हरिहर झा

जून 14, 2007

हम बहुत ही बोर हुये

Filed under: मंच,व्यंग्य,हास्य,Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:45 पूर्वाह्न

बचपन की सहपाठिन मिल गई शुरू हुये ईमेल
बीवी ने जब बांच लिये तो खतम हो गया खेल

पूछपरछ मे धमधम गीरते बर्तन के खूब शोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

आफिसगर्ल  से पटते पटते जगी हमें कुछ आस
गड़प कर गया बॉस उसे तो हमे न डाली घास

कभी न दोनो मिल पाये फिर नदियों के दो छोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

सेलगर्ल ने बक्सा  खोला दिखलाये सब अंग 
अर्धागिंनी ने आधे में ही किया रंग मे भंग

तांक-झांक सब ऐसी पकड़ी नजरों के हम चोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

साकी बाला मुफ्त पिला कर कर गई मटियामेट
घर बिज़नेस न छोड़ा हमने उगल दिये सिकरेट

बुद्धि नशे मे भ्रष्ट हो गई मूर्खो के सिरमौर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

– हरिहर झा

Love is an illusion :

hariharjha.wordpress.com

or

http://hariharjha.wordpress.com/2007/06/20/love-is-an-illusion/

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12 टिप्पणियाँ »

  1. बड़ी दुखभरी कहानी है आपकी ! 🙂

    टिप्पणी द्वारा Manish — जून 14, 2007 @ 5:28 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. Dhanyavaad Manish Ji. Aapne meraa dukh smajhaa
    to sahi!! 🙂

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जून 14, 2007 @ 6:30 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  3. घर मे टी वी देख के, जी भर ठंडी आहे भर
    मत पड सेल्सगर्ल के चक्कर मे,हो जायेगा बेघर

    टिप्पणी द्वारा arun — जून 14, 2007 @ 7:18 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  4. मेरा मत भिन्न है – 🙂

    बहुत ही मजेदार कहानी है आपकी 🙂

    टिप्पणी द्वारा रवि — जून 14, 2007 @ 7:40 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  5. भँवरों के फूल फूल पर मँडराने की कविताएँ तो अनेक कवि कवियित्रियाँ लिख गए हैं, बेहतर होगा अब आप फूलों पर तितलियों के मँडराने और पराग चूस कर उड़ जाने पर कविताएँ लिखें। आजकल ऐसी तितलियों का ही राज चल रहा है।

    टिप्पणी द्वारा हरिराम — जून 14, 2007 @ 12:37 अपराह्न |प्रतिक्रिया

  6. रोमाचंक घटना चक्र !

    टिप्पणी द्वारा DR PRABHAT TANDON — जून 14, 2007 @ 10:51 अपराह्न |प्रतिक्रिया

  7. Arun Ji, aapkaa sujhaav to bahut achchha hei
    par kyaa karuN ye dil maantaa hi nahiN. 🙂

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जून 15, 2007 @ 12:24 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  8. Ravi Ji

    Jaan kar achchha lagaa ki yah kahaani aapko majedaar lagi.
    Dhanyavaad.

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जून 15, 2007 @ 12:28 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  9. Hariram Ji, Sach kahaa aapne.
    Kavi BhaNvaro ke phul-phul par mandaraane par
    likhte hei to titliyoN par likhne kaa kaam
    KavaitriyoN ke jimme chhodataa huN 🙂

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जून 15, 2007 @ 12:37 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  10. Dhanyavaad Dr. Prabhat Ji

    Aapko romaaNchak lagaa – Ghatnaa-Chakra. Yah jaan kar khushi hui.

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जून 15, 2007 @ 12:41 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  11. REALLY GOOD ONE KAKAJI… IT’S BUNSI… I HOPE MASHI NE YE KAVITA NAHI PADHI HOGI.. HA HA HA ..

    टिप्पणी द्वारा JATIN TRIVEDI — जून 30, 2007 @ 6:01 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  12. Thank you Bansi

    -Kaka

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जुलाई 2, 2007 @ 12:10 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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