हरिहर झा

दिसम्बर 20, 2007

हार पहनाया मुझे !

Filed under: तुकान्त,व्यंग्य,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:05 अपराह्न
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मिला सम्मान उसे नकारुं कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार उतारुं कैसे?

हाय! क्षणभंगुर इन फूलों का जीवन
कुम्हलाकर सब व्यर्थ हो जायगा
दिखा दिखा कर अकड़ रहा हूं
क्षण गया यह तो अनर्थ हो जायगा

बिना तृप्त किये अहं मन मारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?

धन भाग हुये इस माला के
मुझ महामहिम का कण्ठ पाया
धनभाग हुये इस धागे के
जो मेरी देह को छू पाया

जीत ली सारी दुनियां उसे हारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?

पहनाओ मुझे हार बाद मे
दुनियां भर के लफड़े दे जाओ
भले ही मुर्ख बना कर पहना दो
बाद मे पहने कपड़े उतार जाओ

डूबा मन बिन माला के उबारुं  कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?

                     -हरिहर झा

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दिसम्बर 12, 2007

मुसाफ़िर

Filed under: तुकान्त,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:13 अपराह्न
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माना ये जग है सफर चार दिन का
हम हैं मुसाफिर ये मेला छूटेगा
जब होगा धमाका मौत छीन लेगी
खाली हाथ जाते दिल भी टूटेगा

पंडित बताते मत करो हाय तौबा
धरो हाथ पर हाथ, सब कुछ वो देगा
दे डालो सब कुछ, शिकायत करो ना
अन्त में ईश्वर परीक्षा भी लेगा

माना ये जग है सफर चार दिन का
सफर तक में बैठने को सीट भी चाहिये
जग की यात्रा में नहीं हम जानवर
इन्सानो जैसी जिन्दगी भी चाहिये

वातानुकूलित हैं शयनकक्ष तुम्हारे
मत सिखाओ हमको सबक जिन्दगी का
इन्तजाम खुद के लिये हर सुख सुविधा
भाषण क्या खूब! खुदा की बन्दगी का

माना ये जग है सफर चार दिन का
गम हों भले हम तो खुशियां भी चाहें
बकवास कोरी और लिबास दर्शन का
भटका नहीं सकता हमारी राहें

– हरिहर झा

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अक्टूबर 4, 2007

मां और मातृभूमि

Filed under: तुकान्त,रचनाकार — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:14 पूर्वाह्न
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( एक प्रवासी भारतीय के द्रष्टिकोण से )

छुटा देश तो जीना दूभर  दुखड़ा किससे कहना 

माया मोह की गठरी लादे सुख दुख इसके सहना

     

समझे दर्द  न दिल का कोई घूटी  रही अभिलाषा

मातृस्नेह की एबीसी मे कैसे हो सकती परिभाषा

रहा न अपना,  देश पराया अपना लेने का बीड़ा

याद क्यों आई? मां  ने जन्म दिया था उसकी पीड़ा

  

मां का गर्भ था स्वर्ग के जैसा,  छाया परमानन्द

शयनकक्ष की अद्भूत निंद्रा, सुख सुविधा मे बन्द

  

माता का लहू पोषण देता भूख लगी और तृप्ति

मां की धमनी पीपल छैयां कष्ट गया निवृत्ति

सांस लिये का श्रम न जहां हो जब पूरा आराम

मां की धड़कन गीत बना बस सुना सुबह और शाम

   

केवल नौ महिने क्या बीते मां हो गई मजबूर

प्रसव की पीड़ा भोगी खुद और किया स्वयं से दूर

   

जो दिवारें पाल पोस कर बांटती सुख आनन्द

देती धक्का शर्मसार हो रह न सका मैं बन्द

निकल न पाऊं, रह ना पाऊं अद्भूत रही सुरंग

ममता खदेड़ रही क्यों मुझको छिड़ी हुई क्यों जंग

   

शिशु जन्म ले इसमे चाहे हों जितने संताप

मातृभूमि को छोड़ विदेश मे बसना है क्या पाप ? 

   

प्रेरणा :  राहुल सांकृत्यायन –http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/ghummakkad/ghummakad1.htm

http://rachanakar.blogspot.com/2007/08/maa-aur-matrubhoomi.html

 

For Lotus in the Mud

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सितम्बर 20, 2007

जहरीला सांप

Filed under: तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:07 पूर्वाह्न

भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप

उगले जहर घृणा का कितना नाप सके तो नाप

 

नीच इरादा पूरा करने लिया धरम का डंडा

निर्बल का लहू चूस रहा हट्टा कट्टा मुस्टंडा

बुद्धि बल कुछ नहीं पास में लिया हाथ मे डंडा

स्वारथ पूरा करने नित अपनाता ये हथकंडा

खून खराबे देख गया मानवता का दिल कांप

भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप

  

विधवा हो गई कईं सुहागिन जीवन अब दुश्वार

कितने बच्चे बिन मां के बस रोते हैं लाचार

मनचाही  मांगे रख दी फैलाया मृत्यु का डर

भोले भाले लोगों की हत्यायें करता कायर !

  

दूथ पिलाओ जहर उगल कर देता यह संताप

भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप

  

चूहा बहादुरी दिखाता छिपी ढ़ोल मे पोल

मानव जीवन की मर्यादा लहू मांस से तो

गीद्ध लोमड़ी कैसे जाने जीवदया का मोल

रावण, कंस की दानवता को लिया हृदय मे घोल

क्रूर इरादे शैतानों के भांप सके तो भांप

भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप

                                            (समर्पित  : आतंकवादियों को ) 

                                              हरिहर झा

  Who is “Lisa!”?read on :

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सितम्बर 13, 2007

खिलने दो खुशबू पहचानो

Filed under: अनुभूति,तुकान्त,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:06 पूर्वाह्न

विषम स्थिति हो लोग पराये फिर भी सब मे ईश्वर जानो
भांति भांति के फूल जगत मे खिलने दो खुशबू पहचानो

 

अन्तरिक्ष में ज्वाला भड़की चांद सितारे अस्त हुए
महाकाल ने डेरा डाला देवलोक भी ध्वस्त हुए
शीत लहर में आहें सिसकी कैसा यह हिमपात हुआ
चरम अवस्थाओं के झूले घात गई प्रतिघात हुआ

 

कहा धरा ने संयम बरतो देखो जीवन को पहचानो
बगिया बोली कली प्यार की खिलने दो खुशबू पहचानो

 

धर्म मार्ग पर यथा बाल शिशु किलकारी भरते जाते
भक्तिभाव का रस पी पी कर आनंदित होकर गाते
छन्द ताल मे बहे नदी उन्मुक्त बहे गति से झरना
शब्द ब्रह्ममय जगत यहां बिन दाग चदरिया को धरना

 

पोंगा पंडित इतराया तुम वेदशास्त्र को क्या जानो
कहा जगत ने अरे इन्हे भी खिलने दो खुशबू पहचानो

 

जंजीरों मे घिरी नारियां हुई स्वतन्त्रता बेमानी थी
देवी कह कर फुसलाया शोषण की नीति ठानी थी
सूत्रपात हो क्रान्ति काआधीदुनियांको होश हुआ
प्रगति पथ पर अधिकारों की समता का उद्घोष हुआ

 

भोग्या नहीं, नहीं अबला है स्त्रीशक्ति को पहचानो
प्रेमस्रोत के फूल महकते खिलने दो खुशबू पहचानो 

 

हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_03/03_04pravishtiyan3.htm#hj 

 

For “Hunger – 3 Faces: (  Which one is 3rd Face?) 

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सितम्बर 6, 2007

धुमिल हो गये

Filed under: तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:33 पूर्वाह्न
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( युद्ध की विभिषिका से पीड़ितों को समर्पित ) 

टकरा लिये मौत से हरदम जीवन से अब हारे

आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे

क्रूर इरादे शैतानों के

कि्रड़ा करते रहे आग में

गोली तोपों की आवाजें

भर देते हैं दिल दिमाग मे

जूझ रहे हैं हालातों से ये नसीब के मारे

आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे

स्वार्थ किसी का बन चुड़ेल

करता है कैसी लीला

भूख गरीबी कंगाली

में देखो आटा गीला

फैल रही बिमारी ऐसी छुटे सभी  सहारे

आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे

भाई जुदा होगये

अकेलापन खाने को दौड़े

अंग जुदा हो गये

कि पीड़ा बरस रही या कोड़े

शहर हुआ श्मशान कि देखो कफन हमें पुकारे

आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे

                   

          हरिहर झा

For “The weather”

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अगस्त 30, 2007

लम्हा

Filed under: तुकान्त,शब्दान्जलि — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:46 पूर्वाह्न

नदी की बूंद सा बहता लम्हा
हुआ ना तिजोरी मे कैद लम्हा

 

ख्यालों पे जीवन लुटाता रहा
जीत हार बदले मे पाता रहा
हथेली पे सरसों उगाई जीवन भर
मरने की आशा जुटाई जीवन भर

   

टिक टिक  घड़ी की सुनाता लम्हा
सपनो के जाले बुनाता लम्हा

 

काटे कटता समय यों अकेले
लगा पंख उड़ता भर बीच मेले
तन्हाई गमो की कब बोल पाई
हंसती गाती राहें सब को भाई

 

चुप चुप चले बोर करता लम्हा
घेरे खुशी शोर करता लम्हा

नाटक जग का प्यारनफरत लाये
ना जाने किस क्षण र्पदा गिर जाये
चेतना का दीपक जलाता तिल तिल
तो भी यह चक्रव्यूहभेदन मुश्किल

 

परतदरपरत प्याज खुलता लम्हा
तीखी कुछ मीठी गन्ध देता लम्हा।

For “My Mistress!”

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अगस्त 23, 2007

प्यार की उमंग

Filed under: गीत,तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:58 पूर्वाह्न
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मोम की कसक जो दर्द बन गई

पिघलपिघल लौ से दूर हो गया

आंसुओं की गर्मी से कराह कर

खण्ड मे बंटा तो चूर हो गया

   

रागरागिनी के लय विलय हुये

छटपटाता भाव मौन हो गया

ग्रीष्म चूसता रहा समुद्र को

अंधकार चांद ही को डस गया

     

लड़झगड़ नदी सुमेरू श्रृंग के

केश घने खींच कर पकड़ रही

वायु भय से कांप कर लिपट रही

पर्वतों  की चोंटियां जकड़ रही

       

सुन विलाप जलप्रपात जब हंसा

क्यों हंसा जो गिर रहा पाताल मे

अन्तर्मुखी हो सुन रहा गाती हुई

माधुरी के स्वर अनोखी ताल में

   

किरन भी यह देख कर के हंस उठी

हंस उठी आकाश की गहराईयां

दूर हुई छिटक करके बह गई

खो गई लो गमो की परछाईयां

      

कलि मुस्कुराई देख कर सभी

चेहरे  खुशी से खिल रहे भले

चांदनी नजर मिलाती चांद से

फूल तितलियों से  मिल रहे गले

   

अभिसार  अर्चना का रूप ले

मेघ की उड़ान नृत्य बन गई

दामिनी का नृत्य प्यार हो उठा

प्यार की उमंग फिर बहक गई।

-हरिहर झा

For “Blackens your Face” read

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अगस्त 16, 2007

अंगुर खट्टे हैं

Filed under: तुकान्त,व्यंग्य,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:15 पूर्वाह्न

मेहनत मधुमक्खी  करले हम घोघे और तिलचट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

  

सुस्ती हरदम छाई रहती काम करे तो कौन

हाथ उठाना दूभर है तो हुये सभी हम मौन

दुनियां चांद पे जा पहुंची हम तो पलंग पे सोये

काहे करते माथापच्ची  हम सपनो में खोये

   

भाग्य भरोसे बैठ रहे खेले जूये और सट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

  

हो डाली पर बैर मीठा  ले लेने में कष्ट

काहे खोजें परमाणु बम  दुनियां होवे नष्ट

शयन भंग ना हो र खाना पीना अच्छा कितना

बिना काम लड्डू मिल जाय भाये मन मे कितना

   

हुआ काम हराम तभी तो पेट पे बांधे पट्टे हैं

मिल जायें  तो मीठे ना मिल पाये  अंगुर खट्टे हैं

   

मिलना होगा मिल जावेगा पचड़ा व्यर्थ लिया क्यों

अन्धे विश्वासों मे पल कर दर्शन खड़ा किया यों

मिथ्या यह संसार, जगत है सुन्दर सा इक सपना

नसीब मे जितना भी लिखा बस उतना ही अपना

  

दौड़धूप से नानी मरती भले ही हट्टे-कट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

                    –हरिहर झा

अगस्त 10, 2007

शरमा रहा

Filed under: तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:43 पूर्वाह्न
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पौ फटी नभ लाल हो कर सूर्य से शरमा रहा

चांद गर्वित रूप था कल

मेरे आगे कुछ नहीं

लजाती दुल्हन से पूछो

मेरी उपमा हर कहीं

दाग नभ के आईने मे जाने क्यों है मुहं चिढ़ाता

 

फेंक ठन्डी रोशनी बस मन ही मन शरमा रहा

मुहं छिपा कर चांदनी से चांद अब शरमा रहा

 

गर्व यौवन का छलकता

भिगा देता तन बदन

वार रति का पार होता

बिद्ध उर होता मदन

रूप का अंबार बन

गलहार बांहों मे सिमटता

हुस्न अपने इश्क के दामन मे यों शरमा रहा

मेहबूब ढ़ंक कर चेहरा जुल्फों में यों शरमा रहा । 

पौ फटी नभ लाल हो कर सूर्य से शरमा रहा

            -हरिहर झा  

For “Long live hypocrisy” :

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