हरिहर झा

मार्च 18, 2019

फुसफुसाते वृक्ष कान में

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:12 अपराह्न

फुसफुसाते वृक्ष कान में
सुन नहीं पाता
स्वयं में डूबा, मुझमें चढ़ रहा उन्माद।

मेरी अधूरी कामना,
अतृप्त इच्छायें
बीच कीचड़, नाद अनहद,
सुनू कहाँ इन्हें
परपीड़क सुख हँसे, रंगरेलियों के बीच
कलियों! डरो मुझसे, देता हूँ चुभन तुम्हे
सूक्ष्म ध्वनिया श्रवण
करना बड़ा मुश्किल
मन में कितना शोर, क्यों घिर आया प्रमाद।

मौन इस संवाद को समझूँ,
नहीं कुछ आस
कोई कंप्यूटर?
विश्लेषण करे कुछ खास
दिमाग की नस नस बना ली भले विश्वकोष
मूढ़ता में ना दिखे प्रकृति का भव्य रास
संगीत से घृणा,
कोलाहल भरा है प्यार
मौसम गज़ल गा रही, मैं दे न पाता दाद।

http://www.sahityasudha.com/articles_Nov_2nd_2017/kavita/harihar_jha/fusfusate.html

जनवरी 24, 2019

गगरिया पनघट पे फूटी

Filed under: गीत,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:57 पूर्वाह्न
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फिसलती जाती उंगली टहनियों से
लटका दिये हैं पाँव लबड़-धोंधों से।

कंस के भांजे बने लूटत रहे हैं सैकडों को
कान्ह को बस छोड़, ग्वाले छेड़ते है गोपियों को
गगरिया पनघट पे फूटी बरसों से।

पराई, नार पर राम-रहिम, स्वाँगमय नज़र तिरछी
आश्रम बनाया छिपाते , गन कही चाकू-बरछी
पीता रहा खून , दीमक हजारों से।

बेटी न हो, जुगाड़ करके बेटा अरे! बना दिया
थी रात काली भयानक , करतब ने मुँह बन्द किया
शव सच का क्यों, उठवा दिया झूठों से।

http://www.sahityasudha.com/articles_Oct_2nd_2017/kavita/harihar_jha/gagaria.html

सितम्बर 10, 2018

मन स्वयं बारात हुआ

Filed under: अध्यात्म, meditation, अनहद-नाद,गीत,विरहिणी,साहित्य-सुधा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:54 अपराह्न

गहरी नींद लगी
सोया तो
मैं स्वयं ही रात हुआ
प्यास पी गया बादल बन कर
मैं स्वयं बरसात हुआ

बंसी की
धुन सुन अंतस में
कितना आनंद समाया
खिलते स्वर की हुई बिछावट
स्थल नभ सब ने गाया
शांति अमन
जो दुल्हन थी तो
दिल का देव बना राजा
झंकृत होती तंत्री
ढोल की थपकी पर बजा बाजा

नाच नाच खुशियों से मेरा
मन स्वयं बारात हुआ

दर्द सहा
जब दुखियों का
तो पीड़ा नस नस में छाई
प्यार हुआ सुलझन से इतना
उलझन ने उलझन पाई
मधुर मधुर गाती लहरें जब
मेरे मन की मीत हुई
स्पंदन बनी वेदना फिर तो
पीड़ा खुद संगीत हुई
बिजली कौंधी
विलिन हुई,
खुद घावों को आघात हुआ

तरस गया
मुस्कान न आई,
मजा लिया बस रोने में
आँसू में बहता,
बचने को
ठाँव मिला ना कोने में
लगा पंख उड़ना चाहा तब,
फैला मैं आकाश हुआ
छुप न सका तो तन कर देखा
शत्रु का पल में नाश हुआ

जीतता हार हार कर यों
खेल स्वयं ही मात हुआ

http://sahityasudha.com/articles_nov_2016/geet/harihar_jha/man_svayam.html