हरिहर झा

अप्रैल 22, 2018

फरिश्ता आने वाला है

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:56 पूर्वाह्न
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नन्हा बालक या नन्ही परी
भाये कचोरी या मीठी पूरी,
लुभाती बोली में कहे मम्मी
रबड़ी बनी है यम्मी यम्मी।
घर में कितना उजाला है
फ़रिश्ता आने वाला है।

सर्दी आई जम्पर पहना,
फूलों का गुच्छा लगे गहना,
सब फाड़ दिये फैशन के लफड़े
गर्मी हुई तो फैंके कपड़े,
पहनी गले में माला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

कुछ भी कहा इसे मत तोड़ो
लेकर इसे ऐसे न दौड़ो,
क्या है, ले जाओ हमें बताकर।
हथेली में रखा कहीं छुपाकर
मासूम-सा घोटाला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

घुटने के बल चलता इधर,
पकड़ो यहाँ से जाये उधर,
हाथों से खिसक कर जाये छूट,
लगे प्यारा और कितना क्यूट,
मीठा एहसास  पाला है।
फ़रिश्ता आने वाला है।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-kids-farishtA-aanE-wAlA-hai

 

 

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मार्च 28, 2018

दीपक कई जले

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:56 अपराह्न
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घंटी बजते ही मंदिर में
दीपक कईं जले
काली रात अमावस ने लो,
वस्त्र धरे उजले।

लक्ष्मी जी की शुरू आरती,
कर्पूर की महक
फैली खुशी हवा में इतनी,
मन में उठी चहक।
नये नये वस्त्रों में बालक
कैसे डोल रहे
लड्डू देख देख शिशु अपना,
मुखड़ा खोल रहे
लार टपकती, सब बच्चों के
मीठे बोल चले।

मुस्कानो से जुड़ती जाती
चूड़ी की खनखन
सुना अप्सराओं ने,
रुनझुन आन बजे घनघन।
दीपक देते रहे रोशनी,
चाँद सितारों को
खुशी बाँटती रही फुलझड़ी
कईं हजारों को,
देख देख हँसते फूलों को
मुस्काये गमले।

काँटे पुष्प बने माला में,
कलि  बतियाती हैं
सब हैं दुल्हा दुल्हन पूरा,
विश्व    बराती है
जीवन जैसे खुद  ब्रह्मा ने
दुनिया नई   रची।
राह नई, गली अंधियारी
मन में कहाँ बची
तमस भले ही हो ताकतवर,
कभी  न दाल गले।

किसने इंद्र वरुण अग्नि को,
आफत में डाला
सौलह हजार ललनाओं पर
संकट का जाला
नरकासुर का दर्प दहाड़ा
शक्ति का आभास
दुर्गति रावण जैसी ही तो
बोलता इतिहास
ज्योत जली, यह देखा
अचरज़ लौ की छाँव तले।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-deepak-kayI-jalE

 

 

फ़रवरी 18, 2018

दंश का व्यवहार

Filed under: अनहद-कृति,गीत,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:38 पूर्वाह्न

डराती हैं खुली पलकें,
नींद पाने हो रहा मनुहार।

झूलते बसंत
हिचके में कि
जिनको डस गया कोहरा
घर जला कर दीप को
शातिर खिलाड़ी बनाते मोहरा
जला कर हर पंखुड़ी
वे कह रहे हैं
होली का त्योहार।

रिश्तों में पकती खीर चुप
मदिरा की भट्टी दे रही घुड़की
साकी को,
ढाँपते रेशे उड़े
लिबासों  की धज्जियाँ ठिठकी
नोचते हैं गिद्ध,
घायल जंतुओं से प्यार का इजहार।

दहकती धरती को
सूरज थपकियां दे;
बहुत ही खलता
बवण्डर एहसान में
कुछ झोपड़ों को
चूम कर चलता
दहकती साँसे चली
छूकर त्वचा से,
दंश का व्यवहार।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-dansh-kA-vyavahAr

 

जनवरी 12, 2018

दो इन्हें सम्मान

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:49 पूर्वाह्न
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अर्ध-नारी रूप का
शिव से लिया वरदान
नर उसे धिक्कारता क्यों, है नहीं कुछ भान।

कान्ह आते रहे जग में
नाची है राधा
वृहन्नला से ही क्यों
टूटती श्रद्धा?
भीष्म आदर-पात्र,
गाली क्यों बने शिखण्डी
पहेली अद्भूत तो,
हैं क्रुद्ध पाखण्डी
क्यों करो नफ़रत भला, दो इन्हें सम्मान।

विज्ञान अपने अस्त्र ले
देखा इन्हे  परखा
कड़कती थी धूप,
करूणा की हुई  बरखा
इनकी सदियों ने सहे
समाज के अन्याय
ईश-पुस्तक, मुहर झूठी
खुल पड़े अध्याय
धर्म की दीवार लांघो, दो इन्हें भी मान।

प्रकृति का
प्रयोग सहता कोई योगी
’गे’ अपराधी नहीं है
बिल्कुल नहीं रोगी
कुदरत ने सोच दी
दिल सदा उलझा रहे
तार जोड़े इनके भी
गीत कुछ सांझा रहे
प्रेम इनका नृत्य है, सुन लो मधुरी तान।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-dO-inhE-sammAn

 

दिसम्बर 7, 2017

भीग लिया

Filed under: अनहद-कृति,गीत,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:03 पूर्वाह्न

घर पर रोज
नहाया यारो,
साबुन से घुल-मिल कर ख़ूब
बारिश में
कुछ भीग लिया,
क्यों नाराज़ मेरा महबूब।

क्या हो गया?
ज़ुकाम हुआ,
कभी निगोड़ी सर्दी।
झेला अन्तर्द्वन्द्व बहुत
मन की गुंडागिर्दी।
क्या समझूं कोई खींचे
तड़पाये बेदर्दी,
रक्त वर्ण कपोल,
उधर सिंदूर की पाबन्दी।

बहता झरना,
संभल न पाया
ख़ुद को छोड़ा, गया डूब।

बादल छाये ज़ुल्फ़ों से
तो बरसेगा पानी,
छुई-मुई थे अंग,
जुबां की अपनी मनमानी।
मुग्ध हुआ,
घेर रहा था
मुझ पर उसका साया,
डगमग हो गया नियंत्रण
तो संभाल न पाया।

फिसल पड़े पग पनघट से
या छलांग लगी नदी में कूद।
बारिश में कुछ भीग लिया,
क्यों नाराज़ मेरा महबूब।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-humor-bheeg-liyA

 

सितम्बर 27, 2017

नभ को छू लिया मैंने

देह छू कर रूह तक को
छू लिया मैंने।
उछाली उंगली
कि नभ को छू लिया मैंने।

व्यर्थ है
उड़ना हवा में
चाँद तारे खोजना
व्यर्थ है मंगल, शनि कुछ,
भेजने की योजना।
डर की आँधी, सर्प उड़ते
आग का पसीजना।
बम-धमाकों के ठहाके,
रुदन का बस गुंजना,
डूब आँसू में समन्दर पा लिया मैंने।

आँख कजरारी
कभी तो दे गई झांसा,
मन सुलगता
कोई जादू कर गई ऐसा।
दिल दिवारें ध्वस्त,
कैसे दूर हो हिंसा
भोग की दुनिया में
आई प्रेम की लिप्सा।
कली खिलती तो
बहारें खोल दी मैंने।

उगले शराब महुवा
सिकुड़े
मीठी खजुरिया
कूप अंधा डींग में
मात हो गया दरिया
आँधी में रोय रही
लालटेन बावरिया
फूँस के तिनके चले
उड़ी मेरी छपरिया
जोड़ तिनकों का,
बना ली मंजिलें मैंने।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-nabh-kO-choo-liyA-maine

 

जुलाई 18, 2017

फुँफकारता है नाग

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:53 पूर्वाह्न
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देह जलती
क्रोध में फुँफकारता है नाग
हर जगह क्यों फैलती
दुर्गन्ध देती आग?

कीचड़ सना कपास है
पर चल रही चरखी
जान कर नफ़रत गले में
निगलते मक्खी।

प्रेम रस के बिना सूखा
जल भरा तड़ाग

बेच सपने चढ़े ऊपर
सिंहासन शंकित
भेड़िये लो शपथ लेते
हो गये अंकित।

स्याही छोड़ी कुकरम की
फैलते हैं दाग।

बदलते परिवेश में
टकराये गागर-जल
सींचता आँसू नयन में
बिखरता काजल।

जलन फैली हर कली में
तड़पता है बाग।

http://anhadkriti.com/harihar-jha-poem-phunphkaarta-hai-naag

 

मई 27, 2017

सूना रस्ता नैन तके

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:02 पूर्वाह्न
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सपनों में सुन शरमाये
पियु की ठकुर सुहाती
रोये दे कर उपालंभ
फिर मन में हरसाती।

सोचे कैसा हरजाई
संग लगा रे दुश्मन
सूना रस्ता नैन तके
फड़फड़ काँपे चिलमन।

छोड़े कजरा नैनन को
रिश्ते सब सौगाती।

प्यास जगाता ओस पिला
ऐसा सावन ठगिया
आँसू हँसते कोपल पर
दंश उगाती बगिया।

बैरी बादल पी जाता
नदियाँ जो बरसाती।

धरती रेगिस्तान हुई
बारिश पर पाबन्दी
ढलक न पाई मोती बन
कोई बूंदाबांदी।

कलियाँ सूखे पतझड़ में
दिल का दर्द सुनाती।

https://www.anhadkriti.com/harihar-jha-KUU1415-soona-rasta-nain-takey

 

नवम्बर 12, 2016

कौन जाने शाप किसका?

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:17 अपराह्न
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क्या पता था
वृक्ष विषधर बन
कलि को काट लेगा।

फफक कर रोते रहे
श्रमिक भूखे खेत में,
क्यों शिशु हो दूर घर से,
सो रहे हैं रेत में
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
छाएगी दुर्देव की माया
अन्न दाता छाछ देकर
ख़ुद मलाई चाट लेगा।

स्वतन्त्र है यह देश
इसकी आस में स्वतंत्रता,
चंद सिक्कों के लिए
क्यों सोच में परतंत्रता
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
घिर चुकी जब लोभ की छाया
वृक्ष देकर ज़हर ख़ुद
अमृत फलों को छाँट लेगा।

उजड़ती है कोख, कन्या
रोकर सिसकियाँ भर रही,
देह अपनी बेच कर
जीने को है विवश वही,
कौन जाने पाप किसका?
कौन जाने शाप किसका?
क्या पता था
लुभाया जो न्याय का चेहरा
आँख मूंदे ले तराजू
स्वयं बन्दर बाँट लेगा।

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-kaun-jaane-shaap-kiska

सितम्बर 19, 2016

वायदों का पतंग

Filed under: अनहद-कृति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:16 पूर्वाह्न

उड़नतश्तरी में
तारों का गुच्छा लगता है
वायदों का पतंग तुम्हारा अच्छा लगता है

रंभा की क्रीड़ा दिखला दी
बॉलीवुड से लाकर
रक्तबीज को भभकी दी
नाटक में गाल फुला कर
फिल्मी सम्मोहन ने
लाक्षागृह में यों भरमाया
शकुनी मामा का पासा अब कच्चा लगता है।

’बिजली’ देखी चन्द्रकला सी
जगी भाग्य की रेखा
खूब उड़े नभ में
पतंग के नीचे हमने देखा
डोर नहीं थी
सर्प नचाते बाजीगर की माया
काले दानव का जादू अब बच्चा लगता है।

कन्नी कटने वाली
चरखी नेताजी का पेट
मांजा बिल्कुल तेज लगा है
पतंग बना राकेट
चिंगारी भस्मासुर की
तो दहकी पूरी काया
स्वांग मोहिनी रूप में भी तो सच्चा लगता है।

 

http://www.anhadkriti.com/harihar-jha-poem-vaaydOn-kaa-patang

 

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