हरिहर झा

फ़रवरी 20, 2008

मधुशाला के नाम

Filed under: गीत,साउथ एशिया टाइम्स,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:42 पूर्वाह्न
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 चंचल आंखों की पीड़ा से छलक रहा क्यों जाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
  
कैसे बच पायेगा पंखी ठगी हुई सी आंखें
छाया विष हलाहल नभ में उड़ती दोनो पांखें
गले तीर के लग जाने के कैसे ये अरमान
चीर कलेजा क्षुधा मिटाने की मन में ली ठान

नरक बनी दुनिया सपने में आती स्वर्ग समान
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम

मानमनावन कैसे हो दिल में हसरत की आग
अधर मौन होकर सोचे अब जागे मेरे भाग
दिल डूबा गहराई में भावों के स्वप्निल पंख
ओले बन अंगारे बरसे कलियां मारे डंख

शीतल छांव के दो पल, बदले में वियोग हाय राम !
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम

खड़ा हुआ खलनायक देखो, बन कर भाग्य विधाता
हाय ! विदूषक मसखरी करता, सब्ज बाग दिखलाता
ठौर ना मिला प्रेम को, छलनी हुआ गया अब चैन
कैद हो गया अपराधी सा, अश्रुपूरित नैन

अमृत की दो बूंद जहर से मिल कर काम तमाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम

Why Torture?

http://hariharjha.wordpress.com/2008/02/19/why-torture/

OR

http://hariharjha.wordpress.com

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2 टिप्पणियाँ »

  1. बहुत अच्छा लगा झा जी, पढ़ कर।

    टिप्पणी द्वारा Gyan Dutt Pandey — फ़रवरी 20, 2008 @ 1:16 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. कैसे बच पायेगा पंखी ठगी हुई सी आंखें
    छाया विष हलाहल नभ में उड़ती दोनो पांखें
    गले तीर के लग जाने के कैसे ये अरमान
    चीर कलेजा क्षुधा मिटाने की मन में ली ठान
    bahut dil ko chu lene wali panktiyan,kavita bahut sundar shabdon ke mala ke saath bani hai,its beautiful.

    टिप्पणी द्वारा mehhekk — फ़रवरी 20, 2008 @ 4:06 अपराह्न |प्रतिक्रिया


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