हरिहर झा

अक्टूबर 30, 2018

उलझा दिये हैं किस तरह

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:14 पूर्वाह्न

जिन्दगी ने
मायने उलझा दिये हैं किस तरह
तिमिर ने
किरणों के पग उलझा दिये हैं किस तरह

मंथन हुआ, क्षीर सागर,
हिलोरें ले कह रहा
विष पयोधर साथ मिल कर,
क्यों दिलों में बह रहा
नेवला तो बिना देखे
फुदकता इतरा रहा
फँस गया
मुँह में छुछुन्दर,
सांप सब कुछ सह रहा
न्याय ने कानून सब
उलझा दिये हैं किस तरह

कामना चलती
ठुमक कर
स्तब्ध जीवन मौन है
भेष बदले कुटिलता अब
कौन जाने, कौन है
स्वार्थ जो हावी हुआ
विकलांग रिश्ते हो रहे
प्रेम चिड़िया कौन सी
सब कुछ जगत में यौन है
वासना ने दो कदम
उलझा दिये हैं किस तरह

गट्ठरों पर
लाश की,
क्या खूब सौदा चल रहा
गिरगिट बदलता रंग
अवसरवाद में पल रहा
दहकते हैं प्राण ,
दैहिक व्यवस्था बदल रही
जाल का हर चक्र अपने
यन्त्र को ही छल रहा
पखेरु ने
पंख खुद
उलझा दिये हैं किस तरह

https://sahityasudha.com/articles_oct_2016/kavita/harihar_jha/kavita_uljha_diye_hain.html

 

सितम्बर 10, 2018

मन स्वयं बारात हुआ

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,विरहिणी,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:54 अपराह्न

गहरी नींद लगी
सोया तो
मैं स्वयं ही रात हुआ
प्यास पी गया बादल बन कर
मैं स्वयं बरसात हुआ

बंसी की
धुन सुन अंतस में
कितना आनंद समाया
खिलते स्वर की हुई बिछावट
स्थल नभ सब ने गाया
शांति अमन
जो दुल्हन थी तो
दिल का देव बना राजा
झंकृत होती तंत्री
ढोल की थपकी पर बजा बाजा

नाच नाच खुशियों से मेरा
मन स्वयं बारात हुआ

दर्द सहा
जब दुखियों का
तो पीड़ा नस नस में छाई
प्यार हुआ सुलझन से इतना
उलझन ने उलझन पाई
मधुर मधुर गाती लहरें जब
मेरे मन की मीत हुई
स्पंदन बनी वेदना फिर तो
पीड़ा खुद संगीत हुई
बिजली कौंधी
विलिन हुई,
खुद घावों को आघात हुआ

तरस गया
मुस्कान न आई,
मजा लिया बस रोने में
आँसू में बहता,
बचने को
ठाँव मिला ना कोने में
लगा पंख उड़ना चाहा तब,
फैला मैं आकाश हुआ
छुप न सका तो तन कर देखा
शत्रु का पल में नाश हुआ

जीतता हार हार कर यों
खेल स्वयं ही मात हुआ

http://sahityasudha.com/articles_nov_2016/geet/harihar_jha/man_svayam.html

 

अगस्त 16, 2018

इन्द्रधनुषी रंग मचलते

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:23 पूर्वाह्न
Tags:

स्पर्श,
नयन का पा लेने को
इन्द्रधनुषी रंग मचलते।

स्वर लहरी
मचलती काहे
साँसो की सरगम क्या जाने
खूब मचलती जाती राहें
पैरों की रुनझुन को सुनने

मधुर नृत्य की ताल पकड़ने
मृदंग के धिग थाप मचलते।
कंगना थामे
पकड़ कलाई
ज्वार नशे का
पा जाये वो
प्यास नहीं
फिर भी मिट पाई
फूल बरसते छू ओठों को

अलकावली चूम लेने को
पंखुरियों के हार मचलते।

http://www.sahityasudha.com/articles_may_1st_2017/kavita/harihar_jha/indhradhanushi.html

 

 

जुलाई 11, 2018

कोपल की लाचारी

Filed under: गीत,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:25 पूर्वाह्न

जंगल में मंगल है,
कच्ची कोपल की लाचारी
बन्दर की चौपाल जमा
पपिहा गाये दरबारी।

रामराज्य की
टांग खींच कर
कुत्ते मांगे वोट;
गिद्ध नोचते, करते
जिन्दा लाशों से विस्फोट;
बालक रोता रहे
ना मिल पाये जीवन की भीख;
कोई मरे या कोई जीवे ,
सुने ना कोई चीख;

चलदी कोई मासूम
झपटे लंपट व्यभिचारी।

चुगने की आशा में
रामू मन ही मन हरषाये;
भई निराशा, मनवा रोवे
फूल क्यों कुम्हलाये;
फुलवारी में
बगैर लछ्मी के
बीज मिले न खाद;
चप्पल घिसे रोज रोज की
पहुँचा ले कर फरियाद;
किसकी कुंडी खड़काये
द्वार न खोले दरबारी।

 

तिनका लिये
आया पंछी
सिर पर गीर गई गाज़;
रिक्त घोसला बिखरे दाने,
माली है नाराज;
छिपाये मुँह,
किराया बाकी,
पूछे आती लाज;
गिड़गिड़ाये,माफी मांगे पर,
घेर रहे हैं बाज;

माथा नीचा, दुष्टों का
माने खुद को आभारी।

http://www.sahityasudha.com/articles_may_1st_2017/kavita/harihar_jha/kopal_ki.html

जून 5, 2018

कविराज बनते फिरते हो

Filed under: गीत,मंच,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:55 पूर्वाह्न

लाटसाहब की तरह रोज
कविराज बनते फिरते हो
हवा निकल जायेगी
भंडाफोड़ करूंगी याद रहे।
माथापच्ची कौन करे,
तुम बहस किसे जिताते हो
कवि-सम्मेलन में जाते
या कहाँ समय बिताते हो
जासूसी से मिले कार में
सोनपरी के पीले गजरे
ढोंगी हो! लिखते प्रवचन
और छप्पन छुरियों पर नजरे

फिलोसफी की आड़,
पड़ोसन पर कवितायें लिखते हो
बेईमानी का चिठ्ठा,
बन्द पड़ा खोलूंगी याद रहे।

मोबाइल में कोड-वर्ड में
किससे बातें करते हो?
प्रेम-पत्र मिल जाये तो तुम,
अपनी कविता कहते हो
फ़ेसबुक की फ्रैंड से मिल कर
जाने क्या व्यापार किया
भूले मेरा जनम-दिन क्यों,
कभी ना मुझको हार दिया

मुझ पर कंजूसी, औरों के
होटल का बिल भरते हो
मिनिट मिनिट और पाई पाई,
हिसाब करूंगी याद रहे।

घर में भूख नहीं होती,
किस किस के संग खाते हो?
चादर अपनी मैली करके
नाम कबीरा लेते हो?
नकली चेहरे लगा लगा
भोलापन केश करते हो
ड्राइव मुझसे करवा कर
तुम पब में ऐश करते हो

झाड़ू-पोछों में क्यों उलझूं
तुम्हे प्रिय जब मधुशाला
तुम घर में, मैं कैसिनो में
घूमुंगी यह याद रहे।

मैं झाँसी की रानी बन कर
तुम्हे मजा चखाऊंगी
दुखती रग पर हाथ रखूँ
हँस कर के तुम्हे रुलाऊंगी
पति-परमेश्वर समझ लिया,
पुरूष-प्रभुता के रोगी!
सारी अकड़ एक मिनिट में
टाँय टाँय यह फिस होगी

तो सुनो किट्टी-पार्टी है कल
तुम बच्चों को नहलाना
वर्ना पूरी महफिल में
एक्सपोस करूंगी याद रहे।

http://sahityasudha.com/articles_july_2nd_2017/kavita/harihar_jha/kaviraj.html

मई 8, 2018

मैली हो गई बहुत चदरिया

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:43 अपराह्न
Tags: , , ,

मैली हो गई बहुत चदरिया।
मृगजल पीया, संजोया मन में
प्यास कहाँ बुझ पाये
भर भर पानी खींचा फिर भी
जाने क्यों तृषा जलाये

मुरली की धुन कौन सुनाये
अंगारों से भरी गगरिया।

रावन बैठा है दिल में
छल चला परायों अपनों में
बम-गोले ले निकला
उससे जूझ रहा हूँ सपनों में

बूझा ना शत्रु , लड़ने निकल पड़ा
शस्त्रों की बाँध गठरिया ।

जाऊँ कहाँ घना अंधेरा
उड़ती मिट्टी पथरीली
काजल भरा लबालब मन में
राहें भी होती गीली

ढूँढू कहाँ कहाँ, पीड़ा को
दूर भगा देने का जरिया

तनातनी , भीतर कोई थपकी
दे कहता ताली दो
कण्ठ लबालब भरे बिफरते
जी भरकर गाली दो

नाटक किया ज्ञान पाने का
पहन खड़ाऊँ, उठी लकुटिया।

http://sahityasudha.com/articles_july_2nd_2017/kavita/harihar_jha/maili_ho.html

 

अप्रैल 22, 2018

फरिश्ता आने वाला है

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:56 पूर्वाह्न
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नन्हा बालक या नन्ही परी
भाये कचोरी या मीठी पूरी,
लुभाती बोली में कहे मम्मी
रबड़ी बनी है यम्मी यम्मी।
घर में कितना उजाला है
फ़रिश्ता आने वाला है।

सर्दी आई जम्पर पहना,
फूलों का गुच्छा लगे गहना,
सब फाड़ दिये फैशन के लफड़े
गर्मी हुई तो फैंके कपड़े,
पहनी गले में माला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

कुछ भी कहा इसे मत तोड़ो
लेकर इसे ऐसे न दौड़ो,
क्या है, ले जाओ हमें बताकर।
हथेली में रखा कहीं छुपाकर
मासूम-सा घोटाला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

घुटने के बल चलता इधर,
पकड़ो यहाँ से जाये उधर,
हाथों से खिसक कर जाये छूट,
लगे प्यारा और कितना क्यूट,
मीठा एहसास  पाला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-kids-farishtA-aanE-wAlA-hai

 

 

मार्च 28, 2018

दीपक कई जले

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:56 अपराह्न
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घंटी बजते ही मंदिर में
दीपक कईं जले
काली रात अमावस ने लो,
वस्त्र धरे उजले।

लक्ष्मी जी की शुरू आरती,
कर्पूर की महक
फैली खुशी हवा में इतनी,
मन में उठी चहक।
नये नये वस्त्रों में बालक
कैसे डोल रहे
लड्डू देख देख शिशु अपना,
मुखड़ा खोल रहे
लार टपकती, सब बच्चों के
मीठे बोल चले।

मुस्कानो से जुड़ती जाती
चूड़ी की खनखन
सुना अप्सराओं ने,
रुनझुन आन बजे घनघन।
दीपक देते रहे रोशनी,
चाँद सितारों को
खुशी बाँटती रही फुलझड़ी
कईं हजारों को,
देख देख हँसते फूलों को
मुस्काये गमले।

काँटे पुष्प बने माला में,
कलि  बतियाती हैं
सब हैं दुल्हा दुल्हन पूरा,
विश्व    बराती है
जीवन जैसे खुद  ब्रह्मा ने
दुनिया नई   रची।
राह नई, गली अंधियारी
मन में कहाँ बची
तमस भले ही हो ताकतवर,
कभी  न दाल गले।

किसने इंद्र वरुण अग्नि को,
आफत में डाला
सौलह हजार ललनाओं पर
संकट का जाला
नरकासुर का दर्प दहाड़ा
शक्ति का आभास
दुर्गति रावण जैसी ही तो
बोलता इतिहास
ज्योत जली, यह देखा
अचरज़ लौ की छाँव तले।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-deepak-kayI-jalE

 

 

फ़रवरी 18, 2018

दंश का व्यवहार

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:38 पूर्वाह्न
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डराती हैं खुली पलकें,
नींद पाने हो रहा मनुहार।

झूलते बसंत
हिचके में कि
जिनको डस गया कोहरा
घर जला कर दीप को
शातिर खिलाड़ी बनाते मोहरा
जला कर हर पंखुड़ी
वे कह रहे हैं
होली का त्योहार।

रिश्तों में पकती खीर चुप
मदिरा की भट्टी दे रही घुड़की
साकी को,
ढाँपते रेशे उड़े
लिबासों  की धज्जियाँ ठिठकी
नोचते हैं गिद्ध,
घायल जंतुओं से प्यार का इजहार।

दहकती धरती को
सूरज थपकियां दे;
बहुत ही खलता
बवण्डर एहसान में
कुछ झोपड़ों को
चूम कर चलता
दहकती साँसे चली
छूकर त्वचा से,
दंश का व्यवहार।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-dansh-kA-vyavahAr

 

जनवरी 12, 2018

दो इन्हें सम्मान

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:49 पूर्वाह्न
Tags: , , ,

अर्ध-नारी रूप का
शिव से लिया वरदान
नर उसे धिक्कारता क्यों, है नहीं कुछ भान।

कान्ह आते रहे जग में
नाची है राधा
वृहन्नला से ही क्यों
टूटती श्रद्धा?
भीष्म आदर-पात्र,
गाली क्यों बने शिखण्डी
पहेली अद्भूत तो,
हैं क्रुद्ध पाखण्डी
क्यों करो नफ़रत भला, दो इन्हें सम्मान।

विज्ञान अपने अस्त्र ले
देखा इन्हे  परखा
कड़कती थी धूप,
करूणा की हुई  बरखा
इनकी सदियों ने सहे
समाज के अन्याय
ईश-पुस्तक, मुहर झूठी
खुल पड़े अध्याय
धर्म की दीवार लांघो, दो इन्हें भी मान।

प्रकृति का
प्रयोग सहता कोई योगी
’गे’ अपराधी नहीं है
बिल्कुल नहीं रोगी
कुदरत ने सोच दी
दिल सदा उलझा रहे
तार जोड़े इनके भी
गीत कुछ सांझा रहे
प्रेम इनका नृत्य है, सुन लो मधुरी तान।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-dO-inhE-sammAn

 

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