हरिहर झा

अगस्त 15, 2019

नवप्रकाश सब को भाया

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:42 पूर्वाह्न
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निराश ना हो, चलते रहना,  
गीत नये युग का गाया 
दीया जला तिमिर जहाँ हो,  
नवप्रकाश सब को भाया।  

तैयार हो गई ज्योत नन्ही सी  
था एक जोश नया  
तम के परदे  आगबबूला, 
पर ना मांगी कभी दया 

ठान लिया आगे बढ़ने को  
साथ दिया, सब अपने थे,  
मंजिल  पर बस नयन टिके, 
बाधा कोई डाल न पाया। 

बैठ रहे जो कुर्सी पर  
मृगनयनी की पकड़ कलाई 
पोथी बाँची ऐनक पहने, 
लफ्फाजी बहुत चलाई 

मात खा गये गोरखधन्धे  
ढाई आखर के आगे 
लौ दीपक की बुझने ना दी, 
चहुँ  ओर उजाला छाया।                            

बाबा आदम के सेव गये, 
प्रगति के फल चखे  नये 
जोश, होंश, नजरों की रेखा, 
ग्राफ सभी के उलट गये


झूठ आँकड़ों से बह निकला,  
पोल खुली सब चकित हुये 
कथनी उड़ गई धुँआ बनकर 
देखी करनी की माया।
 http://www.sahityasudha.com/articles_march_2nd_2018/kavita/harihar_jha/navprakash.html 

मई 9, 2019

आईना दिखाती

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:13 पूर्वाह्न
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तूफान, दे थपकी सुलाये,  
डर लगे तो क्या करें? 
विष  में बुझे सब तीर  उर को  
भेद दें तो क्या करें?
 
बर्तन भरा 
मन का लबालब,
ऊपर चढ़ते सुख  की छलकन 
सह ना पाई 
उठती धारा   
रुक न पाई ह्रदय की  धड़कन 
पोछना चाहें तो, चेहरा, 
कीचड़ निकलता हाथ अपने  
भयग्रस्त बैठे कांपते थे  
हा देव! या कुछ और  जपने
दुर्देव  मोटे  गाल  अपने   
फुलाये तो क्या करें।
  
ज्वालामुखी दिखता न, 
सुख की  
लॉटरी मुस्काती सामने  
उल्लास था 
आनन्द इतना  
लो चेतना लगी ऊँघने
जाम ले कर नाचती साकी    
हर्षित हुई थी लालिमा में 
फिर क्यों ढहे सपने 
सभी बस छूमन्तर  हुये कालिमा में  
अब  मौत का आगोश झूला     
झुलाये तो क्या करें?
 
कुण्डली 
जनम की क्या बोले  
थे मौन,  
खोटे सभी सिक्के
डायन डराती 
काल बन कर  
विकृत थे,  अंगोपांग उसके 
सामने आईना दिखाती,  
लिपटी कुकर्मों में जो  वृत्ति  
पापिन बनी इतिहास खोदे  
शव नोचने की दुष्प्रवृत्ति  
बेहोंश करता, बोझ गिर कर   
सुलाये तो क्या करें? 
 
http://www.sahityasudha.com/articles_Nov_2nd_2017/kavita/harihar_jha/aaina.html 

Also: Gloom and Hunger 
 
https://hariharjha.wordpress.com/2008/08/01/hunger-and-gloom/ 

मार्च 18, 2019

फुसफुसाते वृक्ष कान में

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:12 अपराह्न

फुसफुसाते वृक्ष कान में
सुन नहीं पाता
स्वयं में डूबा, मुझमें चढ़ रहा उन्माद।

मेरी अधूरी कामना,
अतृप्त इच्छायें
बीच कीचड़, नाद अनहद,
सुनू कहाँ इन्हें
परपीड़क सुख हँसे, रंगरेलियों के बीच
कलियों! डरो मुझसे, देता हूँ चुभन तुम्हे
सूक्ष्म ध्वनिया श्रवण
करना बड़ा मुश्किल
मन में कितना शोर, क्यों घिर आया प्रमाद।

मौन इस संवाद को समझूँ,
नहीं कुछ आस
कोई कंप्यूटर?
विश्लेषण करे कुछ खास
दिमाग की नस नस बना ली भले विश्वकोष
मूढ़ता में ना दिखे प्रकृति का भव्य रास
संगीत से घृणा,
कोलाहल भरा है प्यार
मौसम गज़ल गा रही, मैं दे न पाता दाद।

http://www.sahityasudha.com/articles_Nov_2nd_2017/kavita/harihar_jha/fusfusate.html

जनवरी 24, 2019

गगरिया पनघट पे फूटी

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:57 पूर्वाह्न
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फिसलती जाती उंगली टहनियों से
लटका दिये हैं पाँव लबड़-धोंधों से।

कंस के भांजे बने लूटत रहे हैं सैकडों को
कान्ह को बस छोड़, ग्वाले छेड़ते है गोपियों को
गगरिया पनघट पे फूटी बरसों से।

पराई, नार पर राम-रहिम, स्वाँगमय नज़र तिरछी
आश्रम बनाया छिपाते , गन कही चाकू-बरछी
पीता रहा खून , दीमक हजारों से।

बेटी न हो, जुगाड़ करके बेटा अरे! बना दिया
थी रात काली भयानक , करतब ने मुँह बन्द किया
शव सच का क्यों, उठवा दिया झूठों से।

http://www.sahityasudha.com/articles_Oct_2nd_2017/kavita/harihar_jha/gagaria.html

सितम्बर 10, 2018

मन स्वयं बारात हुआ

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,विरहिणी,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:54 अपराह्न

गहरी नींद लगी
सोया तो
मैं स्वयं ही रात हुआ
प्यास पी गया बादल बन कर
मैं स्वयं बरसात हुआ

बंसी की
धुन सुन अंतस में
कितना आनंद समाया
खिलते स्वर की हुई बिछावट
स्थल नभ सब ने गाया
शांति अमन
जो दुल्हन थी तो
दिल का देव बना राजा
झंकृत होती तंत्री
ढोल की थपकी पर बजा बाजा

नाच नाच खुशियों से मेरा
मन स्वयं बारात हुआ

दर्द सहा
जब दुखियों का
तो पीड़ा नस नस में छाई
प्यार हुआ सुलझन से इतना
उलझन ने उलझन पाई
मधुर मधुर गाती लहरें जब
मेरे मन की मीत हुई
स्पंदन बनी वेदना फिर तो
पीड़ा खुद संगीत हुई
बिजली कौंधी
विलिन हुई,
खुद घावों को आघात हुआ

तरस गया
मुस्कान न आई,
मजा लिया बस रोने में
आँसू में बहता,
बचने को
ठाँव मिला ना कोने में
लगा पंख उड़ना चाहा तब,
फैला मैं आकाश हुआ
छुप न सका तो तन कर देखा
शत्रु का पल में नाश हुआ

जीतता हार हार कर यों
खेल स्वयं ही मात हुआ

http://sahityasudha.com/articles_nov_2016/geet/harihar_jha/man_svayam.html