हरिहर झा

अक्टूबर 18, 2007

दर्द का दर्द

Filed under: अतुकांत,कृत्या — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:07 पूर्वाह्न
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मै जब खाली पेट था
भूखा !   सिर्फ भूखा !
नहीं जानता था
क्या होता है सिर दर्द
दिल मे लिये फिरता था
सिर्फ प्यार का दर्द

हाँ अब, जब खट्टी डकारे लेता हूं
कल का भोजऩ कोई छीन  न ले
इस चिन्ता मे व्यस्त रहता हूं
तब चुभ रहा है तीर
दर्द से फटा जाता है सिर ।

पर कहते हैं इस युग में
दर्द को संवेदना नहीं
अनुभूति नहीं
बिल्कुल जड़ समझो ।
किसी सड़े हुये सेव की तरह
या गले मे अटकी  गोटी की तरह
वस्तु  समझो और
गोली खाकर
गोटी को निकाल फेको । 
तो गुब्बारा हुये इस पेट का दर्द  
लगता है  सड़ा हुआ सेव
न्यूटन से पुछ कर
सिर  से गिर कर
पेट मे उतर आया
सेव फट कर
ज्यों मिट्टी मे मिला  
शुरू  हुआ बदन दर्द  ।

आखिर यह दर्द  है क्या !
बस, काया से मस्तिष्क तक
न्यूरोन से गुजरती यात्रा । 

न्युरोन को पकड़ा पर
दर्द  कहां पिट पाया
बिजली को धूल माना
पर दर्द  कहां मिट पाया ।

      -हरिहर झा

http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time5.html 

नोट: भॊतिकी जानने वालों के लिये:

बिजली को धूल माना
= तरंग को कण माना
= wave  को  particle  माना 

कविता इस परिप्रेक्ष्य में लें

Do you like  Shaayari in English ? Click on: 

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/13/in-love/ 

OR

http://hariharjha.wordpress.com/

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4 टिप्पणियाँ »

  1. एक आह निकल गई, हरिहर भाई. बहुत खूब.

    टिप्पणी द्वारा समीर लाल — अक्टूबर 18, 2007 @ 1:13 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. धन्यवाद समीर जी
    इस बार दर्द को दिल के साथ साथ दिमाग से भी देख्नना पड़ा।

    टिप्पणी द्वारा हरिहर — अक्टूबर 18, 2007 @ 1:33 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  3. हरिहर जी ,
    दर्द न पिटता है , न मिटता है , हमसे लिपट कर हमीं मे सिमट जाता है.
    “पर कहते हैं इस युग में
    दर्द को संवेदना नहीं
    अनुभूति नहीं
    बिल्कुल जड़ समझो ।” बिल्कुल सत्य वचन… !

    टिप्पणी द्वारा मीनाक्षी — अक्टूबर 18, 2007 @ 7:43 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  4. धन्यवाद मीनाक्षी जी

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — अक्टूबर 19, 2007 @ 12:18 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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