हरिहर झा

जून 5, 2018

कविराज बनते फिरते हो

Filed under: गीत,मंच,व्यंग्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:55 पूर्वाह्न

लाटसाहब की तरह रोज
कविराज बनते फिरते हो
हवा निकल जायेगी
भंडाफोड़ करूंगी याद रहे।
माथापच्ची कौन करे,
तुम बहस किसे जिताते हो
कवि-सम्मेलन में जाते
या कहाँ समय बिताते हो
जासूसी से मिले कार में
सोनपरी के पीले गजरे
ढोंगी हो! लिखते प्रवचन
और छप्पन छुरियों पर नजरे

फिलोसफी की आड़,
पड़ोसन पर कवितायें लिखते हो
बेईमानी का चिठ्ठा,
बन्द पड़ा खोलूंगी याद रहे।

मोबाइल में कोड-वर्ड में
किससे बातें करते हो?
प्रेम-पत्र मिल जाये तो तुम,
अपनी कविता कहते हो
फ़ेसबुक की फ्रैंड से मिल कर
जाने क्या व्यापार किया
भूले मेरा जनम-दिन क्यों,
कभी ना मुझको हार दिया

मुझ पर कंजूसी, औरों के
होटल का बिल भरते हो
मिनिट मिनिट और पाई पाई,
हिसाब करूंगी याद रहे।

घर में भूख नहीं होती,
किस किस के संग खाते हो?
चादर अपनी मैली करके
नाम कबीरा लेते हो?
नकली चेहरे लगा लगा
भोलापन केश करते हो
ड्राइव मुझसे करवा कर
तुम पब में ऐश करते हो

झाड़ू-पोछों में क्यों उलझूं
तुम्हे प्रिय जब मधुशाला
तुम घर में, मैं कैसिनो में
घूमुंगी यह याद रहे।

मैं झाँसी की रानी बन कर
तुम्हे मजा चखाऊंगी
दुखती रग पर हाथ रखूँ
हँस कर के तुम्हे रुलाऊंगी
पति-परमेश्वर समझ लिया,
पुरूष-प्रभुता के रोगी!
सारी अकड़ एक मिनिट में
टाँय टाँय यह फिस होगी

तो सुनो किट्टी-पार्टी है कल
तुम बच्चों को नहलाना
वर्ना पूरी महफिल में
एक्सपोस करूंगी याद रहे।

http://sahityasudha.com/articles_july_2nd_2017/kavita/harihar_jha/kaviraj.html

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