हरिहर झा

दिसम्बर 20, 2007

हार पहनाया मुझे !

Filed under: तुकान्त,व्यंग्य,हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:05 अपराह्न
Tags: , , , ,

मिला सम्मान उसे नकारुं कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार उतारुं कैसे?

हाय! क्षणभंगुर इन फूलों का जीवन
कुम्हलाकर सब व्यर्थ हो जायगा
दिखा दिखा कर अकड़ रहा हूं
क्षण गया यह तो अनर्थ हो जायगा

बिना तृप्त किये अहं मन मारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?

धन भाग हुये इस माला के
मुझ महामहिम का कण्ठ पाया
धनभाग हुये इस धागे के
जो मेरी देह को छू पाया

जीत ली सारी दुनियां उसे हारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?

पहनाओ मुझे हार बाद मे
दुनियां भर के लफड़े दे जाओ
भले ही मुर्ख बना कर पहना दो
बाद मे पहने कपड़े उतार जाओ

डूबा मन बिन माला के उबारुं  कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?

                     -हरिहर झा

Are you in a paper-made-boat? Read
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/15/my-paper-made-boat/
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3 टिप्पणियाँ »

  1. बहुत बढिया!यही सच्चाई है।

    हाय! क्षणभंगुर इन फूलों का जीवन
    कुम्हलाकर सब व्यर्थ हो जायगा
    दिखा दिखा कर अकड़ रहा हूं
    क्षण गया यह तो अनर्थ हो जायगा

    टिप्पणी द्वारा paramjitbali — दिसम्बर 21, 2007 @ 5:29 अपराह्न |प्रतिक्रिया

  2. बहुत गहरी बात कही आपने…. मुझे अपनी कविता याद आ गई….
    मैं ही मैं इस सृष्टि में और न कोई इस दृष्टि में
    ऐसा भाव किसी का पाकर मन सोचे ये रह रह कर
    मानव मन को समझ न पाए क्षण भंगुर हम तन ये लाए !!!

    टिप्पणी द्वारा मीनाक्षी — दिसम्बर 28, 2007 @ 7:53 अपराह्न |प्रतिक्रिया

  3. Jhaji

    Coming to Melbourne shortly.
    How to contact you?
    Email or Tel no?

    Like to meet you

    Mayank Jain
    jainmayank66@yahoo.com

    टिप्पणी द्वारा Mayank — अप्रैल 28, 2008 @ 2:40 अपराह्न |प्रतिक्रिया


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