हरिहर झा

जुलाई 29, 2013

श्रृंगार करे उत्सव की रानी

Filed under: गीत,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:54 पूर्वाह्न

रिमझिम तरंग  की चलती टोली
इधर  हवा  में  बिखरी  रंगोली

लहरें हृदय की  उतर ना पायें
यह धरती और आकाश कम है
उछली जाती कहाँ मस्त मौजों !
दिल की खुशियाँ तो स्वयं हम हैं !

मन के कोने से  निकली परियां
कैसी  झूमें नाचें  हमजोली

गाये बजाये  सावन सुहाना
बाग में नशा  छाया है ऐसे
कलियाँ डोलती और बतियाती
घोलती शहद कानों  में जैसे

खड़ी है  मुखर  चाँद के  सामने
लजाते सुर में  चांदनी  भोली

श्रृंगार  करे उत्सव की रानी
सजाये काफिला  हँसते हँसते
मनचले  आशिक सा  पल्लू गिरे
बचता कईं बार  फँसते फँसते

घटा सुनहरी  पहनाये उड़ उड़
धरती को सुन्दर  घाघर-चोली

जनवरी 27, 2011

खिलखिलाये

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:52 पूर्वाह्न

शोक में, उल्लास में
दो बूंद आँसू झिलमिलाये
देखकर प्यासे सुमन पगला गये और खिलखिलाये
*
साज़िश थी इक ,
सूर्य को बन्दी बनाने के लिये
जंजीर में की कैद किरणे
तमस लाने के लिये
नादान मेढक हुये आगे, राह इंगित कर रहे
कौशिशों में जूगनुओं ने चमक़ दी और पर हिलाये
देखकर नन्हे शिशु पगला गये और खिलखिलाये
*
बाद्लों के पार
बेचैनी भरी मदहोंश चितवन
देख सुन्दर सृष्टि को ना
रोक पाई दिल की धड़कन
भाव व्याकुल हो तड़ित सा काँप जाता तन बदन
मधुर आमन्त्रण दिये, निशब्द होठों को हिलाये
देखकर रूठे सनम पगला गये और खिलखिलाये
*
नृत्य काली रात में था
शरारत के मोड़ पर
सुर बिखरता , फैल जाता
ताल लय को तोड़ कर
छू गया अंतस
प्रणय का गीत मुखरित हो उठा
थम गई साँसे उलझ कर जाम लब से यों पिलाये
देखकर प्यासे चषक पगला गये और खिलखिलाए

-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2011/01/blog-post_07.html

नवम्बर 9, 2009

रोना चाहता है

Filed under: मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:26 पूर्वाह्न
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गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है
ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है

ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता गया अब
बावला रे ! तु चैन से सोना चाहता है

कैद हैं सब टेन्शन टकराते मेरे भीतर
तेज जलता चिराग अब बुझना चाहता है

लुट गई तो न बच सकेगी धरती पे कहीँ
आबरू को डूबाके वो मरना चाहता है

हँस न पाया हँसी कभी मासूम सी जो
भटक कर फूल वो कहाँ बोना चाहता है

चाँद पर रात भर यों काला डामर टपकता
पाप धरती से जो हुये ; धोना चाहता है
-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/07/blog-post_17.html

her teasing face

http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/

 

सितम्बर 24, 2009

मण्डी बनाया विश्व को

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:14 पूर्वाह्न
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लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

क्रेन पर ऊँचा चढ़ा कर, चैन उसकी क्यों तोड़ दी
दर्शन बनाया लोभ का , मझधार नैया छोड़ दी
ऋण-यन्त्र से मन्दी बढ़ी, डॉलर नदी में बह लिया
अर्थ के मैले किनारे,   नाच से सम्मोहित किया

बहकता उन्माद सिर पर, क्यों हमें बहका न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

है सैज सिक्कों की बनी, सब बेवफ़ायें सो रही
मण्डी बनाया विश्व को, निलाम ’गुडवील’ हो रही
गर्मजोशी बिकी, जादू सौदागरी का चल गया
शेयरों से आग धधकी, ज्वाला में लहू जल गया

तड़पता सूरज दहक कर कहो क्यों झुलसा न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

’उपभोग’ की जय जय हुई, बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना ’सामान’ और , रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला विज्ञापन की, हर कोई यहाँ फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर, विषकन्या-रूप  डँस लिया

फैकी गुठली रस-निचुड़ी, कहो  क्यों ठुकरा न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post_7797.html

Hunger – 3 Faces

http://hariharjha.wordpress.com/2007/09/11/hunger-3-faces/

सितम्बर 15, 2008

छलना!

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:14 पूर्वाह्न
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घुटन है दिल में बहुत, नाराज दोनो रब जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

पी गया आंसू, जो अग्नि ना बुझी तो विष पिये
प्यासी निगाहें दौड़ती, क्या ढूँढ़ लाने के लिये
ढीठ सी दिखती, कभी तो मुंह मुझसे मोड़ती
चिलचिलाती धूप में भी, क्यों न पीछा छोड़ती ?

धधकती इस आंच में, तड़पा गई मुझको यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

सुनसान राहों में नजर डाली तुझे ढूँढ़ा किये
मिलन हो इस लालसा में, दाग दामन पर लिये
क्यों सताया रूप ने, निर्मम हुई मन की व्यथा
शापित हुई, लज्जित हुई है प्यार की पूरी कथा

हँस के शरमाई, मैं समझा प्रेम की देवी यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

जीत सूने मौन की, संगीत पर ऐसे हुई
दुराशा तेरी न जाने, फलित क्यों कैसे हुई
दुख से बोझिल मन हुआ है, देह जर्जर प्रेम बिन
बोल तेरे याद आये, ख्याल आये रात दिन

नागिन कहूँ, छलना कहूँ, तू लूट लेती है जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

-हरिहर झा

Her Teasing Face :

http://www.poetry.com/dotnet/P8989404/999/4/display.aspx

http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/

जून 1, 2008

आश्वासन

मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे
( नरक के बदले )
शायद चित्रगुप्त की भूल
या खिलाया
कम्प्यूटर ने गुल

नकली दया दिखाई थी
वो गई असल के खाते में
रिश्वत खाई वो पैसा गया
दान के एकाउन्ट में

हाय ! कर्मों का लेखा आया
कुछ ऐसे स्वरुप में
घपला ये हुआ कि
मन्त्री की छवि उभरी
सन्त के रूप में

अंधे के हाथ बटेर !
देखा, स्वर्ग में खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का नर्तन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का वर्तन

गंधर्व, किन्नर सब आये और गये
नहीं लगे अपने से
साकी और जाम
सब लगे सपने से

इच्छा हुई अपना झन्डा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की
अमीर ! गरीब !
पर शब्द हुये विलिन
न कोई अमीर था न कोई गरीब
हिम्मत कर बोले मन्दिर… मस्जिद…
पर सब अर्थहीन

जिबान बन्द रही
बैठे रहे मन मार
मानो काया पर हो रहा
छुरे भालों का प्रहार

अब लाइसेन्स, रिश्वत, घोटाला
सब गया
मानो गरम गरम तेल की
कड़ाही में शरीर झुलस गया

दो यमदूत और चित्रगुप्त अचानक दिखे
मन्त्रीजी उन पर ही बरस पड़े
“ऐसा होता है क्या स्वर्ग ?
नरक से भी बदतर !”

( क्रमश: )

आश्वासन 2

( पिछ्ली कविता का शेष )

चित्रगुप्त ने जवाब दिया
हँसते हुये –
“कैसा स्वर्ग मत्रींजी ! याद कीजिये आपने
देश के गद्दारो के साथ
पकाई खिचड़ी
आपको तो कुम्भीपाक में पकाया जायगा
आपने जनता से किये थे झूठे वादे
दिये थे आश्वासन
बदले मे यह नरक – स्वर्ग से उल्टा
स्वर्ग का शिर्षासन है
और ये मेनका-उर्वशी की छवियां
स्वर्ग का आश्वासन है ।

– हरिहर झा

– हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html

“Who is wrong” and other 50 poems by further click:

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=56

http://hariharjha.wordpress.com/2008/06/01/who-is-wrong/

 

फ़रवरी 13, 2008

आकाश की ओर

( अति मह्त्वाकांक्षी लोग…   क्या क्या गुल खिलाती हैं उनकी हीन ग्रन्थियां…) 

पिकनिक पॉइन्ट पर खड़ा
मैं देख रहा
ढलकता पानी जलधारा का
मैं छूना चाहता झिझकती उंगलियों से
टपकती करूणा इन बूंदों से
गिरती खाइयों में
जिसकी गहराइयां भयदायी
पर कुछ बूंदो की लपटें
महत्वाकांक्षा लिये
वाष्पिभूत होकर
उठी आकाश की ओर।

  
मैं ही हूं वाष्पिभूत जल
ऊपर को उठता हुआ
क्यों समझते तुम मुझे
क्षुद्र और नीचा !
देखता हूँ
न जाने क्यों
नीचे रह गये
कीड़े-मकोड़े आनंदित हैं
मैं जल रहा नन्हेपन की पीड़ा में
घनीभूत हो रहा
ओछेपन का भाव
और सूइयां चुभती
हीन ग्रन्थि की
मैं चिल्लाता हूं
देखो , मुझे देखो
मेरी ऊँचाई !
पर मग्न हो तुम स्वयं में
विनाशकारी धारा से अनजान
बिजली के तार पर
बैठी चिड़िया की तरह;
मैं भी चहचहाना चाहता
कुछ परागकण
फैलाता वायुमण्डल में
बिखरा देता कुछ बीज धरती पर
मकसद वही
विशाल वृक्ष से प्रतिस्पर्धा करने ।

   
मेरे कम्प्यूटर का की बोर्ड
उपहास करता
मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु
निकली कीबोर्ड के बल्ब की चमक
आत्मसात होने
दूर गगन की
निहारिका की ओर
रह गई आधी अधूरी
धुयें की लकीर का छोर
इस ओर |

      -हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/01/blog-post_5996.html

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नवम्बर 8, 2007

हम कवि हैं या मसखरे

हम कवि हैं या मसखरे
सब को हँसाते
जनता का दिल लुभाते
कविता याने कि कैसी हो
बहती नदी जैसी हो
पहले कविता लिखी छन्द में
बोले संपादक जी – अमां यार
कुछ नया लिखो कि कविता संवरे
क्या ये कलि और भंवरे!
गये कालिदास के जमाने
ये हटाओ नागफनी, लगाओ कैक्टस
मैंने देखा – सिसक रही कविता
दहेज की सताई सुहागिन की तरह
मैं बहुत रोया
शब्दों को अंग्रेजी में धोया
हर पंक्ति मुझसे सवाल पूछती
और बवाल मचाती
अपने चेहरे पर घाव दिखाती
तो चढ़ा दिये उस पर मुखौटे
अब कौन नीर भरी
कौन दुख की बदली
ऐसी लाइन पर लाइन बदली
कि ले आये सीधे
रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रक का हार्न
वेयर आइ वाज़ बोर्न !
गलत सलत
सब कुछ चलत
खड़े हो गये मंच पर
अध्यक्ष बोले – करो बातुनी स्त्रियों पर व्यंग्य
मैं रह गया दंग
आवाज आई – बोलो कुछ
पत्नी की राजनीति पर, नहीं..हनीमून में आपबीती पर
नहीं… नहीं… हिजड़ों की संस्कृति पर
तंग आकर हमने
एक जोक सुना दी – नोन वेजिटेरियन
जिसके आर पार
फूहड़पन का व्यापार
हुई तालियों की गड़गड़ाहट
मुझे घोषित किया – श्रेष्ठ कवि.. एक महाकवि
मैं खुश, श्रोता खुश
स्वर्ण-पदक दिया गया
हँसाती चैनल ने सराहा
पर भीतर से मेरा दिल कराहा
शरम आई मुझे अपनी सफलता पर
तीर चुभ गया
काश ! ऐसी प्रशंसा व्यंग्य में की होती
तो कविता की मेरे हाथों
दुर्गति न होती ।

http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/10/57-25-09.html

For Paradox:

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-paradox/

OR

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सितम्बर 13, 2007

खिलने दो खुशबू पहचानो

Filed under: अनुभूति,तुकान्त,मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:06 पूर्वाह्न

विषम स्थिति हो लोग पराये फिर भी सब मे ईश्वर जानो
भांति भांति के फूल जगत मे खिलने दो खुशबू पहचानो

 

अन्तरिक्ष में ज्वाला भड़की चांद सितारे अस्त हुए
महाकाल ने डेरा डाला देवलोक भी ध्वस्त हुए
शीत लहर में आहें सिसकी कैसा यह हिमपात हुआ
चरम अवस्थाओं के झूले घात गई प्रतिघात हुआ

 

कहा धरा ने संयम बरतो देखो जीवन को पहचानो
बगिया बोली कली प्यार की खिलने दो खुशबू पहचानो

 

धर्म मार्ग पर यथा बाल शिशु किलकारी भरते जाते
भक्तिभाव का रस पी पी कर आनंदित होकर गाते
छन्द ताल मे बहे नदी उन्मुक्त बहे गति से झरना
शब्द ब्रह्ममय जगत यहां बिन दाग चदरिया को धरना

 

पोंगा पंडित इतराया तुम वेदशास्त्र को क्या जानो
कहा जगत ने अरे इन्हे भी खिलने दो खुशबू पहचानो

 

जंजीरों मे घिरी नारियां हुई स्वतन्त्रता बेमानी थी
देवी कह कर फुसलाया शोषण की नीति ठानी थी
सूत्रपात हो क्रान्ति काआधीदुनियांको होश हुआ
प्रगति पथ पर अधिकारों की समता का उद्घोष हुआ

 

भोग्या नहीं, नहीं अबला है स्त्रीशक्ति को पहचानो
प्रेमस्रोत के फूल महकते खिलने दो खुशबू पहचानो 

 

हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_03/03_04pravishtiyan3.htm#hj 

 

For “Hunger – 3 Faces: (  Which one is 3rd Face?) 

http://hariharjha.wordpress.com/

OR

http://hariharjha.wordpress.com/2007/09/11/hunger-3-faces/

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