हरिहर झा

जुलाई 26, 2007

न जाने क्यों

Filed under: अतुकांत,अनुभूति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:00 पूर्वाह्न

भूख से कराहते बालक को देख कर
न जाने क्यों
मेरे हाथ
उसे रोटी देने के बदले
दार्शनिक गुत्थी मे उलझ गये 
कि भूख क्या है और दुख क्या
शरीर क्या है और आत्मा क्या ?

निरीह अबला को
घसीट कर ले जाते देख कर
न जाने क्यों मेरी आंखे
उस दो हडि्डयों वाले पापी को 
शर्म से डुबाने के बदले
विचार मे खो गई कि यहां
मजबूर कौन है और अपराधी कौन 
प्यार क्या है और वासना क्या ?

 

साम्प्रदायिक दंगे मे 
जिन्दा छुरियों और कराहती लाशों के बीच
चीत्कार सुनने के बदले
न जाने क्यों मेरे कान
दुनियादारी का नाम देकर 
ओछेपन की दलदल मे उतर गये 
यहां हिन्दू कौन है और मुसलमान कौन
अपना कौन है और पराया कौन ?  

 

बांध का छेद बुदबुदाते देख
न जाने क्यों 
मेरे पग 
सुप्त तत्रिंयो और ऊंघते दरवाजों को 
भड़भड़ाने के लिये 
भागने के बदले 
विप्लव के आह्वान मे डूब कर
प्रलय की कल्पना करने लगे 
कि अब 
मनु कौन है और कामायनी कौन 
सृष्टि क्या है और वृष्टि क्या ?  

 

न जाने क्यों 
क्यों और क्यों ?
मेरे आंख कान हाथ पग 
सब के सब दिमाग हो गये हैं 
और दिमाग
इन धूर्त बाजीगरों की कठपुतली ।

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/na_jaane.htm

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8 टिप्पणियाँ »

  1. बांध का छेद बुदबुदाते देख
    न जाने क्यों
    मेरे पग

    –सही दिशा मे गये जिस ओर हम सब बढ़ रहे हैं भाई. समझ कोइ नहीं पा रहा…सब मशगुल हैं. देखो कैसे प्रलयंकारी स्थितियाँ अपना भेष धरती हैं. चिंतन गहरा है और लायक है. आभार कि सोचा तो.

    टिप्पणी द्वारा समीर लाल — जुलाई 26, 2007 @ 1:54 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. Bahut DhaNyavaad ki aapne Kavitaa ko poori gahraai se pakad
    liyaa.

    Vinaashkaari sthiti ko bhaaMp lenaa use door karane ki
    dishaa me pahalaa kadam hei.

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha — जुलाई 26, 2007 @ 3:38 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  3. थोड़ी देर से पढ़ी य कविता लेकिन आपने जीवन की साधारण सी लगने वाली स्थितियों को बडी गहराई से पकड़ा ..अच्छा लगा.

    टिप्पणी द्वारा kakesh — जुलाई 29, 2007 @ 3:28 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  4. bhut sunar…….. ham sab aaj ache vicharsheel avam socha wale hi ban ker rha gye hai.
    bhav bhut bhut sudar. aur chipa sandesh bhut acha hai
    badhaai

    टिप्पणी द्वारा hemjyotsana parashar — जुलाई 29, 2007 @ 7:43 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  5. बहुत धन्यवाद काकेश जी व हेमज्योत्स्ना जी

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जुलाई 30, 2007 @ 1:59 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  6. मैं इस कविता को नया नाम देना चाहता हूँ “बाजीगरों की कठपुतली”

    टिप्पणी द्वारा Brij — जुलाई 31, 2007 @ 9:03 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  7. नारी के रुप कि इस तरह बेयाकिया करना वाकयी लाजबाब है, थोडा ओर लिखें.

    टिप्पणी द्वारा Brij — जुलाई 31, 2007 @ 9:07 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  8. धन्यवाद ब्रिज जी आपका शिर्षक भी बहुत अच्छा है

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जुलाई 31, 2007 @ 11:45 अपराह्न |प्रतिक्रिया


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