हरिहर झा

जुलाई 5, 2007

बालहठ

Filed under: तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:37 पूर्वाह्न
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(प्यारे शिशुओं को समर्पित)

 

राजहठ और नारी हठ तो दर्द देता हर कहीं

बालहठ को प्यार में हरगीज भूला सकते नहीं

राजहठ चमड़े का सिक्का  चल गया इस देश में

नारी हठ क्या गुल खिलाये स्वर्णमृग हो वेश में

बालहठ ने प्रेम से सबको अभिभूत कर दिया

मीठी मीठी बात ने आनन्द सबको दे दिया

 

 

चांद को आकाश से लाने की जिद कुछ कम नहीं

तारों की माला पिरोकर लाओ पापा बस यहीं

शेर के भी दांत गिनलो, हुक्म पालन चाहिये

हाथी को डिब्बे में रख कर बन्द होना चाहिये

तोड़ कर के यन्त्र महंगा जो है भीतर  चाहिये

तार बिजली के भी छूकर क्या है यह बतलाईये

  

 

जतन कर घोड़ा बने, मनपसन्द चाबुक दे दिये

नन्ही सी इक जान को मुस्कान देने के लिये

दूरियां कईं मील की दो पल में तय कर आइये

आंख मूंदे हाथ मे जादू की लकड़ी चाहिये  

कल जो बिता आज फिर से लौट आना चहिये

 सौ सवालों के जवाब पल मे हाजिर चाहिये  

                          –हरिहर झा

 

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2 टिप्पणियाँ »

  1. अच्छी लगी आपकी यह रचना.. सच में बाल सुलभ मुस्कान दे गयी..
    कवि कुलवंत

    टिप्पणी द्वारा Kavi Kulwant — जुलाई 13, 2007 @ 6:02 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. Dhanyavaad, Kulvant Singh Ji

    टिप्पणी द्वारा harihar jha — जुलाई 13, 2007 @ 7:16 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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