाला
भले ही नजर कातिल हो

अकड़ से
दान देते ही
लटकती जीभ ललचाई

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-shehar-mein-diwali1

जुलाई 6, 2009

जनता की किस्मत फूटी

Filed under: अतुकांत,व्यंग्य,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:46 पूर्वाह्न

झगड़ा हुआ नेताजी और पत्रकार में
मंहगाई की मार से बावले हुये पत्रकार ने
मला सिर पर बाम
लगाया नेताजी पर इलजाम
किसी कोमलांगी के बदन को छूकर
उसके घूंघट की ओंट से निकला एक विडियो टेप
दूसरे दिन व्यभिचार¸ दुराचार की
सुर्खियां छाई
बड़े बड़े अक्षरों में
हाय तौबा हुई
टांग खिंचाई की जनता ने
नाराज हो कर पत्रकारिता की गंदी चाल पर
नेता चिल्लाया और झल्लाया
गेर जिम्मेदार मिडिया पर
भनभनाया “उस दो कौड़ी के पत्रकार” पर
झगड़े मे फंसी युवती से
नाटक किया राखी का
शब्दों की बैसाखी का
उल्टा फंसाया कलमघीसू को
हथकड़ी पहनाकर
बाजार मे घुमाया
हुआ हंगामा सदन में
जब जनता रोती रही रोजी रोटी को
बिजली, पानी और सूखी खेती को
तो जिम्मेदार मिडिया और सूचना के नियन्त्रण पर
भाषण हुये एक्ट बनाने
असंतुष्टो को मनाने
सेमिनारों पर
रकम हुई स्वाहा
मुहं से निकला अहाहा !
मलाई गई नेताजी को
हिस्सा मिला पत्रकार को
मिलीभगत हुई, लड़ाई टूटी
पर दोनो की इस मारामारी में
जनता की किस्मत फूटी।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/05/blog-post_15.html

Ram and Ravan :

http://poetry.com/dotnet/P7382407/999/34/display.aspx

 

सितम्बर 1, 2008

कम्प्यूटर कविता लिखेंगे!

एक युग था
कवि
कविता क्या लिखता था !
भावों को व्यक्त करता था
संवेदनशील मन से
पीड़ा को मथता
तब गंगोत्री से
कविता की धारा बहती
भावनाओं का संचार
फलीभूत होता था

अब गये
पतवार चलाने के दिन
चरखा कातते थे गांधी बाबा
गये चरखे के दिन
अब अन्धाधुन्ध कारखानो से
निकलती कपड़ों की थान
देखो कम्प्यूटर पर
दर्जन कविता की शान

अब कवि लिखेंगे सोफ्टवेयर
सोफ्टवेयर लिखेगा कविता
धड़ाधड़ ले लो
कविता-सविता
भावों और शब्दों की खिचड़ी बना कर
खायेंगे चटखारे लेकर
हिंसक और
विभत्स
आई सी चिप्स से निकलते रस
उल्टी करते रस ;
फड़फड़ा उठेगें
राइम और रिथम
शब्दों को बिलोते औजार
नोचेंगे शैली का जिस्म
अब कवि की क्या बिसात !
कम्प्यूटर कविता लिखेंगे
लेपटोप तालियां बजायेंगे ।

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/07/blog-post_04.html
For “Hobbits disappeared!” and other poems :
 
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=53

जुलाई 1, 2008

कविते !

Filed under: अतुकांत,व्यंग्य,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:36 पूर्वाह्न

हिमालय !
तू बह जा
इमारत !
तू ढह जा
गंगे !
तू बह जा
ऐसे ही
पांच सात
अटपटे
चटपटे
रसीले
मधुभरे
वाक्य मिल कर
कविते !
तू बन जा

– हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/20-1.html#harihar

For “Agony churns my heart” and other 50 poems by further click on the bottom:

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=1

and

http://hariharjha.wordpress.com/

जून 1, 2008

आश्वासन

मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे
( नरक के बदले )
शायद चित्रगुप्त की भूल
या खिलाया
कम्प्यूटर ने गुल

नकली दया दिखाई थी
वो गई असल के खाते में
रिश्वत खाई वो पैसा गया
दान के एकाउन्ट में

हाय ! कर्मों का लेखा आया
कुछ ऐसे स्वरुप में
घपला ये हुआ कि
मन्त्री की छवि उभरी
सन्त के रूप में

अंधे के हाथ बटेर !
देखा, स्वर्ग में खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का नर्तन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का वर्तन

गंधर्व, किन्नर सब आये और गये
नहीं लगे अपने से
साकी और जाम
सब लगे सपने से

इच्छा हुई अपना झन्डा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की
अमीर ! गरीब !
पर शब्द हुये विलिन
न कोई अमीर था न कोई गरीब
हिम्मत कर बोले मन्दिर… मस्जिद…
पर सब अर्थहीन

जिबान बन्द रही
बैठे रहे मन मार
मानो काया पर हो रहा
छुरे भालों का प्रहार

अब लाइसेन्स, रिश्वत, घोटाला
सब गया
मानो गरम गरम तेल की
कड़ाही में शरीर झुलस गया

दो यमदूत और चित्रगुप्त अचानक दिखे
मन्त्रीजी उन पर ही बरस पड़े
“ऐसा होता है क्या स्वर्ग ?
नरक से भी बदतर !”

( क्रमश: )

आश्वासन 2

( पिछ्ली कविता का शेष )

चित्रगुप्त ने जवाब दिया
हँसते हुये –
“कैसा स्वर्ग मत्रींजी ! याद कीजिये आपने
देश के गद्दारो के साथ
पकाई खिचड़ी
आपको तो कुम्भीपाक में पकाया जायगा
आपने जनता से किये थे झूठे वादे
दिये थे आश्वासन
बदले मे यह नरक – स्वर्ग से उल्टा
स्वर्ग का शिर्षासन है
और ये मेनका-उर्वशी की छवियां
स्वर्ग का आश्वासन है ।

– हरिहर झा

– हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html

“Who is wrong” and other 50 poems by further click:

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=56

http://hariharjha.wordpress.com/2008/06/01/who-is-wrong/

 

दिसम्बर 20, 2007

हार पहनाया मुझे !

Filed under: तुकान्त,व्यंग्य,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:05 अपराह्न
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मिला सम्मान उसे नकारुं कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार उतारुं कैसे?

हाय! क्षणभंगुर इन फूलों का जीवन
कुम्हलाकर सब व्यर्थ हो जायगा
दिखा दिखा कर अकड़ रहा हूं
क्षण गया यह तो अनर्थ हो जायगा

बिना तृप्त किये अहं मन मारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?

धन भाग हुये इस माला के
मुझ महामहिम का कण्ठ पाया
धनभाग हुये इस धागे के
जो मेरी देह को छू पाया

जीत ली सारी दुनियां उसे हारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?

पहनाओ मुझे हार बाद मे
दुनियां भर के लफड़े दे जाओ
भले ही मुर्ख बना कर पहना दो
बाद मे पहने कपड़े उतार जाओ

डूबा मन बिन माला के उबारुं  कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?

                     -हरिहर झा

Are you in a paper-made-boat? Read
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/15/my-paper-made-boat/
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