हरिहर झा

मई 10, 2020

राधा खड़ी सदी से

Filed under: गीत,विरहिणी,साहित्य सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:47 पूर्वाह्न
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श्याम सलोने
पलक बिछाऊँ, बसी मूरत न हटती।

राधा खड़ी सदी से
जाने पनघट पर, जल भरने
जेल जनम कब लोगे मोहन,
जग का संकट हरने
भोली बहना कैद,
निर्दयी कंस की नहीं पटती।

राधे मोहन
एक रूप हैं, कवि-वचनामृत तिरछे
राधा-वेश में कृष्न आये,
कृष्न किधर हैं पूछे
कान्हा बन कर
राधा आई, ’राधे! राधे!’ रटती।

छाछ के लिये नाचे कान्हा,
भगत रसखान बोले
रहीमदास
गूढ़ रहस्य को, दो शब्दों में खोले

गिरधर को
कह दो मुरलीधर, तो ना महिमा घटती।

http://www.sahityasudha.com/articles_aug_1st_2018/kavita/harihar_jha/radha.html

फ़रवरी 25, 2020

पीड़ा चुभन की

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:56 पूर्वाह्न
खामोश है 
पीड़ा चुभन की तड़प देती राह पर।

जूझे बहुत  कुंठा मिली,  
अपमान  मिले अपनो  में 
खोपड़ी में ड्रग भरा, 
रंग  बरसे सपनो में

झर झर बहे, 
पर धूल फाँके, मरीचिका लहर लहर ।

दो नैन से टपक आँसू,  
बहाती जब नदी मुनिया। 
क्या चुनेगी? घुटन दिल की, 
या जुलम  की ,नई दुनिया

अब देख लो  ठुमका लगा  
लाती कदम  , क्यों खून पर।         
 
ऊँचे महल  में प्रतिष्ठित   
गिद्ध की  आई सेना   
कर्तव्य था, बन सहचरी  
वासना को तृप्त करना 

खिलखिलाती, 
दुख में भी कलियाँ लिये अंजुरी भर। 
http://www.sahityasudha.com/articles_june_1st_2018/geet/harihar_jha/pida.html

जनवरी 23, 2020

लहरा रही पाती

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:07 पूर्वाह्न
खत्म इंतजार,  
प्रेम की लहरा रही  पाती ।  

हाथ में कागद, 
कोई अदृष्य शक्ति खीचती
डर, चुडैलों का  वन में,     
आँखे हमारी मींचती
संज्ञान, 
अब एक क्षण, रूक जाना है विकट 
गोल गोल राह मगर  
मंजिल कितनी है निकट 
देखता सूरज,   
धरती घूम कर, कहाँ जाती।  

सुहावनी हवा बहती, 
दिल्ली  अब  दूर नहीं      
खुशियों के ठहाके 
मस्त, छाये है हर कहीं 
गुनगुना रहे भँवरों की    
बातें हैं अनकही             
क्यारियों में कलियों को 
गुदगुदी क्यों हो रही 
देख कर बसंत, 
गीत,  कोयल किस लिये गाती|  
http://www.sahityasudha.com/articles_june_1st_2018/geet/harihar_jha/lehra.html

दिसम्बर 21, 2019

आफत का पानी

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:22 पूर्वाह्न
कभी कहीं कोई बरसाता 
आफत का पानी   
तो कौन बकरा बने बलिदानी?  

लाया मुठ्ठी भर रोशनी,
अंधेरों से  लड़ा
आ धमके राहु केतु   
झपटे और ग्रहण पड़ा   
निर्दयी हाथ  ले लेते किस किसकी कुर्बानी     

डरा धमका कर गरीब को 
ले लेते हैं घेर   
पहन बघनखा खुद को 
मान लेते बब्बर  शेर    
शेखी बघार, दंभ भरे इठलाते अभिमानी  

खून भरा तिजोरी में,    
गहरे में बहुत छुपाया   
हुआ पराया हर कोई  
अपयश खूब कमाया   
तन्हाई खुद चालाकी से गुँथती निगरानी  

http://www.sahityasudha.com/articles_april_2nd_2018/kavita/harihar_jha/afat.html

अगस्त 15, 2019

नवप्रकाश सब को भाया

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:42 पूर्वाह्न
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निराश ना हो, चलते रहना,  
गीत नये युग का गाया 
दीया जला तिमिर जहाँ हो,  
नवप्रकाश सब को भाया।  

तैयार हो गई ज्योत नन्ही सी  
था एक जोश नया  
तम के परदे  आगबबूला, 
पर ना मांगी कभी दया 

ठान लिया आगे बढ़ने को  
साथ दिया, सब अपने थे,  
मंजिल  पर बस नयन टिके, 
बाधा कोई डाल न पाया। 

बैठ रहे जो कुर्सी पर  
मृगनयनी की पकड़ कलाई 
पोथी बाँची ऐनक पहने, 
लफ्फाजी बहुत चलाई 

मात खा गये गोरखधन्धे  
ढाई आखर के आगे 
लौ दीपक की बुझने ना दी, 
चहुँ  ओर उजाला छाया।                            

बाबा आदम के सेव गये, 
प्रगति के फल चखे  नये 
जोश, होंश, नजरों की रेखा, 
ग्राफ सभी के उलट गये


झूठ आँकड़ों से बह निकला,  
पोल खुली सब चकित हुये 
कथनी उड़ गई धुँआ बनकर 
देखी करनी की माया।
 http://www.sahityasudha.com/articles_march_2nd_2018/kavita/harihar_jha/navprakash.html 

जुलाई 5, 2019

कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र

Filed under: गीत,साहित्य सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:44 अपराह्न
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चलो दिख गये, इसी मॉल पर, 
शॉपिंग करते परख रहे इत्र
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र!

जाने बस, बिजली कौंधी,   
ज्योत जली, अंतस के चिराग में 
उल्लास की, सिसकी की यादें क्यों, 
अब तक छाई दिमाग में
बतियाते थे देख राह में  नागफनी, 
कभी गुलाब पवित्र 
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र!

छीन झपट, फिर  मन के तार,  मिल जाते, 
मित्र-धर्म  के नाते
कबड्डी खो-खो खेल प्यारा, 
गिरते पड़ते, फिर उठ जाते   
जंगल में बिल्ली-दौड़ से, 
भरमाते,  
दब गये वे चरित्र
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र!

उठा कर, फैंक देने का अभिनय,  
करते  छुकछुक गाड़ी में? 
मन माफिक शर्त मनवाते, छुपाते, 
सब कपड़े झाड़ी में  
पीठ पर कपडों के ऊपर, बनाते,  
खच्चर गदहे के चित्र
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र!

प्लान, चुराने 
गुड़-घी शक्कर, हमने खोल दिये थे फाटक
दूर की कौड़ी,  बहस जीतने, 
इंग्लिश  बोलने का नाटक
आती जब,  झगड़े-फसाद में एक हँसी, 
उठते  भाव विचित्र
कैसे हो मेरे बिछुड़े मित्र 
 http://www.sahityasudha.com/articles_Dec_2nd_2017/kavita/harihar_jha/kaise.html 

 

जून 5, 2019

जलन से उग जाते डंख

Filed under: गीत,साहित्य सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:34 पूर्वाह्न
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मैं अकेला 
सिसकता हूँ, काल की कर्कश ध्वनि सुनता। 
   
बेड़ियों में 
खुद को जकड़, लागे है कोई छलता     
देख औरों की सफलता, अंगारों में 
दिल जलता   
ऊटपटांग भाव उठते, छा गई 
ईर्ष्या की मलिनता। 
   
देख आँखे टपक जाती  किसी के 
सुहावने पंख    
देख कर कोई पुरस्कृत, जलन से 
उग जाते डंख  
टूट कर मै छटपटाता, 
शून्य में पथराई, हीनता 

मन का मुरारी 
रिझाने  मक्खन लगाया लाड़ में   
”मैं”  की फँफूदी 
हर जगह, हर कोई  जाय भाड़ में  
डग चले हैं 
आसमाँ में, लूँ लांघ सीढ़ी, है विवशता  

ढोल मेरा, 
डंका बजे, काटे मुझे कौन कीड़ा     
समझो महामहिम  मुझको,  लघु-ग्रंथी, देती पीड़ा  
जग मान  जाय तो भी क्या खुद मान लेने में कठिनता।
  http://www.sahityasudha.com/articles_Dec_2nd_2017/kavita/harihar_jha/jalan.html 

 

मई 9, 2019

आईना दिखाती

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:13 पूर्वाह्न
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तूफान, दे थपकी सुलाये,  
डर लगे तो क्या करें? 
विष  में बुझे सब तीर  उर को  
भेद दें तो क्या करें?
 
बर्तन भरा 
मन का लबालब,
ऊपर चढ़ते सुख  की छलकन 
सह ना पाई 
उठती धारा   
रुक न पाई ह्रदय की  धड़कन 
पोछना चाहें तो, चेहरा, 
कीचड़ निकलता हाथ अपने  
भयग्रस्त बैठे कांपते थे  
हा देव! या कुछ और  जपने
दुर्देव  मोटे  गाल  अपने   
फुलाये तो क्या करें।
  
ज्वालामुखी दिखता न, 
सुख की  
लॉटरी मुस्काती सामने  
उल्लास था 
आनन्द इतना  
लो चेतना लगी ऊँघने
जाम ले कर नाचती साकी    
हर्षित हुई थी लालिमा में 
फिर क्यों ढहे सपने 
सभी बस छूमन्तर  हुये कालिमा में  
अब  मौत का आगोश झूला     
झुलाये तो क्या करें?
 
कुण्डली 
जनम की क्या बोले  
थे मौन,  
खोटे सभी सिक्के
डायन डराती 
काल बन कर  
विकृत थे,  अंगोपांग उसके 
सामने आईना दिखाती,  
लिपटी कुकर्मों में जो  वृत्ति  
पापिन बनी इतिहास खोदे  
शव नोचने की दुष्प्रवृत्ति  
बेहोंश करता, बोझ गिर कर   
सुलाये तो क्या करें? 
 
http://www.sahityasudha.com/articles_Nov_2nd_2017/kavita/harihar_jha/aaina.html 

Also: Gloom and Hunger 
 
https://hariharjha.wordpress.com/2008/08/01/hunger-and-gloom/ 

मार्च 18, 2019

फुसफुसाते वृक्ष कान में

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:12 अपराह्न

फुसफुसाते वृक्ष कान में
सुन नहीं पाता
स्वयं में डूबा, मुझमें चढ़ रहा उन्माद।

मेरी अधूरी कामना,
अतृप्त इच्छायें
बीच कीचड़, नाद अनहद,
सुनू कहाँ इन्हें
परपीड़क सुख हँसे, रंगरेलियों के बीच
कलियों! डरो मुझसे, देता हूँ चुभन तुम्हे
सूक्ष्म ध्वनिया श्रवण
करना बड़ा मुश्किल
मन में कितना शोर, क्यों घिर आया प्रमाद।

मौन इस संवाद को समझूँ,
नहीं कुछ आस
कोई कंप्यूटर?
विश्लेषण करे कुछ खास
दिमाग की नस नस बना ली भले विश्वकोष
मूढ़ता में ना दिखे प्रकृति का भव्य रास
संगीत से घृणा,
कोलाहल भरा है प्यार
मौसम गज़ल गा रही, मैं दे न पाता दाद।

http://www.sahityasudha.com/articles_Nov_2nd_2017/kavita/harihar_jha/fusfusate.html

जनवरी 24, 2019

गगरिया पनघट पे फूटी

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:57 पूर्वाह्न
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फिसलती जाती उंगली टहनियों से
लटका दिये हैं पाँव लबड़-धोंधों से।

कंस के भांजे बने लूटत रहे हैं सैकडों को
कान्ह को बस छोड़, ग्वाले छेड़ते है गोपियों को
गगरिया पनघट पे फूटी बरसों से।

पराई, नार पर राम-रहिम, स्वाँगमय नज़र तिरछी
आश्रम बनाया छिपाते , गन कही चाकू-बरछी
पीता रहा खून , दीमक हजारों से।

बेटी न हो, जुगाड़ करके बेटा अरे! बना दिया
थी रात काली भयानक , करतब ने मुँह बन्द किया
शव सच का क्यों, उठवा दिया झूठों से।

http://www.sahityasudha.com/articles_Oct_2nd_2017/kavita/harihar_jha/gagaria.html

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