हरिहर झा

फ़रवरी 1, 2007

आस्टृेलिया की आवाज

Filed under: अभिव्यक्ति,गद्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:46 पूर्वाह्न

आस्टृेलिया की आवाज
 
-हरिहर झा
 
पहली बार जब आस्टेलिया आने के लिये एक भारतीय मित्र से विदा ली तो न शुभकामना न चेतावनी;, वे अपने सनकी अन्दाज मे बोले जाओ जाओ भारतभूमि का ही जो हिस्सा हजारों साल पहले हमसे बिछड़ गया है उससे संर्पक साधने तुम्हे ज<र वहां जाना चाहिये। मुझे किसी पुस्तक मे पढ़ी  बात अचानक मेरे मित्र की बात का संर्दभ दे गई पर कुुछ जैसे को तैसा बोलने की खुजली मे कह डाला गु<;, न मै महाद्वीपों की सतह का इतिहास रखता हूं न मै आस्टेलिया की र्निजीव माटी से स्नान करना चाहता हूं । ंमै तो वसुधैव कुटुंबकम् को मद्देनजर रख कर आस्टेलियावासियों के बीच रह कर वहां की संस्कृति के बारे मे भी कुछ जानना चाहता हूं।

कहने को तो कह डाला पर यहां आस्टेलिया आकर एक बार तो स्वयं को पर कटे पंछी सा पाया । सच भी है  एक चिडि़या;, एक बछड़ा या एक पौधा क्या करेगा जब उसे अपनी ही माटी से उखाड़ लिया जाय < क्या करेगा एक इंसान जब विदेश का अपरिचित आवरण पराया सा महसूस होने लगे । इस दुनियावी परमात्मा मे भी अपनी आत्मा को ढूंढने का प्रयास तो करेगा ही न< यही किया यहां के तमाम भारतीयो ने। वैसे तो कहा जाता है कि यहां प्रथम भारतीय केप्टेन कुक के साथ आया था पर आस्टेलिया मे भारतवासियों का टोली मे प्रथम आगमन  उन्नीसवी शताब्दी मे हुआ जिनमे अधिकतर लोग मजदूर थे तब भी उन्होने परिश्रम से उपजे आनन्दभाव और पारिवारिक संस्कृति को नहीं छोडा फिर अचानक 1901 के एक्ट के तहत नये भारतीय आने बन्द हो गये। श्वेतआस्टेलिया की नीति का बोलबाला लगभग द्वितीय महायुद्ध के अन्त तक रहा;, जिससे भारतीयों की संख्या लगभग 7000 पर आकर रूक सी गई।

दूसरा दौर 1950 से शु< हुआ जब एंग्लोइंडियन समुदाय को यहां आने के लिये  ढील दी गई जिन्हे जनगणना मे बाकायदा भारतीय होने की पहचान मिली। धीरे धीरे रंगभेद की नीति अन्तिम सांसे लेती हुई दम तोड़ गई और 1966 से उस नवयुग का सूत्रपात हुआ जिसमे भारतीयों को योग्यता के आधार पर आने मे कोई कठिनाई नही हुई और अब पिछली जनगणना के अनुसार भारतवशिंयों की संख्या 190 हजार तक पहुंच गई। फिजी मे सैनिक विद्रोह के बाद जब वहां भारतीयों को प्रताडि़त किया गया तो वे भी यहां आकर बस गये। इन्होने तो यहां के भारतीय जनजीवन का नक्शा ही बदल डाला। जहां भारत से आये प्रवासी अपने क्षेत्र मे विशिष्ट जानकारी के  बूते पर नौकरियां हांसिल करते रहे वहां फिजी भारतीय अपने व्यवसाय व व्यापार मे काफी प्रगतिशील रहे। आज यदि भारतीय स्त्रियां यहां साडियां़  और गहने खरीद पाती है तो इसमे फिजी हिन्दुस्तानियों की व्यापारिक दक्षता का बहुत बडा योगदान है। कुछ र्वषो से जब गुजराती व्यापारियों का अ<ीका से आना शुरू हुआ फिर तो कहना ही क्या<  अब जब  हिन्दीसिनेमा यहां तक कि भारतीय नाइटक्लब भी उपलब्ध हैं तो पन्द्रहबीस र्वष पूर्व आये प्रवासी छोटीछोटी वस्तु के अभाव का और अकेलेपन का गुजरा जमाना याद कर सब को चांैका देते हैं।  

यहां भारतीयों ने अपनी संस्कृति को जीवित रखने के लिये मराठी;, गुजराती;, तमिल;, बंगाली आदि एसोसियेशन बनाने शुरू किये पर इतने मशगूल हो गये अपने भाषाई और क्षेत्रिय संघ मे कि आस्टेलिया सरकार के सामने एक भारतीय चेहरा बना कर खड़े होने मे काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अनुदान खोते खोते कई अथक प्रयासों के बाद एक फेडरेशन;, एक छातासंस्था बनाने मे सफल हो गये।

तो बात चली थी विदेशी वातावरण मे जूझने की । आ<मण या पलायन की  मूल प्रवृत्ति के नियम के अनुसार कुछ लोग पलायन का सहारा भी ले लेते हैं़ । जनगणना का मकसद होता है कि हर व्यक्ति  सरकार को अपने अस्तित्त्व से सही पहचान करवाये जिससे सरकार को अपनी नीति लागू करने मे सहायता मिले । यदि हिन्दीभाषी हीन भावना के शिकार हो कर हिन्दी को अपनी मातृभाषा घोषित करने से इन्कार कर देंगे तो वे सरकार से कैसे अपेक्षा रख सकते हैं कि नीर्तिनिधारण के समय उनकी भाषा के साथ न्याय हो पायगा< मिडिया मे काफी प्रचार के बाद इस हालात मे अब  सुधार आ पाया है। भाई तेजेन्द्र र्शमा परिक्रमा मे बताते है कि किस प्रकार यू के मे उन्हें व उनके सहयोगियों को हिन्दी को अपना स्थान दिलाने के लिये जूझना पड़ा। यदि हम यहां हिन्दीसेवी संस्थाओं की सदस्यता ग्रहण करने मे भी हिचकिचायेंगे या पदाधिकारी बनने के बाद राजनैतिक दावपेच से संस्थाओं को  विघटन के कगार पर पहुंचा देगे तो हम देर सबेर ही सही किसके पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है।

ऐसा कहना भी अन्याय होगा कि यहां पर अधिकांश भारतवासी इस परिधि मे आजाते हैं बल्कि निष्काम र्कमयोगियों की भी यहां कमी नहीं है। कंप्यूटर जैसे अपने अपने क्षेत्र मे लगे हुये भारतीयों को राजनीति या कूटनीति के लिये समय भी नहीं है। अपनी संस्कृति की रक्षा के साथ साथ उन्हे आस्टेलियावासियों से मिल जुल कर रहना भी खूब आता है । यहां पर भारतवासी घेटो बनाकर नहीं रहते बल्की जहां भी उन्हे काम मिलता है उसके आसपास अपना घर किराये पर ले लेते है या खरीद लेते है। यह इसी बात का प्र्रमाण है कि वे किसी प्रकार की असुरक्षा की भावना के शिकार नहीं हैं। जुआ़ डग या अपराध के क्षेत्र मे नही़ं बल्कि आर्दश नागरिक के उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत किये जा सकते हैं। मुख्यतया ये अपने  क्षेत्र मे  दक्षता के आधार पर आये है< इन्हे डोल पर रह कर स्वाभिमान पर चोट आने देना कतई पसन्द नहीं। इस तरह ये यहां की अर्थ व्यवस्था मे सकारात्मक <प से योगदान करते रहे हैं।

यहां  भारतवंशी किस प्रकार आस्टेलियावासियों के साथ मेलजोल बढ़ाते  हैं और किसी के आंख की किरकिरी नहीं बनते इसका एक प्रमाण पॉलिन हेन्सन नामक रेसिस्ट मानी जाने वाली राजनेता की टिप्पणी से मिलता है । जो पॉलिन हेन्सन यहां के मूल निवासियों और चीन से आये प्रवासियों के प्रति काफी अनुदार विचार रखती है जब उससे भारतवंशियों पर टिप्पणी करने को कहा गया तो नकारात्मक बात सुनने की अपेक्षा रखने वाले पत्रकार को र्हषमिश्रित आर्श्चय का सामना करना पड़ा। कहना न होगा भारतवासी अपनी पहचान और  अस्मिता बनाये रख कर भी यहां की आम जनता के साथ दूध और पानी की तरह घुलमिल जाते हैं। 

अब जरा भारतवशिंयों के बेटेबेटिया क्या करती हैं इस पर नजर दौड़ाई जाय। अमेरिका या बि्रटेन की तरह यहां तीसरी चोथी पीढ़ी होने की अपेक्षा रखना र्व्यथ है क्योंकि प्रवास का मार्ग ही अपेक्षाकृत बहुत समय बाद खुला है। प्रवासियों की संताने जस बाप तस बेटा वाली कहावत चरितार्थ करती हैं। हिन्दुस्तानी छात्रों  का अधिकतम प्रतिशत बेर्चलस या मार्स्टस डिग्री तक अवश्य पहुंचता है वह भी मेडिसिन;, लॉ;, अभियान्त्रिकी;, कंप्यूटर;, कोर्मस व व्यापार आदि के क्षेत्र मे । माता पिता बचपन से ही बच्चों मे महत्वाकांक्षा के  बीज रोपते है जो शिक्षा के क्षेत्र मे स्पष्ट <प से द्रष्टिगोचर होता है।साथ ही अब तो भारत मे रहने वाले छात्रों को एक नया र्स्वणिम मौका हाथ लगा है। यहां पर विश्वविद्यालय आर्थिक रूप से सुदृढ़़ नहीं होने से पूरी फीस देने वाले छात्रों की कमी उन्हे अखरती है।  अन्धा क्या चाहे दो आंखे को चरितार्थ कर न केवल यहां की लगभग दसबीस यूनी भारत के छात्रों को यहां पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करती हैं< भारत मे बसे छात्र भी जम कर स्टूडेन्ट विसा लिये लक्ष्मी देकर सरस्वती की आराधना के लिये चले आते हैं।यहां किसी भी सांस्कृतिक गतिविधि मे यही छात्र भारत की तरोताजा हवा को लाकर उसके झांेके से नई स्फूर्ती भर देते हैं।

भारतीयों के लिये अमेरिका की पुकार जब मन्द हो रही है तो आस्टेलिया अब भी आवाज दे रहा है। हम राहुल सांस्कृत्यायन का र्दद समझ सकते हैं कि जनसंख्या के भार से दबा भारत मध्ययुग की कूपमंडूक आस्थाओं के कारण आस्टेलिया की अमित भूमि व अपार संपत्ति की खोज से वंचित रह गया। पर अब जब भारत समुद्र पार करने से पाप लगने जैसी सड़ी गली मान्यताओं को तिलांजलि दे चुका है तो जागे तब से सुबह को मान कर क्यों न आस्टेलिया पर नजर दौड़ाई जाय जो र्स्वणिम अवसरों से हमारा स्वागत करने को तैयार है।
जनवरी 2004
 http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/melbourne/01_08_04.htm

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साहित्यसंध्या

Filed under: अभिव्यक्ति,गद्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:38 पूर्वाह्न

 साहित्यसंध्या
 
-हरिहर झा
 
बारिशका वातावरण ! गार्डनस्टेट विक्टोरिया की राजधानी मेलबर्न  मे चारो तरफ फूलों की बहार। सभी साहित्यप्रेमियो को तीन र्वषों से चली आ रही द्वैेमासिक साहित्यसंध्या का बेसब्री से इंतजार । आखिर आ ही गया शनिवार, 1 नवंबर का वह दिन। ऐसे मे एक साहित्यप्रेमी के यहां टेलिफोन की घंटी घनघना उठती है। लंदन से आई लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार उषा राजे सक्सेना का फोन पाकर मेलबर्न की मिट्टी महक उठती है। साहित्यप्रेमी अपना टेलिस्कोप रात्रि के 8 बजे वेवरलीमिडोज़ प्रायमरी स्कूल के सभागार पर लगाये बैठा है।

वह देख रहा है  गोष्ठी मे मेर्लबन के लगभग सभी जानेमाने साहित्यकार एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित हैं। अध्यक्ष डा. नरेन्द्र अग्रवाल छीनने आये हैं वे  कविवर र्सवेश्वर दयाल की एक कविता से शु<आत करते है
..और अब छिनने आये हैं वे हमसे हमारी भाषा
..अब जब हम हर तरह से टूट चुके है
हिन्दी के प्रति अनासक्ति और भारत मे ही हिन्दी प्रवासी हो चली है  इस वेदना से संत्रस्त नरेन्द्रजी के मुख से ये उद्गार निकल रहे हैं। र्वतमान मे हिन्दी के हिंगलिश होते जाने पर वे चिन्ता व्यक्त कर रहे हैं।

आज के काव्यपाठ का शुभारंभ हम मेर्लबन के जाने माने और अनुभूति वेबसाइट के कवि से करते हैं, गोष्ठी का प्रारंभ करते हुये वे मेरी ओर माईक बढ़ाते हुये कहते हैं । मैं दीपावली पर लिखी गयी अर्न्तज्योति से काव्यपाठ का प्रारंभ करता हूं तदन्तर न जाने क्यों, बोर व विसंगति का।

अवसादमय वातावरण को बदलते हुये मैं राजनीति पर हास्य और व्यंग्य की कविता आश्वासन सुनाता हूं

मन्त्रीजी र्स्वग सिधारे
नरक के बदले
शायद चित्रगुप्त की भूल या
खिलाया कम्प्यूटर ने गुल
…देखा र्स्वग मे खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का र्नतन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का र्वतन
;.;.;. इच्छा हुई अपना झंडा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की…

श्रोता मन्त्रमुग्ध हुये सुनते जा रहे हैं व माइक आगे की ओर बढ़ रहा है। डा नलिन शारदा श्रोताओं को हवायंन के समुद्रतट पर सैर कराते हुये कबूतर पर लिखी गई अत्यन्त सुन्दर व मधुर कविता का रसास्वादन कराते हुये कहते ह़ै 

भोर हुई अब उड़ जा पंछी बीते कल का भूल जा रोना

शारदाजी की भावप्रधान किन्तु चिंतनशिल कविता के बाद काव्यगोष्ठी आगे बढ़ती है। 
सरल सहज मृदुलाजी अपनी साहित्यिक एवं दार्शनिक मुक्त छंद की कविता

अपने आंगन की दीवारें इतनी सख्त न करो
कि उजाले जिन्दगी के समीप न पहुंच पायें 
से संदेश दे रही है कि अपनी संस्कृति और धरोहर की रक्षा करते हुये भी हमे उदारमना और प्रतिपल विकसित होती सभ्यता के प्रति संवेदनशील और स्वागतभाव रखना चाहिये।

अब माइक यू. क़े़. से आई पुरवाई पत्रिका की सहसंपादिका और यू. क़े़. हिन्दी समिति की उपाध्यक्षा के समक्ष आता है  उषा राजे सक्सेना। उषाजी यू. क़े़. मे होने वाली हिन्दी की गतिविधियों के बारे मे बता रही हैं  बालकों एवं किशोरों के लिये यू. क़े़;. हिन्दीसमिति द्वारा आयोजित हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता मे भाग लिये 500 बच्चो मे से सफल विजेता 11 बच्चो की हुई भारत यात्रा। फिर वे दीपावली पर लिखी गयी कविता ‘दीपावली के आलोक में’ सुनाती है।
इसके बाद उनकी कुछ लोकपि्रय ग़ज़लों को सुन रहे हैं श्रोता

परिंदा याद का, मेरी म<ुडेरी पर नहीं आया
कोई भटका हुआ राही पलट कर घर नहीं आया…

रात भर काला धुआ< उठता रहा
दिल किसी खलिहानसा जलता रहा…

फिज़ा का रंग अब बदला हुआसा लगता है
ये सारा शहर ही जलता हुआसा लगता है…

अन्त मे वे मुक्त छन्द की सांप और फरिश्ता सुना रही हैं। आपकी रचनायें सभागार मे बैठे श्रोताओं के हृदय को छू रही हैं।

अंत मे श्री एडविन र्वधाजी सत्र का समापन करते हुये अपनी दो कवितायें शरद पूर्णिमा व सूची पढ़ते है जो अत्यन्त रोचक व मौलिक विचारों से परिपूर्ण है  
समय आ पहुंचा है अब सोंचता हूं नाम घटाउं सूची से 
…समय के साथ कभी कभी कम हो जाती है सूची
…जैसे कम हो जाती है <चि 
आपकी कवितायें जीवन के प्रतिदिन के अनुभव मे मानव मन को छूती है।

दुसरे सत्र मे इस आयोजन की सफलता की स<यि धुरी श्री रतन मूलचंदानी जी अंग्रेजी के आतंक पर चुटकुला सुनाते हुये श्रोताओं को हंसा रहे हैं। उसी संर्दभ मे श्री हिमांशुजी मच्छर अच्छे खासे र्मद को हिजडा बना सकता है को याद कर सब को हंसा हंसा कर लोट पोट कर रहे हैं। आई. टी. कन्सल्टेन्ट श्री सतीश दत्तजी बचपन में पढ़ी रचना गाय तथा अन्य कवियों की रचनायें सुना रहे हैं। श्रीमती रश्मि दत्ता भोजपुरी मे कजरी सुना कर दूसरे सत्र का समापन करती हैं।

किन्तु हमारे साहित्यप्रेमी का टेलिस्कोप श्री राधेश्याम जी गुप्ता को फोकस मे लिये बिना नहीं छोडता जो शारदा कला केन्द्र की सभी गतिविधियों मे आधारस्तम्भ हैं। वे चाहे कुछ न भी बोले पर उनकी उपस्थिति और उनकी लगन काफी कुछ कह जाती है।

नवम्बर 2003
 
http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/melbourne/01_23_03.htm