हरिहर झा

मई 27, 2017

सूना रस्ता नैन तके

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:02 पूर्वाह्न
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सपनों में सुन शरमाये
पियु की ठकुर सुहाती
रोये दे कर उपालंभ
फिर मन में हरसाती।

सोचे कैसा हरजाई
संग लगा रे दुश्मन
सूना रस्ता नैन तके
फड़फड़ काँपे चिलमन।

छोड़े कजरा नैनन को
रिश्ते सब सौगाती।

प्यास जगाता ओस पिला
ऐसा सावन ठगिया
आँसू हँसते कोपल पर
दंश उगाती बगिया।

बैरी बादल पी जाता
नदियाँ जो बरसाती।

धरती रेगिस्तान हुई
बारिश पर पाबन्दी
ढलक न पाई मोती बन
कोई बूंदाबांदी।

कलियाँ सूखे पतझड़ में
दिल का दर्द सुनाती।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-KUU1415-soona-rasta-nain-takey

 

नवम्बर 12, 2016

कौन जाने शाप किसका?

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:17 अपराह्न
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क्या पता था
वृक्ष विषधर बन
कलि को काट लेगा।

फफक कर रोते रहे
श्रमिक भूखे खेत में,
क्यों शिशु हो दूर घर से,
सो रहे हैं रेत में
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
छाएगी दुर्देव की माया
अन्न दाता छाछ देकर
ख़ुद मलाई चाट लेगा।

स्वतन्त्र है यह देश
इसकी आस में स्वतंत्रता,
चंद सिक्कों के लिए
क्यों सोच में परतंत्रता
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
घिर चुकी जब लोभ की छाया
वृक्ष देकर ज़हर ख़ुद
अमृत फलों को छाँट लेगा।

उजड़ती है कोख, कन्या
रोकर सिसकियाँ भर रही,
देह अपनी बेच कर
जीने को है विवश वही,
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
लुभाया जो न्याय का चेहरा
आँख मूंदे ले तराजू
स्वयं बन्दर बाँट लेगा।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-kaun-jaane-shaap-kiska

सितम्बर 19, 2016

वायदों का पतंग

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:16 पूर्वाह्न

उड़नतश्तरी में
तारों का गुच्छा लगता है
वायदों का पतंग तुम्हारा अच्छा लगता है

रंभा की क्रीड़ा दिखला दी
बॉलीवुड से लाकर
रक्तबीज को भभकी दी
नाटक में गाल फुला कर
फिल्मी सम्मोहन ने
लाक्षागृह में यों भरमाया
शकुनी मामा का पासा अब कच्चा लगता है।

’बिजली’ देखी चन्द्रकला सी
जगी भाग्य की रेखा
खूब उड़े नभ में
पतंग के नीचे हमने देखा
डोर नहीं थी
सर्प नचाते बाजीगर की माया
काले दानव का जादू अब बच्चा लगता है।

कन्नी कटने वाली
चरखी नेताजी का पेट
मांजा बिल्कुल तेज लगा है
पतंग बना राकेट
चिंगारी भस्मासुर की
तो दहकी पूरी काया
स्वांग मोहिनी रूप में भी तो सच्चा लगता है।

 

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-vaaydOn-kaa-patang

 

अगस्त 8, 2016

पगलाई आँखें ढूंढती

Filed under: अनहद-कृति,गीत,विरहिणी,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:54 पूर्वाह्न

 

पगडंडी के पदचिन्ह से भी
क्षितिज देखा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह

फूल सूंघे, छुअन भोगी
सपन का वह घर
कचनार की हर डाल लिपटी राह में दर दर
मधुरस पिया जम कर वहीं
छाया चितेरा जिस जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
डोर पर चलती
ठहरने के नहीं लायक
नट नटी का खेल
कैसा कर रहा नायक
साँस में हर, बीन सुनती
वह सँपेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*
चीथड़ों के इस कफन में
चाँद चकनाचूर
सूरज धधकता
राख की आँधी उड़ी भरपूर
गहरी गुफा से याद का
मलबा उखेरा हर जगह
पगलाई आँखें ढूंढती अपने पिया को हर जगह
*

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-paglaayi-aankhein-dhoondhtee1

My Mistress:

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=18812

 

 

 

जून 14, 2016

दुल्हन का सपना

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:07 पूर्वाह्न
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तासे, ढोल बजे,
शहनाई में  दिल की बजी घंटियाँ।

धड़कन से दिल के तारों को
कँपना है
गीत राग  में
रंग भरा इक  सपना है

निखर मेहँदी
और महावर में कैसी  सजती दुनियाँ।

ठाटबाट हैं ,
गम दहेज सा अनचाहा
पौरुष का वरदान
उसे है मनचाहा

दिल  सम्राट सा
और  बड़ा ’समारट’ है  मेरा सैंयाँ।

भाव बने
रंगीन बादल आप स्वयं
मन  में चली हिलोरें
बनी भरतनाट्यं

शुरू नाच  हुआ
अप्सरा के पैरों में हैं  पैंजनियाँ।

कोई बचाये
जुदाई के चंगुल से
जोबन बैरी
तार खींचता बाबुल से

आंसू टपटप बहें
बखत बिदाई मिलें गलबहियाँ।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-dulhan-kaa-sapna

 

नवम्बर 1, 2015

शहर में दिवाली

Filed under: अनहद-कृति,गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:07 पूर्वाह्न
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लिये मुस्कान
’रोबो’ की
दिवाली खूब लहराई
हँसी लेकर मुखौटो पर
शहर की शान इतराई

रण में
दुंदुभी बज गई
बजे ’डीजे’ नगारों से
हुई मुठभेड़
कि अब कौन ,
पदक छीने हजारों से

कटारे बन गई
चितवन
उफन तलवार बौराई

पड़ा परशाद,
थाली पर
पकौड़े चाट की छाया
धुँआ सा छा गया पल में
कहीं बारूद फैलाया

बुझे दीपक,
रुदन करती
हुई ’शृंखला’ मँडराई

घिसे बर्तन सभी जग के,
चली लछमी धुँधलके में
दरस के नैन प्यासे थे
खुला उपहार बदले में

दिखी जर्जर हुई चूनर
सुबकती झील गहराई

पहन कर स्वर्ण,
खुशियों का
नया आयाम हाँसिल हो
धरम का स्वाँग
रच डाला
भले ही नजर कातिल हो

अकड़ से
दान देते ही
लटकती जीभ ललचाई

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-shehar-mein-diwali1

अप्रैल 2, 2015

नाच हुआ पिपासा का

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:10 पूर्वाह्न
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प्रसव हुआ, भविष्य लिये
आई रंभाती रात
शिशु ने जग में पैर पसारे
मन का दर्पण लिये देह पर
कोई ज़िन्दगी निकल पड़ी।

वर्तन सीखे, भाषा सीखी
सच और झूठ का भान हुआ
बुरी नज़र पर आँख पड़ी तो
लिंग-भेद का ज्ञान हुआ।
खेल गये बचपन के, ख़ुद से
खिलौने-सा व्यवहार हुआ
विकृत हुई समझ, जो देखा
अपराधों का मान हुआ।

फैला जमघट कुकर्मों का
विभत्स हुयीं गलियाँ नुक्कड़
खुला आवरण नाक सिकोड़े
बही गन्दगी निकल पड़ी।

झूठे नापदंड बदन के
हावी हो गये बालिका पर
नग्न देह ललचाती नज़रें
दिल पर कितना आघात हुआ।
आई याद दादी की सीख
अपराध-बोध में लुढ़क पड़ी
माया नगरी, उलझ-उलझ मन
चकाचौंध से मात हुआ।

पत्थर-तोड़ बजी धुन ऐसी
नाच हुआ काम-पिपासा का
निर्वस्त्र देह से लाज लुटी
शातिर हुड़दंगी निकल पड़ी।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-naach-hua-pipaasa-kaa

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=152

जुलाई 29, 2013

श्रृंगार करे उत्सव की रानी

Filed under: गीत,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:54 पूर्वाह्न

रिमझिम तरंग  की चलती टोली
इधर  हवा  में  बिखरी  रंगोली

लहरें हृदय की  उतर ना पायें
यह धरती और आकाश कम है
उछली जाती कहाँ मस्त मौजों !
दिल की खुशियाँ तो स्वयं हम हैं !

मन के कोने से  निकली परियां
कैसी  झूमें नाचें  हमजोली

गाये बजाये  सावन सुहाना
बाग में नशा  छाया है ऐसे
कलियाँ डोलती और बतियाती
घोलती शहद कानों  में जैसे

खड़ी है  मुखर  चाँद के  सामने
लजाते सुर में  चांदनी  भोली

श्रृंगार  करे उत्सव की रानी
सजाये काफिला  हँसते हँसते
मनचले  आशिक सा  पल्लू गिरे
बचता कईं बार  फँसते फँसते

घटा सुनहरी  पहनाये उड़ उड़
धरती को सुन्दर  घाघर-चोली

मई 2, 2013

उपलब्धि

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:59 पूर्वाह्न
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डकार ली गड्डी नोटों की
फाँका चूरण थोड़ा

सिर पर पाँव धरे चढ़ना था
एक एक सीड़ी पर
हाथी के पैरों में पड़ कर
वार किया कीड़ी पर

लहूलुहान माथे पर आज
बरस रहा है कोड़ा

बमविस्फोट में नींद आई
बंसी ने झकझोरा
उमड़ घुमड़ कर भीगे बादल
मेरा पानी कोरा

जाऊँ मंगल पर विमान से
पंछी डालें रोड़ा

अश्वमेध से हाँसिल कर लूँ
सपनो ने भरमाया
पूर्णाहुति स्वयं की देकर
मन ही मन बौराया

हार गया जीवन से तो क्या
जीता मेरा घोड़ा

-हरिहर झा
http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=15673

मई 1, 2012

लिखना बाकी है

Filed under: गीत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:40 पूर्वाह्न
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शब्दों के नर्तन से शापित
अंतर्मन शिथिलाया
लिखने को तो बहुत लिखा
पर कुछ लिखना बाकी है

रुग्ण बाग में पंछी घायल
रक्त वमन जब बहता
विभत्स में शृंगार रसों की
लुकाछिपी खेलाई
विद्रोही दिल रोता रहता
दर्द बहुत ही सहता
फिर भी लफ्जों को निचोड़ कर
बदबू ही फैलाई
खाद समझ नाले से मैंने
कीचड़ तो बिखराया
किन्तु हाय! गन्ध फूलों की
बिखराना बाकी है।

साफ करूंगा वस्त्र भाव के
बचपन में कुछ सोंचा
किन्तु आज तक मैले कपड़े
धूल हटा ना पाया
दुर्गंध भरे, बिखरे बालों
को कितना भी नोचा
निर्मल करे सुभाये ऐसा
कुछ भी लिख ना पाया
ज्योत जलाने चला भले ही
अंधकार में डूबा
अब तक घने तिमिर की परतें
खुल जाना बाकी है।

कागद ने खुश होकर नभ के
रहस्य खूब उभारे
स्याही में डूबा तो, अचरज
पंछी खुद को पाया
ले आई आकाश में कलम
दुबका डर के मारे
उड़ ना पाया मुक्त हवा में
गड्ढे में घुस आया
बहुत किया डबरे में छपछप
थक कर यों पछताया
सागर से उठती लहरों को
छू लेना बाकी है

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2012/04/blog-post.html
A Half Poet :
http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=330

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