हरिहर झा

जनवरी 27, 2011

खिलखिलाये

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:52 पूर्वाह्न

शोक में, उल्लास में
दो बूंद आँसू झिलमिलाये
देखकर प्यासे सुमन पगला गये और खिलखिलाये
*
साज़िश थी इक ,
सूर्य को बन्दी बनाने के लिये
जंजीर में की कैद किरणे
तमस लाने के लिये
नादान मेढक हुये आगे, राह इंगित कर रहे
कौशिशों में जूगनुओं ने चमक़ दी और पर हिलाये
देखकर नन्हे शिशु पगला गये और खिलखिलाये
*
बाद्लों के पार
बेचैनी भरी मदहोंश चितवन
देख सुन्दर सृष्टि को ना
रोक पाई दिल की धड़कन
भाव व्याकुल हो तड़ित सा काँप जाता तन बदन
मधुर आमन्त्रण दिये, निशब्द होठों को हिलाये
देखकर रूठे सनम पगला गये और खिलखिलाये
*
नृत्य काली रात में था
शरारत के मोड़ पर
सुर बिखरता , फैल जाता
ताल लय को तोड़ कर
छू गया अंतस
प्रणय का गीत मुखरित हो उठा
थम गई साँसे उलझ कर जाम लब से यों पिलाये
देखकर प्यासे चषक पगला गये और खिलखिलाए

-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2011/01/blog-post_07.html

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3 टिप्पणियाँ »

  1. nice

    टिप्पणी द्वारा loksangharsha — अप्रैल 21, 2011 @ 1:25 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. शानदार अभिव्यक्ति…

    टिप्पणी द्वारा jai kumar jha — अप्रैल 21, 2011 @ 2:30 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  3. साज़िश थी इक ,
    सूर्य को बन्दी बनाने के लिये
    जंजीर में की कैद किरणे
    तमस लाने के लिये
    नादान मेढक हुये आगे, राह इंगित कर रहे
    कौशिशों में जूगनुओं ने चमक़ दी और पर हिलाये
    देखकर नन्हे शिशु पगला गये और खिलखिलाये
    *bahut hi gahan bhaw

    टिप्पणी द्वारा rashmi prabha — अप्रैल 21, 2011 @ 3:28 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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