हरिहर झा

नवम्बर 8, 2007

हम कवि हैं या मसखरे

हम कवि हैं या मसखरे
सब को हँसाते
जनता का दिल लुभाते
कविता याने कि कैसी हो
बहती नदी जैसी हो
पहले कविता लिखी छन्द में
बोले संपादक जी – अमां यार
कुछ नया लिखो कि कविता संवरे
क्या ये कलि और भंवरे!
गये कालिदास के जमाने
ये हटाओ नागफनी, लगाओ कैक्टस
मैंने देखा – सिसक रही कविता
दहेज की सताई सुहागिन की तरह
मैं बहुत रोया
शब्दों को अंग्रेजी में धोया
हर पंक्ति मुझसे सवाल पूछती
और बवाल मचाती
अपने चेहरे पर घाव दिखाती
तो चढ़ा दिये उस पर मुखौटे
अब कौन नीर भरी
कौन दुख की बदली
ऐसी लाइन पर लाइन बदली
कि ले आये सीधे
रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रक का हार्न
वेयर आइ वाज़ बोर्न !
गलत सलत
सब कुछ चलत
खड़े हो गये मंच पर
अध्यक्ष बोले – करो बातुनी स्त्रियों पर व्यंग्य
मैं रह गया दंग
आवाज आई – बोलो कुछ
पत्नी की राजनीति पर, नहीं..हनीमून में आपबीती पर
नहीं… नहीं… हिजड़ों की संस्कृति पर
तंग आकर हमने
एक जोक सुना दी – नोन वेजिटेरियन
जिसके आर पार
फूहड़पन का व्यापार
हुई तालियों की गड़गड़ाहट
मुझे घोषित किया – श्रेष्ठ कवि.. एक महाकवि
मैं खुश, श्रोता खुश
स्वर्ण-पदक दिया गया
हँसाती चैनल ने सराहा
पर भीतर से मेरा दिल कराहा
शरम आई मुझे अपनी सफलता पर
तीर चुभ गया
काश ! ऐसी प्रशंसा व्यंग्य में की होती
तो कविता की मेरे हाथों
दुर्गति न होती ।

http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/10/57-25-09.html

For Paradox:

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-paradox/

OR

http://hariharjha.wordpress.com

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4 टिप्पणियाँ »

  1. काश ! ऐसी प्रशंसा व्यंग्य में की होती
    तो कविता की मेरे हाथों
    दुर्गति न होती ।

    –बहुत उम्दा बात कही. आनन्द आया हरिहर जी.

    टिप्पणी द्वारा समीर लाल — नवम्बर 8, 2007 @ 1:48 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. धन्यवाद समीर जी

    टिप्पणी द्वारा हरिहर — नवम्बर 8, 2007 @ 2:58 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  3. बहुत बढिया रचना है…बहुत सही लिखा है-

    काश ! ऐसी प्रशंसा व्यंग्य में की होती
    तो कविता की मेरे हाथों
    दुर्गति न होती ।

    टिप्पणी द्वारा परमजीत बाली — नवम्बर 8, 2007 @ 6:52 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  4. धन्यवाद परमजीत जी

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — नवम्बर 15, 2007 @ 12:44 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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